नेपाल चुनाव: कमजोर विपक्ष ने बढ़ाई लोकतंत्र की चिंता
नई दिल्ली । डेस्क: नेपाल के संसदीय चुनावों के हालिया नतीजों ने देश की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत कर दी है, जहाँ मात्र चार साल पुरानी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 275 सदस्यीय संसद में 182 सीटें हासिल की हैं. 5 मार्च को हुए इन चुनावों में जनता ने पुराने स्थापित दलों, जैसे नेपाली कांग्रेस (38 सीटें) और CPN-UML (25 सीटें) को पूरी तरह नकार दिया है, जो 1990 के बाद से नेपाली राजनीति के मुख्य केंद्र रहे थे.
यह भारी जनादेश पिछले साल सितंबर में हुए 'जेन जी' (Gen Z) विरोध प्रदर्शनों का परिणाम माना जा रहा है, जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ और सुशासन के लिए 77 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.
अब बलेंद्र शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनने की तैयारी है, जिसे एक 'डिस्ट्रप्टर' के रूप में देखा जा रहा है जो त्वरित निर्णय लेने और व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए जाने जाते हैं.
हालाँकि, इस प्रचंड बहुमत ने राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है. विशेषज्ञों का मानना है कि संसद में विपक्ष की इतनी कम संख्या लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है.
राजनीतिक टिप्पणीकार चंद्रकिशोर के अनुसार, संसदीय बहस लोकतंत्र की आधारशिला होती है और एक मजबूत विपक्ष के बिना सरकार के मनमानी करने की आशंका बढ़ जाती है.
रोचक बात यह है कि मधेस आधारित क्षेत्रीय दल इस बार संसद से पूरी तरह बाहर हो गए हैं, जबकि केपी शर्मा ओली और गगन थापा जैसे दिग्गज नेताओं को भी अपनी सीटें गंवानी पड़ी है.
पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल अकेले ऐसे पुराने नेता हैं जो इस आरएसपी लहर में अपनी सीट बचाने में सफल रहे.
अब सवाल यह उठता है कि क्या केवल संख्या बल ही विपक्ष की ताकत तय करेगा? पूर्व राष्ट्रीय सभा सचिव राजेंद्र फुयाल का मानना है कि विपक्ष की भूमिका को केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि उनके नैतिक साहस से मापा जाना चाहिए.
चूंकि इस बार कई नए चेहरे संसद पहुंच रहे हैं, जिनके पास पुरानी राजनीति का बोझ नहीं है, वे सरकार से अधिक निडरता से सवाल कर सकते हैं. फिर भी, मुख्यधारा की मीडिया और नागरिक समाज की निष्क्रियता के बीच, लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी अब काफी हद तक सोशल मीडिया और जनता के सड़क पर प्रदर्शनों पर टिकी होगी.
वर्षों से अस्थिरता झेल रहे नेपाल को अब एक स्थिर सरकार तो मिल गई है, लेकिन इसकी कीमत लोकतांत्रिक संस्थानों की मजबूती पर पड़ने वाले दबाव के रूप में चुकानी पड़ सकती ह