रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

नेपाल चुनाव: कम्युनिस्टों की ऐतिहासिक हार, क्या खत्म हुआ वामपंथ?

C

CG Khabar

13 मार्च 2026, 01:40 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

नेपाल चुनाव
नेपाल चुनाव

काठमांडू । डेस्क: नेपाल के हालिया संसदीय चुनावों के नतीजों ने देश की दशकों पुरानी कम्युनिस्ट राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहाँ से वापसी की राह अत्यंत कठिन नजर आ रही है. 5 मार्च को हुए प्रतिनिधि सभा के चुनावों में नेपाली कम्युनिस्ट आंदोलनों को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है. 


आंकड़ों के अनुसार, 1990 के बाद से पिछले सात चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टियों का संयुक्त वोट शेयर लगातार 40 प्रतिशत के आसपास बना रहता था, लेकिन इस बार के नतीजों ने सबको चौंकाते हुए इसे लगभग आधा कर दिया है. अब यह समर्थन सिमटकर मात्र 21 प्रतिशत के करीब रह गया है.

विज्ञापन


चुनाव परिणामों का विश्लेषण करें तो नेकपा-एमाले (CPN-UML) और विभिन्न वामपंथी समूहों के गठबंधन 'नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी' (NCP) दोनों को प्रत्यक्ष (FPTP) और समानुपातिक (PR) श्रेणियों में भारी नुकसान उठाना पड़ा है. प्रत्यक्ष श्रेणी के तहत, एमाले ने कुल 165 सीटों में से केवल 9 पर जीत हासिल की, जबकि माओवादी केंद्र सहित कई वामपंथी दलों के समूह NCP को मात्र 7 सीटें मिलीं. 


समानुपातिक मतों में भी एमाले को 13.49 प्रतिशत और NCP को 7.49 प्रतिशत वोट ही मिल सके. यह गिरावट तब और भी भयावह लगती है जब हम 2017 के आंकड़ों को देखते हैं, जहाँ वामपंथी गठबंधन ने मिलकर 174 सीटों पर कब्जा जमाया था, जो अब घटकर लगभग 40 पर आ गया है.


राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस चुनावी उलटफेर के पीछे का मुख्य कारण काठमांडू के पूर्व मेयर और 'क्लीन इमेज' वाले नेता बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की 'उम्मीद की लहर' है. RSP ने न केवल बड़े शहरों में जीत दर्ज की, बल्कि प्युठान और भक्तपुर निर्वाचन क्षेत्र-1 जैसे कम्युनिस्टों के उन अभेद्य किलों को भी ढहा दिया, जहाँ दशकों से राष्ट्रीय जनमोर्चा और नेपाल मजदूर किसान पार्टी का एकछत्र राज था. 


राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार सुबेदी का कड़ा तर्क है कि इन परिणामों ने नेपाली कम्युनिस्ट ताकतों को प्रभावी रूप से 'राजनीतिक रूप से पंगु' बना दिया है और अब उनके लिए पुराने वैभव को पाना नामुमकिन होगा. सुबेदी यह भी कहते हैं कि नेपाली कांग्रेस की खराब स्थिति का कारण उसका खुद का 'कम्युनिस्ट' जैसा व्यवहार करना रहा, जिससे उसके वोट भी RSP की ओर चले गए.


दूसरी ओर, कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थकों और नेताओं के बीच इस हार को लेकर अलग-अलग मत हैं. पराजित नेता प्रेम सुवाल और युवा मार्क्सवादी विद्वान नबीन तिवारी का कहना है कि यह विचारधारा की नहीं, बल्कि उन नेताओं के आचरण की हार है जिन्होंने खुद को केवल 'नाम का कम्युनिस्ट' बना लिया था. 


तिवारी के अनुसार, जनता में आज भी समाजवाद के प्रति गहरी रुचि है, लेकिन जब लाभ का निजीकरण और नुकसान का समाजीकरण होने लगे, तो जनता ऐसे पाखंडी नेतृत्व को दंडित करती है. 


हालांकि, एमाले नेता सुरेंद्र पांडे ने इस हार को 'अस्थायी' बताते हुए कहा कि सोवियत संघ के पतन के समय भी ऐसी ही आशंकाएं जताई गई थीं, लेकिन कम्युनिस्ट आंदोलन फिर खड़ा हुआ था. वर्तमान में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नेपाल की पारंपरिक वामपंथी ताकतें डेटा-केंद्रित पूंजीवाद के इस नए दौर में खुद को पुनर्जीवित कर पाती हैं या नहीं.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP