संशोधित फार्म-6 को सर्वोच्च अदालत की ओर से कोई मंजूरी नहीं, PIL पर एक सप्ताह में जवाब मांगा
नई दिल्ली । डेस्क: देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गहराया विवाद अब सर्वोच्च अदालत के दरवाजे तक पहुंच गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार द्वारा अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना आयोग के अहम फैसले लेने के आरोपों पर उच्चतम न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लिया है. अदालत ने इस मामले में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी कर एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है.
बहुमत से होने चाहिए फैसले: शीर्ष अदालत
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागछी और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की. पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है और इसके तमाम फैसले या तो सर्वसम्मति से होने चाहिए या फिर बहुमत के आधार पर. अदालत ने कहा कि फिलहाल वह यही मानकर चल रही है कि आयोग के सभी निर्णय नियमानुसार ही लिए गए होंगे, लेकिन यदि जांच में यह सामने आता है कि निर्वाचन आयोग का कोई भी फैसला कानून के प्रावधानों के अनुरूप नहीं था, तो अदालत उसे बिना किसी हिचकिचाहट के रद्द कर देगी.
फार्म-6 के संशोधन पर मुख्य न्यायाधीश का रुख
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फार्म-6 का विशेष रूप से उल्लेख किया. मुख्य न्यायाधीश ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि संशोधित फार्म-6 को सर्वोच्च अदालत की ओर से कोई मंजूरी नहीं दी गई है. ज्ञात हो कि ऑनलाइन पंजीकरण के दौरान फार्म-6 में मांगी जाने वाली अतिरिक्त घोषणाओं को लेकर राजनीतिक दलों और नागरिक समाज की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं.
आयोग के भीतर मतभेद की खबरें आईं सामने
यह पूरा कानूनी विवाद उस समय गहराया जब आयोग के भीतर से ही असंतोष की आवाजें सार्वजनिक हुईं. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों के दौरान मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी. दोनों आयुक्तों का कहना था कि कई महत्वपूर्ण आदेश उनकी जानकारी और सिफारिश के बिना ही जारी कर दिए गए. हालांकि, इस विवाद पर सफाई देते हुए निर्वाचन आयोग ने कहा है कि किसी भी संवैधानिक संस्था में विचारों की भिन्नता और अवलोकन एक सामान्य प्रक्रिया है. आयोग के अनुसार उसके सभी आदेश स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही जारी किए गए हैं.
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग
पटना निवासी राकेश कुमार सिंह द्वारा दाखिल इस याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं. याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से गुहार लगाई है कि वह यह तय करे कि क्या ज्ञानेश कुमार व्यक्तिगत स्तर पर उन शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं जो कानूनी रूप से पूरे आयोग में निहित हैं. याचिका में मांग की गई है कि मामले की अंतिम सुनवाई तक मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्य करने से रोका जाए और आयोग का कामकाज दोनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से चलाया जाए. साथ ही, आयोग में खाली पदों की सिफारिश के लिए देश के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाने का अनुरोध भी किया गया है.