तंबाकू नियंत्रण को गरीबी उन्मूलन से जोड़ना समय की मांग
नई दिल्ली । डेस्क: ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (BMJ) ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक हालिया शोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तंबाकू नियंत्रण को अब केवल स्वास्थ्य के नजरिए से नहीं, बल्कि गरीबी उन्मूलन की एक अनिवार्य रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) और आईसीएमआर (ICMR) के शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि भारत के परिवार तंबाकू का त्याग कर दें, तो देश के लगभग 2.05 करोड़ परिवार आर्थिक रूप से एक पायदान ऊपर चढ़ सकते हैं.
यह अध्ययन दर्शाता है कि तंबाकू पर होने वाला खर्च सीधे तौर पर भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी निवेशों में बाधा डालता है, जिससे गरीब परिवार गरीबी के चक्र में फंसे रहते हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, सबसे गरीब और ग्रामीण परिवार अपनी आय का 6.4 से 6.6 प्रतिशत हिस्सा तंबाकू पर खर्च कर देते हैं, जबकि अमीर परिवारों में यह अनुपात काफी कम है.
विशेषज्ञों का तर्क है कि तंबाकू छोड़ने से न केवल 70 लाख मध्यम वर्गीय परिवारों को लाभ होगा, बल्कि ग्रामीण इलाकों के 17 मिलियन परिवारों के जीवनस्तर में क्रांतिकारी सुधार आ सकता है.
दुनिया भर में तंबाकू के कारण होने वाली बीमारियों और उत्पादकता की हानि से सालाना एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान होता है, जिसका सबसे बड़ा बोझ निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ता है.
ऐसे में शोधकर्ताओं ने पुरजोर सिफारिश की है कि तंबाकू पर करों में वृद्धि, नशा मुक्ति कार्यक्रमों और जागरूकता अभियानों को सीधे तौर पर गरीबी विरोधी सरकारी योजनाओं के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए.
निष्कर्ष यह है कि तंबाकू का त्याग केवल फेफड़ों की सेहत सुधारने के लिए नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों को आर्थिक पिछड़ेपन से बाहर निकालने के लिए एक प्रभावी वित्तीय हथियार है.