PM ने कहा, 'वंदे मातरम' राष्ट्र की ऊर्जा और प्रेरणा का मंत्र है
नई दिल्ली । डेस्क: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में लोकसभा में एक विशेष चर्चा के दौरान भावपूर्ण और ओजस्वी भाषण दिया. 8 दिसंबर 2025 को संसद में दिए गए इस भाषण में उन्होंने इस राष्ट्रगीत के महत्व, स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका और देश के वर्तमान एवं भविष्य के लिए इसकी प्रेरणा पर विस्तार से प्रकाश डाला.
प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम को आजादी के आंदोलन को ऊर्जा, प्रेरणा और त्याग की भावना देने वाला 'जय घोष' बताया. उन्होंने कहा कि यह सदन और देश का सौभाग्य है कि हम इस ऐतिहासिक 150वीं वर्षगांठ के साक्षी बन रहे हैं. उन्होंने इस अवसर को आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा का कारण बनाने का आह्वान किया.
जिस मंत्र और जयघोष ने देश की आजादी के आंदोलन को ऊर्जा और प्रेरणा दी थी, त्याग और तपस्या का मार्ग दिखाया था, उस वंदेमातरम् का पुण्य स्मरण हम सबका परम सौभाग्य है। pic.twitter.com/3ySw2KLYR8
— Narendra Modi (@narendramodi) December 8, 2025
इतिहास के तीन कालखंड और 'वंदे मातरम'
प्रधानमंत्री ने वंदे मातरम की 150 वर्ष की यात्रा को तीन महत्वपूर्ण कालखंडों से जोड़ा:
50 वर्ष पूरे होने पर: देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था.
100 साल पूरे होने पर (1975): देश आपातकाल के काले दौर से गुजर रहा था, जहाँ संविधान का गला घोंट दिया गया और देशभक्तों को जेलों में बंद कर दिया गया.
150 वर्ष पूरे होने पर: यह गौरव को पुनः स्थापित करने और विकसित भारत के संकल्प को दोहराने का अवसर है.
प्रधानमंत्री ने बताया कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में ऐसे समय में इस गीत की रचना की, जब अंग्रेज 'God Save The Queen' को भारत में घर-घर पहुँचाने की साजिश कर रहे थे. बंकिम दा ने 'ईट का जवाब पत्थर से दिया' और इस गीत का जन्म हुआ, जिसे बाद में 1882 में 'आनंद मठ' में शामिल किया गया.
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम सिर्फ राजनीतिक आजादी का मंत्र नहीं था, बल्कि यह हजारों वर्षों से भारत की रग-रग में बसे 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः' और 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' के विचार और भावना का आधुनिक अवतार था. यह ज्ञान, समृद्धि और दुश्मनों के सामने अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली शक्ति (दुर्गा) का आह्वान था, जिसने गुलामी की निराशा में भारतीयों को हौसला दिया.
प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि 1905 में जब अंग्रेजों ने 'बांटो और राज करो' की नीति पर चलते हुए बंगाल का विभाजन किया, तो 'वंदे मातरम' चट्टान की तरह खड़ा रहा और बंगाल की एकता का नाद बन गया. इसके बाद स्वदेशी आंदोलन खड़ा हुआ, और अंग्रेजों को इस गीत से इतना डर लगा कि उन्होंने इसे कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया.
वंदेमातरम् ने उस विचार को पुनर्जीवित किया, जो हजारों वर्षों से भारतवर्ष की रग-रग में रचा-बसा था। pic.twitter.com/HZxZogDy73
— Narendra Modi (@narendramodi) December 8, 2025
उन्होंने बोरीसाल की वीरांगना श्रीमती सरोजिनी घोष का उदाहरण दिया, जिन्होंने प्रतिबंध न हटने तक अपनी चूड़ियाँ उतारने का व्रत लिया था. खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद बिस्मिल और मास्टर सूर्य सेन जैसे अनगिनत जांबाज सपूतों ने फांसी के तख्त पर चढ़ते हुए अपनी आखिरी सांस तक 'वंदे मातरम' का जयघोष किया. यह दुनिया का एकमात्र ऐसा भावगीत है, जो सदियों तक कोटि-कोटि जनों को जीवन आहूत करने के लिए प्रेरित करता रहा. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भी लिखा था, "एक कार्ये सोंपियाछि सहस्र जीवन-वन्दे मातरम्."
भारत माता के अनगिनत वीर सपूतों ने वंदेमातरम् गाते-गाते फांसी के फंदे को गले से लगाया था। आखिरी वक्त तक वंदेमातरम् ही उनका भावघोष रहता था। pic.twitter.com/YphC5ocAeH
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प्रधानमंत्री ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि पिछली सदी में वंदे मातरम के साथ 'अन्याय' और 'विश्वासघात' क्यों हुआ. उन्होंने कहा कि मुस्लिम लीग के विरोध की राजनीति के कारण, विशेष रूप से मोहम्मद अली जिन्ना के विरोध के बाद, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने 1937 में वंदे मातरम की ही पड़ताल शुरू कर दी और मुस्लिम लीग के सामने झुक गए.
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने 26 अक्टूबर को कलकत्ता में हुई कार्यसमिति की बैठक में 'वंदे मातरम पर समझौता' करके इसके टुकड़े कर दिए, जिसे 'सामाजिक सद्भाव' का चोला पहनाया गया, जबकि यह तुष्टिकरण की राजनीति थी. उन्होंने कहा कि तुष्टिकरण के दबाव में वंदे मातरम के बंटवारे के लिए झुकने के कारण ही कांग्रेस को एक दिन भारत के बंटवारे के लिए भी झुकना पड़ा.
समापन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्र पर जब भी संकट आया, चाहे वह खाद्य संकट हो, आपातकाल हो, युद्ध थोपा जाना हो या कोरोना जैसी वैश्विक महामारी हो, देश हमेशा वंदे मातरम की भावना के साथ आगे बढ़ा.
उन्होंने देशवासियों से आह्वान किया कि वंदे मातरम को सिर्फ स्मरण करने का नहीं, बल्कि नई ऊर्जा और प्रेरणा लेने का काल बनाएं. उन्होंने कहा कि आजादी के लिए वंदे मातरम की भावना ने जो रास्ता बनाया, उसी के कारण आज हम यहाँ हैं और हम पर इसका ऋण है. उन्होंने इस भावना को लेकर चलने का संकल्प दोहराया ताकि 'आत्मनिर्भर भारत' का सपना पूरा हो और 2047 में देश एक 'विकसित भारत' बनकर रहे. उन्होंने सदन और देश से इस संकल्प के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया.
तुष्टिकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस वंदेमातरम् के बंटवारे के लिए झुकी, इसीलिए कांग्रेस को एक दिन भारत के बंटवारे के लिए झुकना पड़ा। pic.twitter.com/mrf1mw6C6x
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