नेपाल: हाथी के आतंक का इलाज फसल बदल दो
काठमांडू । डेस्क: नेपाल के झापा जिले में पारंपरिक खेती करने वाले किसान अब तेजी से रबर की खेती की ओर रुख कर रहे हैं. जंगली हाथियों और बंदरों के आतंक के कारण फसलों के लगातार हो रहे नुकसान से परेशान होकर किसानों ने धान और मक्के जैसी पारंपरिक फसलों को छोड़ना शुरू कर दिया है.
झापा के बुद्धशांति ग्रामीण नगर पालिका-3 के रहने वाले सीताराम बस्तोला ने करीब 12 साल पहले अपनी फसलों को वन्यजीवों से बचाने के लिए 10 कट्ठा जमीन पर रबर के पौधे लगाए थे. आज वे इससे हर महीने 35,000 से 40,000 रुपये तक की शानदार कमाई कर रहे हैं.
किसानों का कहना है कि जंगली जानवर रबर के पेड़ों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते, जिससे वे भारी राहत महसूस कर रहे हैं.
इसी गांव के एक अन्य किसान पुण्य प्रसाद खतिवड़ा ने साल 2011 में पारंपरिक अनाज की खेती बंद कर 150 रबर के पेड़ लगाए थे. उनका कहना है कि पौधे लगाने के सात साल बाद उत्पादन शुरू हो जाता है और एक पेड़ से सीजन के दौरान लगभग 15 लीटर लेटेक्स (रबर का दूध) मिलता है. सामान्य तौर पर ढाई लीटर लेटेक्स से एक किलोग्राम रबर तैयार होती है, हालांकि सर्दियों में लेटेक्स पतला होने के कारण चार लीटर तक की जरूरत पड़ती है.
वर्तमान में बाजार में इस प्रसंस्कृत रबर की कीमत करीब 300 रुपये प्रति किलोग्राम है. स्थानीय व्यापारियों द्वारा सीधे किसानों के घर और खेतों से रबर की खरीद की जा रही है, जिससे उन्हें बाजार की भी कोई चिंता नहीं है.
बिर्तामोड के एक व्यापारी दिलीप गोस्वामी के अनुसार, झापा के किसान रबर की खेती से एक ही सीजन में 5 करोड़ रुपये (50 मिलियन) से अधिक की कमाई कर रहे हैं और यह रबर गोल्डस्टार शूज कंपनी तथा चितवन और मोरंग के टायर निर्माताओं को सप्लाई की जा रही है.
स्मॉल फार्मर्स नेचुरल रबर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष चंद्र अधिकारी के मुताबिक, वन्यजीवों से प्रभावित क्षेत्रों में रबर की खेती किसानों के लिए एक सुरक्षित और भरोसेमंद आय का जरिया बन चुकी है.
इस समय झापा, मोरंग, सुनसरी, उदयपर और इलाम जिलों में 500 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर रबर की खेती हो रही है, जिसमें से अकेले झापा में ही करीब 130 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है. रबर की खेती के लिए बलुई मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना जाता है, जिसमें नियमित सिंचाई और अच्छी देखभाल की आवश्यकता होती है.
हालांकि, 'रबर जोन' संगठन के अध्यक्ष ईश्वरी पोखरेल का कहना है कि इस क्षेत्र में किसानों की दिलचस्पी तो बढ़ रही है, लेकिन सरकारी स्तर पर सहयोग बेहद कम है. यदि सरकार से सही प्रोत्साहन मिले, तो देश के बंद पड़े उद्योगों, जैसे कि गोरखकाली टायर्स, को फिर से पुनर्जीवित किया जा सकता है.