ब्रिटिश राजनीति में युवा मुस्लिम मतदाताओं का बढ़ता प्रभाव
लंदन । डेस्क: ब्रिटेन के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव आने वाला है, जिसकी धुरी देश की युवा मुस्लिम आबादी बन सकती है. मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) की हालिया रिपोर्ट 'ब्रिटिश मुस्लिम्स इन नंबर्स' ने वेस्टमिंस्टर के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है. रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लैंड और वेल्स में मुसलमानों की आबादी अब कुल जनसंख्या का 6.5 प्रतिशत हो गई है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पहलू इनकी उम्र है.
ब्रिटिश मुसलमानों की औसत आयु (मिडियन एज) मात्र 27 वर्ष है, जो राष्ट्रीय औसत से 13 वर्ष कम है. यह आंकड़ा दर्शाता है कि ब्रिटेन का मुस्लिम समुदाय न केवल तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि यह देश के सबसे युवा समूहों में से एक है.
इस जनसांख्यिकीय बदलाव का राजनीतिक महत्व तब और बढ़ जाता है जब हम मतदान की उम्र को 16 वर्ष करने के प्रस्ताव पर विचार करते हैं. यदि लेबर सरकार का यह प्रस्ताव कानून बन जाता है, तो मतदाता सूची में लगभग 1.5 लाख नए मुस्लिम मतदाता जुड़ जाएंगे.
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर मिक़दाद असारिया का मानना है कि राजनेताओं को अपनी पुरानी सोच बदलनी होगी. उनके अनुसार, यह पीढ़ी ब्रिटिश मूल की है, उच्च शिक्षित है और खुद को 'बाहरी' नहीं मानती. वे सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका के लिए किसी की अनुमति का इंतजार नहीं कर रहे हैं.
अक्सर राजनीतिक विश्लेषक मुस्लिम मतदाताओं को एक 'वोट बैंक' या एक ही विचारधारा वाले समूह के रूप में देखते हैं, लेकिन यह रिपोर्ट इस धारणा को पूरी तरह खारिज करती है. मैनचेस्टर, ब्रैडफोर्ड, कार्डिफ और लंदन जैसे शहरों में बसे मुस्लिम समुदाय जातीय, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से बेहद विविधतापूर्ण हैं.
इनमें पाकिस्तानी, सोमाली, बांग्लादेशी मूल के लोगों के साथ-साथ श्वेत ब्रिटिश धर्मांतरित और अरब पेशेवर भी शामिल हैं. जानकारों का कहना है कि 40 लाख की इस आबादी में विचारों की उतनी ही विविधता है जितनी किसी भी अन्य बड़े समूह में हो सकती है.
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने युवा मतदाताओं को और भी अधिक जागरूक बनाया है, विशेषकर दक्षिणपंथी विचारधारा और इस्लामोफोबिया जैसे मुद्दों पर उनकी पैनी नजर है.
हालांकि, यह रिपोर्ट केवल प्रगति की बात नहीं करती, बल्कि गहरे आर्थिक संघर्षों और संरचनात्मक असमानता को भी उजागर करती है. आंकड़ों के मुताबिक, केवल 41.5 प्रतिशत मुस्लिम परिवारों के पास अपना घर है, जबकि राष्ट्रीय औसत 63 प्रतिशत है.
इसके अलावा, अकेले माता-पिता वाले परिवारों की संख्या भी मुस्लिम समुदाय में अधिक है. प्रोफेसर असारिया इसे 'सांस्कृतिक विफलता' के बजाय 'संरचनात्मक नुकसान' बताते हैं. रोजगार में भेदभाव, खराब आवास सुविधा और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कम निवेश ने इस समुदाय पर भारी आर्थिक बोझ डाला है.
इन चुनौतियों के बावजूद, सामाजिक गतिशीलता के सकारात्मक संकेत भी मिल रहे हैं. पिछले दो दशकों में मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. शिक्षा के क्षेत्र में युवा मुस्लिम (16-24 वर्ष) राष्ट्रीय औसत से भी बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं और डिग्री हासिल करने के मामले में आगे निकल रहे हैं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रिटिश मुस्लिम अब एक परिपक्व और उद्यमी नागरिक के रूप में उभर रहे हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में टैक्सपेयर के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं. अंततः, सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम समुदाय ब्रिटेन का हिस्सा है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या ब्रिटेन की संस्थाएं इस बड़े जनसांख्यिकीय और सामाजिक बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.