इजरायल मुद्दे पर यूरोपीय संघ दो स्पष्ट धड़ें में बंटा
नई दिल्ली । डेस्क: यूरोपीय संघ (ईयू) के भीतर इजरायल के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को लेकर एक अभूतपूर्व विभाजन देखने को मिल रहा है, जिसने संघ की साझा विदेश नीति की सीमाओं को उजागर कर दिया है. हाल ही में लक्जमबर्ग में आयोजित विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि गाजा में जारी सैन्य कार्रवाई और मानवाधिकारों के उल्लंघन के मुद्दे पर यूरोपीय देश दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं.
एक ओर स्पेन, आयरलैंड और स्लोवेनिया जैसे देश हैं जो इजरायल के साथ 1995 के 'एसोसिएशन एग्रीमेंट' को निलंबित करने की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जर्मनी और इटली जैसे प्रभावशाली सदस्य देश इस प्रस्ताव के खिलाफ ढाल बनकर खड़े हो गए हैं.
इस टकराव ने यह साबित कर दिया है कि फिलिस्तीन के मुद्दे पर अब यूरोप में आम सहमति बनाना लगभग असंभव होता जा रहा है.
इजरायल के साथ व्यापारिक संबंधों को तत्काल प्रभाव से तोड़ने का नेतृत्व स्पेन, आयरलैंड और स्लोवेनिया कर रहे हैं. इन देशों ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा क्लास को एक कड़ा पत्र लिखकर तर्क दिया है कि इजरायल ने समझौते के 'अनुच्छेद 2' का उल्लंघन किया है, जो मानवाधिकारों के सम्मान को व्यापार की अनिवार्य शर्त बनाता है.
स्पेन के विदेश मंत्री जोस मैनुअल अल्बारेस ने दोटूक शब्दों में कहा कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों का पालन न करना यूरोपीय संघ की नैतिक हार होगी. इन देशों का आरोप है कि गाजा में इजरायल द्वारा किया जा रहा 'नरसंहार' और वेस्ट बैंक में सैन्य अदालतों द्वारा फिलिस्तीनियों को मौत की सजा देने जैसे नए कानून अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं.
आयरलैंड जहां अपने 'ऑक्यूपाइड टेरिटरीज बिल' के जरिए अवैध बस्तियों के उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है, वहीं स्लोवेनिया और स्पेन ने 2026 की शुरुआत से ही ऐसे व्यापारिक अंकुश लागू कर दिए हैं. इन देशों का मानना है कि ईयू अब और अधिक समय तक 'तमाशबीन' बनकर नहीं रह सकता.
इसके विपरीत, जर्मनी और इटली ने इजरायल के बचाव में मोर्चा संभाल रखा है. जर्मन विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने व्यापारिक समझौते को निलंबित करने के विचार को 'अनुचित' करार देते हुए कहा कि इजरायल के साथ बातचीत के रास्ते बंद करना समाधान नहीं है.
जर्मनी का तर्क है कि आलोचनात्मक मुद्दों पर भी इजरायल के साथ 'रचनात्मक संवाद' जारी रहना चाहिए. इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने भी इसी रुख को दोहराते हुए पुष्टि की कि इस प्रस्ताव को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.
इन देशों के समर्थन के कारण ही इजरायल के खिलाफ किसी भी कठोर दंडात्मक कार्रवाई की संभावना फिलहाल खत्म हो गई है, क्योंकि ईयू में ऐसे निर्णयों के लिए सभी सदस्य देशों की सर्वसम्मति आवश्यक होती है.
विश्लेषण के तौर पर देखें तो, हालांकि व्यापारिक समझौता निलंबित नहीं हो पाया है, लेकिन इजरायल पर कूटनीतिक दबाव निश्चित रूप से बढ़ रहा है.
यूरोपीय संघ के भीतर एक बड़ा ब्लॉक अब खुलकर इजरायल की सैन्य नीतियों को 'नरसंहार' और 'उत्पीड़न' के रूप में परिभाषित कर रहा है.
स्पेन और स्लोवेनिया जैसे देशों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर व्यापार प्रतिबंध लगाना यह दर्शाता है कि भविष्य में इजरायल के लिए यूरोपीय बाजार पहले जैसा सहज नहीं रहेगा. भले ही जर्मनी और इटली ने फिलहाल इस संकट को टाल दिया हो, लेकिन गाजा में बढ़ती मौतों और $71 बिलियन तक पहुंच चुके पुनर्निर्माण खर्च ने इजरायल के समर्थक देशों को भी रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है.
यह विभाजन दर्शाता है कि यदि इजरायल ने अपनी सैन्य नीति नहीं बदली, तो वह जल्द ही यूरोप के एक बड़े हिस्से से आर्थिक और राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ सकता है.