लूनर ऑर्बिट तक जंग का विस्तार: क्या अंतरिक्ष में नया 'कोल्ड वॉर' छेड़ रहा है अमेरिका?
नई दिल्ली । डेस्क: पृथ्वी पर गुटबाजी और महाशक्तियों के बीच टकराव की पुरानी रणनीति को अब अमेरिका अंतरिक्ष के सबसे गहरे क्षेत्रों तक ले जाने में जुट गया है. वाशिंगटन का इरादा अब केवल पृथ्वी की निचली कक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह चांद और उसके आसपास के 'सिस्लूनर स्पेस' (पृथ्वी और चंद्रमा के बीच का अंतरिक्ष क्षेत्र) को भी नया युद्ध क्षेत्र बनाने की तैयारी कर रहा है. हाल ही में अमेरिकी जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष डैन केन ने खुलकर कहा कि अमेरिकी सेना को न केवल पृथ्वी की कक्षा में, बल्कि चंद्रमा के पास भी युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि सेना को समुद्र की गहराइयों से लेकर सिस्लूनर स्पेस तक लड़ने और जीतने के लिए अभी से ढलना होगा. सैन्य अभियानों में चंद्रमा के आसपास के क्षेत्र को इस तरह शामिल करना, वाशिंगटन की अंतरिक्ष में बढ़ती आक्रामकता को दर्शाता है.
'स्टार वॉर्स 2.0' और पुराना रक्षा ढांचा
अमेरिकी रक्षा नेतृत्व का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल ही में अमेरिका ने अपनी कक्षा में अंतरिक्ष हथियारों की तैनाती की सार्वजनिक पुष्टि की थी. यह कदम वैश्विक अंतरिक्ष शासन के लिए अत्यंत खतरनाक संकेत माना जा रहा है. अमेरिका की इस आक्रामक नीति का इतिहास नया नहीं है; उसने वर्ष 2019 में ही एक स्वतंत्र 'स्पेस फोर्स' की स्थापना की थी. इसके बाद वर्ष 2025 में 'स्टार वॉर्स 2.0' नाम से चर्चित "गोल्डन डोम" अंतरिक्ष-आधारित मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का अनावरण किया गया. हालांकि, अमेरिकी अधिकारी अपनी इस सैन्य तैयारियों का बचाव यह कहकर करते हैं कि विरोधी देश अंतरिक्ष में युद्ध का विस्तार कर रहे हैं. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका का यह तर्क "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे" जैसा है, जहां वह अपनी आक्रामक नीतियों को दूसरों पर मढ़कर सही ठहराने की कोशिश करता है.
1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी पर मंडराता खतरा
यह पूरी रणनीति वर्ष 1967 की 'आउटर स्पेस ट्रीटी' के मूल सिद्धांतों का खुलेआम उल्लंघन करती है. इस अंतरराष्ट्रीय संधि का स्पष्ट नियम है कि चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों का उपयोग केवल और केवल "शांतिपूर्ण उद्देश्यों" के लिए ही किया जाएगा. इसके तहत अंतरिक्ष में परमाणु या आक्रामक हथियार रखना पूरी तरह से प्रतिबंधित है. लेकिन एक अलग स्पेस फोर्स बनाकर और चंद्रमा की कक्षा तक अपनी युद्ध अवधारणाओं का विस्तार करके, अमेरिका लगातार अंतरराष्ट्रीय नियामक लाल रेखाओं को पार कर रहा है.
ट्रिलियन डॉलर का रक्षा बजट और बाहरी खतरों का एजेंडा
अमेरिका की इस नीति के पीछे न केवल अंतरराष्ट्रीय वर्चस्व की चाह है, बल्कि इसके पीछे अमेरिका का घरेलू बजट गणित भी काम कर रहा है. अमेरिकी सेना द्वारा बाहरी खतरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी कांग्रेस से भारी-भरकम सैन्य बजट हासिल करना है. वित्त वर्ष 2027 के लिए अमेरिका का प्रस्तावित रक्षा बजट रिकॉर्ड 1.5 ट्रिलियन डॉलर रखा गया है, जिस पर संसद में तीखी बहस जारी है. ऐसे में अंतरिक्ष युद्ध का डर दिखाकर चीन और रूस जैसे देशों से खतरा बताया जा रहा है, ताकि एक विशाल सैन्य बजट की राह आसान की जा सके. चीन और रूस के अंतरिक्ष रक्षा निवेशों को ढाल बनाकर अमेरिका वास्तव में अपने बजट के एजेंडे को पूरा कर रहा है.
वैश्विक अंतरिक्ष सुरक्षा पर मंडराते संकट
पृथ्वी और चंद्रमा के बीच के अंतरिक्ष को युद्ध क्षेत्र में बदलने का यह प्रयास संपूर्ण मानवता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है. यदि इस क्षेत्र में हथियारों की होड़ की चिंगारी सुलगती है, तो किसी भी देश के अंतरिक्ष उपकरण और उपग्रह सुरक्षित नहीं रहेंगे. अंतरिक्ष किसी एक देश की निजी संपत्ति नहीं है और न ही चंद्रमा की कक्षा किसी शक्ति प्रदर्शन का नया मैदान बननी चाहिए. अंतरिक्ष की खोज विज्ञान के विकास और मानव जाति के कल्याण के लिए होनी चाहिए, न कि महाशक्तियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता का हथियार. अमेरिका को अंतरिक्ष युद्ध की अपनी काल्पनिक धारणाओं को छोड़ कर पुनः शांतिपूर्ण अंतरिक्ष अन्वेषण के रास्ते पर वापस लौटना होगा. (Input- Global Times)