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मदुरो अपहरण: अमेरिका ने किस गोपनीय हथियार का इस्तेमाल किया?

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26 जन. 2026, 06:39 PM 5 मिनट में पढ़ें 1

निकोलस मदुरो
निकोलस मदुरो

वाशिंगटन । डेस्क: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस के 3 जनवरी को अपहरण के बाद अब इस पूरे सैन्य अभियान को लेकर बड़े खुलासे सामने आ रहे हैं. वेनेजुएला के रक्षा मंत्री व्लादिमीर पाद्रीनो लोपेज़ ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि इस ऑपरेशन के दौरान उनके देश को एक तरह से “हथियारों की प्रयोगशाला” बना दिया गया. 


उनका दावा है कि अमेरिका ने ऐसी उन्नत सैन्य तकनीकों और हथियारों का इस्तेमाल किया, जिनका पहले कभी युद्ध के मैदान में प्रयोग नहीं हुआ था.

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इस दावे को और बल तब मिला, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि इस अभियान में एक खास हथियार का इस्तेमाल किया गया, जिसे उन्होंने “डिस्कॉम्बोबुलेटर” नाम दिया. हालांकि ट्रंप ने इसके तकनीकी विवरण देने से इनकार करते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह हथियार ऐसा था, जिससे “सुरक्षा उपकरण काम करना बंद कर देते हैं.”


वेनेजुएला का आरोप: ‘हथियारों की टेस्टिंग’


16 जनवरी को वेनेजुएला के रक्षा मंत्री ने बताया कि अमेरिकी हमले में 47 वेनेजुएलाई सैनिक मारे गए, जबकि मदुरो की सुरक्षा में तैनात 32 क्यूबाई सैनिकों की भी मौत हुई. इसके बाद उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित और पहले कभी इस्तेमाल न हुई सैन्य तकनीकों का प्रयोग किया.


स्थानीय अख़बार एल यूनिवर्सल के अनुसार, पाद्रीनो लोपेज़ ने कहा, “अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद माना है कि उन्होंने ऐसे हथियारों का इस्तेमाल किया, जो दुनिया के किसी और देश के पास नहीं हैं. 3 जनवरी 2026 को इसी तकनीक का प्रयोग वेनेजुएला की जनता के खिलाफ किया गया.”


ट्रंप का बयान और ‘सोनिक हथियार’ का जिक्र


मदुरो के अपहरण के कुछ ही दिनों बाद व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने सोशल मीडिया पर एक कथित वेनेजुएलाई सुरक्षाकर्मी की पोस्ट साझा की. उस पोस्ट में दावा किया गया था कि अमेरिकी बलों ने ऑपरेशन के दौरान “तेज़ ध्वनि तरंगों” जैसा कुछ छोड़ा, जिससे सुरक्षाकर्मियों को सिर में तेज़ दर्द, नाक से खून और उल्टियां होने लगीं.


हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी, लेकिन एक टीवी इंटरव्यू में ट्रंप ने माना कि मदुरो के क्यूबाई बॉडीगार्ड्स के खिलाफ “सोनिक हथियार” का इस्तेमाल किया गया. उन्होंने कहा, “हमारे पास ऐसे हथियार हैं, जिनके बारे में किसी को पता नहीं. वह इलाका एक किले और सैन्य अड्डे के बीच था, फिर भी हमला सफल रहा.”


बाद में न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए बयान में ट्रंप ने साफ कहा कि इस अभियान में ऐसा हथियार इस्तेमाल किया गया, जो रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय कर देता है. उन्होंने इसे ही “डिस्कॉम्बोबुलेटर” कहा.


इस X पोस्ट को क्लिक करके पूरा इंटरव्यू पढ़िये कि मदुरो के अपहरण के समय क्या हुआ था?


क्या सच में ‘सोनिक हथियार’ इस्तेमाल हुआ?


सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका के पास पहले से ही कुछ ऐसे उपकरण हैं जिन्हें आमतौर पर “सोनिक” हथियार कहा जाता है. इनमें सबसे प्रसिद्ध है लॉन्ग रेंज अकॉस्टिक डिवाइस (LRAD). यह एक शक्तिशाली साउंड प्रोजेक्टर होता है, जिसका इस्तेमाल जहाज़ों को रोकने, सैन्य ठिकानों की सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण में किया जाता है.


हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि लॉन्ग रेंज अकॉस्टिक डिवाइस लोगों को असहज कर सकता है, चक्कर, मतली या सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन यह इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, रडार या संचार नेटवर्क को बंद नहीं कर सकता.


इसी तरह एक और तकनीक है एक्टिव डिनायल सिस्टम (ADS), जिसे अक्सर गलती से सोनिक हथियार कहा जाता है. यह ध्वनि नहीं बल्कि मिलीमीटर-वेव ऊर्जा का इस्तेमाल करता है, जिससे त्वचा पर तेज़ गर्मी महसूस होती है और व्यक्ति पीछे हटने को मजबूर हो जाता है. लेकिन यह भी मशीनों या उपकरणों को निष्क्रिय नहीं करता.


असली तकनीक: इलेक्ट्रॉनिक और साइबर युद्ध?


विशेषज्ञों के अनुसार, अगर वेनेजुएला की वायु रक्षा प्रणाली और संचार नेटवर्क अचानक फेल हो गए, तो इसके पीछे सोनिक हथियार नहीं बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW), साइबर हमले या हाई-पावर माइक्रोवेव हथियार हो सकते हैं.


इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए रडार को भ्रमित किया जा सकता है, जीपीएस सिग्नल को जाम किया जा सकता है और सैन्य संचार ठप किया जा सकता है. इसके अलावा, हाई-पावर माइक्रोवेव तकनीक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सर्किट को नुकसान पहुंचाकर उन्हें अस्थायी या स्थायी रूप से बेकार बना सकती है. अमेरिका का CHAMP प्रोजेक्ट इसी दिशा में जाना जाता है.


इतिहास गवाह है कि अमेरिका पहले भी ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल कर चुका है. 2009 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाने वाला स्टक्सनेट साइबर हमला इसका बड़ा उदाहरण है. वहीं, ग्रेफाइट बमों के जरिए बिजली ग्रिड को ठप करना भी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा रहा है.


‘डिस्कॉम्बोबुलेटर’ क्या है?


विशेषज्ञों का मानना है कि “डिस्कॉम्बोबुलेटर” कोई एक नया हथियार नहीं, बल्कि कई गैर-घातक और गैर-पारंपरिक तकनीकों का सामूहिक नाम हो सकता है. इसमें साइबर हमले, इलेक्ट्रॉनिक जामिंग, स्थानीय बिजली आपूर्ति बाधित करना और संचार नेटवर्क को निशाना बनाना शामिल हो सकता है.


जमीन पर मौजूद लोगों को यह ऐसा लगेगा कि अचानक सभी सिस्टम “काम करना बंद” कर गए. ऐसे में मदुरो की गिरफ्तारी के लिए यह रणनीति बेहद कारगर साबित हुई.


अब तक सामने आए तथ्यों से यही संकेत मिलता है कि अमेरिका ने वेनेजुएला में किसी एक “साइंस फिक्शन” जैसे हथियार की बजाय, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक, साइबर और माइक्रोवेव तकनीकों के संयोजन का इस्तेमाल किया. सोनिक हथियारों से सैनिकों को भ्रमित किया गया हो सकता है, लेकिन असली खेल रक्षा और संचार प्रणालियों को निष्क्रिय करने का था.


यही वजह है कि वेनेजुएला इस पूरे अभियान को “हथियारों की प्रयोगशाला” बता रहा है जहां नई और पुरानी, लेकिन बेहद उन्नत तकनीकों को एक साथ आजमाया गया.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP