उच्च शिक्षा में 'मैसिफिकेशन' से बढ़ा तनाव: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने देश की उच्च शिक्षा प्रणाली में बढ़ते व्यवसायीकरण और अनियंत्रित विस्तार (मैसिफिकेशन) पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक 'महामारी' करार दिया है. न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं.
अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि सभी सार्वजनिक और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के रिक्त पदों को चार महीने के भीतर भरा जाए और कुलपति व रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति पद खाली होने के एक महीने के भीतर सुनिश्चित की जाए.
अदालत ने अपने 38 पन्नों के आदेश में कहा कि भारत छात्र नामांकन में वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर तो पहुंच गया है, लेकिन बिना पर्याप्त बुनियादी ढांचे के किए गए इस विस्तार ने छात्रों को शोषण और भारी तनाव के बीच छोड़ दिया है.
मेडिकल छात्रों द्वारा 36 से 48 घंटे की लगातार ड्यूटी और इंजीनियरिंग छात्रों पर प्लेसमेंट के अत्यधिक दबाव का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों का केवल संख्यात्मक विस्तार पर्याप्त नहीं है.
लंबित छात्रवृत्तियों को भी चार महीने के भीतर वितरित करने का निर्देश दिया गया है.
इसके अलावा, छात्रों की आत्महत्या के आंकड़ों को अधिक सटीक बनाने के लिए कोर्ट ने 'सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम' डेटा और एनसीआरबी की रिपोर्ट में स्कूल और उच्च शिक्षा के छात्रों के बीच स्पष्ट वर्गीकरण करने को कहा है.
साथ ही, सभी आवासीय संस्थानों के लिए एक किलोमीटर के दायरे में 24 घंटे चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना अनिवार्य कर दिया गया है.