अरावली में खनन पर सरकार के दावों पर जयराम रमेश का सवाल
नई दिल्ली । डेस्क: वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अरावली पर्वतमाला में खनन को लेकर केंद्र सरकार के हालिया स्पष्टीकरण पर गंभीर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा कि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा प्रस्तुत आंकड़े भ्रामक हैं और प्रस्तावित नई परिभाषा से अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन व रियल एस्टेट गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है.
भूपेंद्र यादव ने हाल में कहा था कि अरावली क्षेत्र के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से केवल 0.19 प्रतिशत यानी 277 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही खनन की अनुमति दी जाएगी.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए जयराम रमेश ने कहा कि यह आंकड़ा पूरे 34 जिलों और चार राज्यों के कुल भू-भाग पर आधारित है, न कि वास्तविक अरावली क्षेत्र पर. उन्होंने कहा कि यदि वास्तविक अरावली क्षेत्र को आधार बनाया जाए तो 0.19 प्रतिशत का दावा गंभीर रूप से कम करके आंका गया है.
रमेश के अनुसार, जिन 15 जिलों में आंकड़े सत्यापित किए जा सकते हैं, वहां कुल भूमि का लगभग 33 प्रतिशत हिस्सा अरावली पर्वतमाला के अंतर्गत आता है. उन्होंने चिंता जताई कि नए मानकों के तहत इस क्षेत्र का कितना हिस्सा संरक्षण से बाहर कर दिया जाएगा, इस पर सरकार ने कोई स्पष्टता नहीं दी है.
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि स्थानीय प्रोफाइल को आधार बनाने से 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली कई पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकती हैं. इससे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पहाड़ी इलाकों में रियल एस्टेट विकास बढ़ने और पर्यावरणीय दबाव बढ़ने की आशंका है.
सारिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाओं को पुनर्परिभाषित कर खनन की अनुमति देने की योजना पर भी रमेश ने कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि एक जुड़े हुए पारिस्थितिकी तंत्र का इस तरह विभाजन उसके पारिस्थितिक मूल्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएगा, जैसा कि देश के अन्य क्षेत्रों में पहले ही देखा जा चुका है.
अरावली को भारत की प्राकृतिक विरासत का अहम हिस्सा बताते हुए जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि सरकार इसे नए सिरे से परिभाषित करने पर क्यों आमादा है और किसके हित में ऐसा किया जा रहा है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वन सर्वेक्षण भारत जैसी विशेषज्ञ संस्थाओं की सिफारिशों को नजरअंदाज किया जा रहा है.
पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इन चिंताओं का समर्थन करते हुए कहा है कि अरावली में संरक्षण कमजोर होने से जैव विविधता, भूजल पुनर्भरण और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की वायु गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ेगा. फिलहाल पर्यावरण मंत्रालय की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.