बापू ! फिर भी हैप्पी बर्थ डे कहें?
कनक तिवारी
मैं गांधीवादी नहीं हूँ. यह कहने में मैं सच के ज़्यादा पास होता हूँ. गांधी मेरी पसंद की मजबूरी या नियति नहीं हैं. उनके विचारों की तह में जाना, उनके प्रखर कर्मों के ताप झेलना और उनकी वैचारिकता को जज़्ब करना शायद किसी के वश में नहीं है. गांधी दुबारा पैदा हो जायें, तो शायद उनके वश में भी नहीं. ऐसा लगता है गांधी एक घटना की तरह पैदा हो गये. फिर अस्सी वर्ष लगातार विद्रोह करते करते उल्कापात की तरह गिरे. गांधी भारत की आधी बीसवीं सदी के जीवन की धड़कन रहे हैं. आखिरी तीस वर्ष लिहाफ की तरह हिन्दुस्तान के सियासी, बौद्धिक और सामाजिक जीवन को ओढ़े रहे.
गांधी अन्तर्राष्ट्रीय इतिहास के एक फेनोमेना हैं. उनको समझने की कोशिश करना धुएँ को मुट्ठियों में भरना है. निपट देहाती हिन्दुस्तानी की खोपड़ी, चमकती हुई, कभी शरारतपूर्ण तो कभी संजीदा आँखें, इकहरी देह के बावजूद सिंह की बौद्धिक चपलता, पुराने फैशन की कमरखुसी घड़ी, पुराने फैशन का चश्मे का फ्रेम, गड़रिए की सी लाठी, सड़क किनारे बैठे चर्मकार के हाथों सिली चप्पलें, अधनंगा बदन-ये भारत के सबसे महान् योद्धा के कंटूर हैं. उनसे सात समुन्दर पार कभी भी सूरज अस्त नहीं होने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने धोखा खाया.
अपने बचपन से मुझे गांधी कभी बूढ़े, लिजलिजे या तरसते नहीं लगे. दहकते अंगारों के ऊपर पपड़ाई राख जैसा उनका व्यक्तित्व बार बार लोगों को प्रश्नवाचक चेहरों की कतार में खड़ा करता रहा. मैंने गांधी को ऋषि, संत, मुनि या अवतार जैसा नहीं देखकर करोड़ों भारतीय सैनिकों के योद्धा सेनापति के रूप में देखा है.
कई बार लगता है गांधी का जन्म इतिहास की विसंगति, संयोग या सद्भावनाजन्य दुर्घटना भी है. मानवता के लम्बे इतिहास में बापू अकेले हैं जिन्हें समझने के लिए दूसरे ऐतिहासिक व्यक्तित्व से तुलना की ज़रूरत नहीं होती. गांधी व्यापक परिवेश हैं. ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों में पसरे पड़े हैं और इन्द्रियातीत भी हैं. जतन तो उनको समझने की कशिश में है.
गांधी की राजनीति को खारिज कर दिया जाए. अक्षर जिज्ञासु के रूप में उन्हें खारिज करें. सत्यशोधक के रूप में भूल जाएं. तब भी इतिहास-समीक्षक और न जाने कितने रूपों में उनका लगातार मनुष्य बने रहने का सात्विक हठ भारतीय अस्तित्व की धुरी की बना है. मौज़ूदा वक्त गांधी को भूलने का इरादा लिए हुए है. गांधी कौंध की तरह हैं. उनकी उपस्थिति अहसास की तरह होती है. उनके बारे में सोचना खुद को समझने की तरह है.
गांधी की याद को बार बार परिभाषित करना साहसिक, रूमानी और मोहब्बत भरा है. यह तो आसान है कि बार-बार गांधी को ऐसी सोहबत में बिठाया जाए जिससे उन्हें उद्दाम समुद्र या तेज तरंगों में बहते किसी महानद के मुकाबले छोटा सा तालाब बनाया जाए. इस तरह के गांधी-यश से सड़ांध की बू आने लगी है. लोग गांधी क्लास में पास होने, एक गाल पर थप्पड़ खाने के बाद दूसरा गाल सामने करने और सुसंस्कृत जीवन के हर छटा-विलोप में गांधी दर्शन दिखाकर उसका इतना मजा़क उड़ा चुके कि इस बूढे़ आदमी के साथ रहने में मन वितृष्ण हो जाता है.
भारतीय लोकतंत्र के जनवादी आन्दोलन में राम और कृष्ण के बाद कालक्रम में तीसरे स्थान पर गांधी ही खड़े होते हैं. देश में ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ जिसने गांधी से ज़्यादा शब्द बोले हों, अक्षर लिखे हों, सड़कें नापी हों, आन्दोलनों का नेतृत्व किया हो, बहुविध आयामों में महारत हासिल की हो और फिर लोक-जीवन में सुगंध, स्मृति या अहसास की तरह समा गये हों. गांधी केवल मानस नहीं थे. कृष्ण के अतिरिक्त हिन्दुस्तान के इतिहास में गांधी ही हुए जो शरीर के प्रत्येक अंग की भूमिका और उपादेयता से परिचित थे. ऐसे आदमी का किंवदन्ती, तिलिस्मी या अजूबा बन जाना भी प्रचारित होता है. मोहनदास करमचन्द गांधी को अज्ञान की साजिश से बचाना भी सामूहिक कर्तव्य है.
राम के बाद गांधी लोकतांत्रिक थे जो मर्यादा भुजा उठाए अपनी भावनाओं की भी हत्या करते रहे. महात्मा की देह में पसीने की बदबू रोज निकलती थी. जीवन भर बकरी का चर्बी रहित दूध पीते रहे. उनके जन्मस्थान पोरबन्दर में भी घी के व्यापारियों की तोंदें फूल रही हैं. गांधी गरीबों की लाठी टेकते अरबसागर में नमक सत्याग्रह करते रहे. उनकी याद में दांडी नमक बेचते व्यापारी अरबपति हुए जा रहे हैं.
गांधी के मौजूदा उत्तराधिकारी बेटों के शरीर का नमक घटता जा रहा है. लेकिन चेहरे की चाशनी बढ़ती जा रही है. असफल कोशिशें जारी हैं इस बूढ़े आदमी को इक्कीसवीं सदी में खारिज कर दिया जाए. या उसे बीत गए इतिहास में दाखिल दफ्तर कर दिया जाए. गांधी मानवीय सभ्यता की ऊंचाइयों और उसकी असफलताओं का लेखाजोखा लिए अजूबा बने. अपनी कौंध लिए धरती पर आए.
इसके बावजूद उनमें आसमानी देवता होने का अंश नहीं हैै. वे एक साथ पांचों कर्मेन्द्रियों और पांचों ज्ञानेन्द्रियों के समुच्चय बनकर औसत मनुष्य होने का शाश्वत बोध कराते हैं. यही तो कबीरदास ने कहा था शायद गांधी के लिए, लेकिन पांच छह सौ वर्षों पहले, कि इसने अपने होने की चादर जैसी पाई थी, वैसी ही ओढ़ी और वैसी ही बाद की पीढि़यों को वापस कर दी.