कच्चे माल के कारण भारतीय दवा उद्योग संकट में
नई दिल्ली । डेस्क: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों पर जारी संकट के कारण भारतीय दवा उद्योग को एक बड़े झटके का सामना करना पड़ रहा है. फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के चलते दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाले तीन सबसे महत्वपूर्ण रसायनों की आपूर्ति पूरी तरह चरमरा गई है. भारतीय दवा बाजार में इन कच्चे माल की कमी से न केवल देश में बल्कि दुनिया भर में सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, टैबलेट और कैप्सूल बनाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले तीन मुख्य तत्वों मैग्नीशियम स्टीयरेट, एमसीसी (माइक्रोक्रिस्टलाइन सेलुलोज) और लैक्टोज की आवक बुरी तरह प्रभावित हुई है.
मैग्नीशियम स्टीयरेट का उपयोग लगभग 60 प्रतिशत दवाओं में स्नेहक के रूप में होता है, जबकि एमसीसी दवाओं को बांधने का काम करता है और लैक्टोज वजन बढ़ाने के लिए बेस का काम करता है. इन तीनों ही घटकों की कमी से भारतीय जेनेरिक उद्योगों की विनिर्माण क्षमता पर बुरा असर पड़ा है.
नीदरलैंड और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों से आने वाले उच्च श्रेणी के लैक्टोज की नई खेप काफी महंगी हो गई है, जिससे कंपनियों का मुनाफा तेजी से घट रहा है.
दूसरी ओर, इस युद्ध की वजह से वैश्विक ऊर्जा, तेल और गैस बाजारों में भारी अस्थिरता आई है. इसके परिणामस्वरूप दवा बनाने वाले कच्चे रासायनिक पदार्थों और परिवहन की कीमतों में 200 से 300 प्रतिशत तक का जबरदस्त उछाल आया है.
चूंकि भारत में अधिकांश आवश्यक दवाओं की कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित होती हैं, इसलिए कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत का बोझ आम जनता पर नहीं डाल पा रही हैं. पुरानी बफर स्टॉक की वजह से अब तक काम चल रहा था, लेकिन वह भी अब खत्म होने की कगार पर है.
यह संकट इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत को दुनिया की दवा की दुकान (फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड) कहा जाता है. भारत दुनिया भर में कुल जेनेरिक दवाओं की 20 प्रतिशत आपूर्ति करता है. अमेरिका में आधी से ज्यादा जेनेरिक दवाएं और अफ्रीका में 50 प्रतिशत से अधिक दवाएं भारत से ही जाती हैं. इसके अलावा वैश्विक स्तर पर करीब 60 प्रतिशत टीकों की आपूर्ति भी भारत के जिम्मे है.
मार्च 2026 में भारत के दवा निर्यात में 23 प्रतिशत से अधिक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे उद्योग को करोड़ों डॉलर का नुकसान हुआ है. अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो देश की कई दवा कंपनियां बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगी, जिससे दुनिया के 200 से अधिक देशों में जीवन रक्षक दवाओं की भारी किल्लत हो सकती है.
दवा निर्माताओं का मानना है कि इस वैश्विक संकट से निपटने और सस्ती दवाओं की निरंतरता बनाए रखने के लिए अब सरकार के तुरंत हस्तक्षेप की सख्त जरूरत है.