लेबनान पर इजरायल का अड़ियल रुख: ट्रंप-नेतन्याहू में तल्खी
नई दिल्ली । डेस्क: इजरायल और अमेरिका-ईरान के बीच हुए हालिया समझौते के बावजूद मध्य पूर्व में शांति की राह आसान नहीं दिख रही है. इजरायली सेना ने गुरुवार को एक नया नक्शा जारी किया है, जो दक्षिणी लेबनान में उसके सैन्य नियंत्रण क्षेत्र के विस्तार को दर्शाता है. इसके साथ ही इजरायल ने साफ कर दिया है कि वह इस घोषित सीमा के बाहर भी हमले करने से पीछे नहीं हटेगा.
इजरायल का यह आक्रामक रुख उस अमेरिका-ईरान समझौते को सीधी चुनौती दे रहा है, जिसमें लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही गई थी. इस कदम के बाद न केवल लेबनान मोर्चे पर तनाव बढ़ गया है, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच के मतभेद भी खुलकर सामने आ गए हैं.
नए नक्शे से बढ़ा विवाद और जमीनी हकीकत:
इजरायली सेना द्वारा जारी किया गया नया नक्शा दक्षिणी लेबनान में उसकी गहरी पैठ को बयां करता है. इस नक्शे में सेना ने बफर जोन का दायरा बढ़ाते हुए लितानी नदी के उत्तर में स्थित हिजबुल्लाह के मजबूत गढ़ नबातिह जैसे इलाकों को भी अपने नियंत्रण में दिखाया है. हालांकि इजरायली सैनिक पिछले कई हफ्तों से इन इलाकों में सक्रिय थे, लेकिन पहली बार सेना ने आधिकारिक तौर पर इस विस्तारित नियंत्रण क्षेत्र को गहरे लाल रंग में चिह्नित कर दुनिया के सामने रखा है.
एक वरिष्ठ इजरायली अधिकारी के अनुसार, इजरायल इस समय अमेरिकी प्रशासन के साथ बेहद "कठिन बातचीत" के दौर से गुजर रहा है, जिसमें वह ईरान समर्थित हिजबुल्लाह मिलिशिया को खदेड़ने के नाम पर लेबनान के भीतर १० किलोमीटर तक अपनी सेना तैनात रखने की मांग कर रहा है.
अमेरिका-ईरान समझौते पर इजरायल की आपत्ति:
बुधवार को अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध को पूरी तरह समाप्त करना और लेबनान सहित सभी मोर्चों पर शांति बहाल करना था. इस समझौते में स्पष्ट रूप से लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने की बात शामिल है.
इसके विपरीत, इजरायल ने दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना हटाने से साफ इनकार कर दिया है. इजरायल का तर्क है कि जब तक उसके उत्तरी शहरों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती और हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह टल नहीं जाता, तब तक वह इस सुरक्षा पट्टी को नहीं छोड़ेगा.
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने समझौते के बाद अपने पहले बयान में कहा कि हालांकि वे अमेरिका के साथ अपने संबंधों का सम्मान करते हैं, लेकिन इजरायली नागरिकों की सुरक्षा के लिए दक्षिणी लेबनान में सैन्य मौजूदगी बनाए रखना उनकी मजबूरी है.
नेतन्याहू और ट्रंप के बीच बढ़ती तल्खी:
इस पूरे घटनाक्रम ने इजरायल के पारंपरिक और सबसे बड़े मददगार अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में दरार पैदा कर दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने इस युद्ध को समाप्त करने के लिए ईरान के साथ हाथ मिलाया है, अब इजरायल के आक्रामक रुख से काफी असहज नजर आ रहे हैं.
ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की आलोचना की है और कहा है कि हिजबुल्लाह के लड़ाकों को ढूंढने के लिए पूरी की पूरी रिहायशी इमारतों को बम से उड़ाना बिल्कुल भी जरूरी नहीं था.
दूसरी ओर, इजरायली अधिकारी इस बात से नाराज हैं कि अमेरिका-ईरान समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उनकी चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया, जिससे इजरायल के सैन्य विकल्प सीमित हो रहे हैं.
हिजबुल्लाह का कड़ा रुख और वाशिंगटन वार्ता पर टिकी नजरें:
इजरायल के इस कदम पर हिजबुल्लाह ने बेहद सख्त प्रतिक्रिया दी है. संगठन के प्रमुख नईम कासिम ने एक टेलीविजन संबोधन में इजरायल के किसी भी सुरक्षा या बफर जोन को मानने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि लेबनान की धरती पर किसी भी रंग का कोई जोन स्वीकार्य नहीं है और इजरायल को हर हाल में यहाँ से जाना होगा.
इस बीच, जमीन पर हिजबुल्लाह के ड्रोन हमलों में इजरायली सैनिकों के हताहत होने की खबरें भी आ रही हैं. अब सभी की निगाहें अगले हफ्ते वाशिंगटन में होने वाली अमेरिका-मध्यस्थता वाली इजरायल-लेबनान वार्ता पर टिकी हैं.
जानकारों मान रहे हैं कि वार्ता में इजरायल हिजबुल्लाह के पूरी तरह निरस्त्रीकरण की मांग करेगा, जबकि लेबनान अपनी संप्रभुता की बहाली के लिए इजरायली सेना की पूर्ण वापसी पर अड़ा रहेगा.