नागपुर की कंपनी से रक्षा सौदे के बाद एस्टोनिया के रक्षा मंत्री का इस्तीफा
नई दिल्ली । डेस्क: उत्तरी यूरोप के छोटे से बाल्टिक देश एस्टोनिया में रक्षा खरीद को लेकर खड़ा हुआ एक बड़ा राजनीतिक विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया है. एक भारतीय-नियंत्रित कंपनी के साथ हुए 70 मिलियन यूरो (लगभग 630 करोड़ रुपये) के तोपखाने के गोला-बारूद के सौदे में गड़बड़ी और आपूर्ति में विफलता के आरोपों के बाद एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है. एस्टोनियाई सार्वजनिक प्रसारक 'ईआरआर' ने इस घटनाक्रम को देश का अब तक का सबसे बड़ा "रक्षा खरीद घोटाला" करार दिया है. हालांकि, निवर्तमान रक्षा मंत्री पेवकुर ने इस पूरे मामले में अपनी किसी भी तरह की व्यक्तिगत संलिप्तता या गलती से साफ इनकार किया है.
नागपुर के जायसवाल परिवार और 'डाटासेल' का कनेक्शन
इस पूरे विवाद के केंद्र में 'डाटासेल' नाम की एक छोटी इतालवी कंपनी है. इस कंपनी को मार्च 2024 में भारत के नेको ग्रुप (Neco Group) ने अपनी फर्म 'नेको डिफेंस म्यूनिशन्स' के जरिए खरीदा था. नेको ग्रुप नागपुर के प्रमुख व्यावसायिक जायसवाल परिवार द्वारा नियंत्रित किया जाता है. अधिग्रहण से पहले डाटासेल केवल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में काम करती थी और उसके पास तोपखाने के गोला-बारूद की आपूर्ति का कोई पिछला अनुभव नहीं था. इसके बावजूद, अधिग्रहण के महज कुछ ही महीनों के भीतर कंपनी को एस्टोनियाई सरकार से भारी-भरकम ठेके मिलने शुरू हो गए.
बिना अनुभव के मिले करोड़ों यूरो के ठेके
ईआरआर की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2024 में डाटासेल को एस्टोनिया से लगभग 15 मिलियन यूरो का पहला अनुबंध मिला. इसके ठीक दो महीने बाद, अक्टूबर में कंपनी को 10 मिलियन यूरो का एक और ठेका दिया गया. साल 2024 के अंत तक यह अनुबंध बढ़कर लगभग 70 मिलियन यूरो का हो गया. चौंकाने वाली बात यह है कि जायसवाल परिवार द्वारा अधिग्रहण किए जाने से एक महीने पहले, यानी फरवरी 2024 में ही डाटासेल ने एस्टोनियाई रक्षा निवेश केंद्र (आरकेआईके) के साथ एक गोपनीयता समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए थे.
यूक्रेन युद्ध और गुणवत्ता को लेकर छिड़ा विवाद
ये गोला-बारूद एस्टोनिया द्वारा रूस के खिलाफ जारी युद्ध में यूक्रेन की सैन्य सहायता के लिए खरीदे जा रहे थे. इस खरीद के लिए धन का एक हिस्सा यूरोपीय संघ के 'यूरोपीय शांति कोष' द्वारा वित्त पोषित था. एस्टोनियाई एजेंसी आरकेआईके का आरोप है कि डाटासेल तय समय पर गोला-बारूद की आपूर्ति करने में विफल रही. जो खेप दूसरे यूरोपीय देश के मध्यवर्ती गोदाम में पहुंची, वह अधूरी थी और निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरी. नतीजतन, एस्टोनिया ने अनुबंध रद्द कर अग्रिम राशि की वापसी की मांग की है. दूसरी ओर, यूरोपीय आयोग अब इस बात की जांच कर रहा है कि क्या एस्टोनिया को इस विफलता के कारण यूरोपीय शांति कोष का पैसा वापस करना पड़ेगा.
कानूनी लड़ाई और कंपनी का पक्ष
डाटासेल ने एस्टोनियाई सरकार के आरोपों का मजबूती से खंडन किया है. कंपनी के वकील के अनुसार, डाटासेल पहले ही 59 मिलियन यूरो मूल्य के गोला-बारूद और संबंधित सामग्री की आपूर्ति कर चुकी थी. यदि एस्टोनिया ने अनुबंध अचानक रद्द न किया होता, तो शेष आपूर्ति भी पूरी कर दी जाती. कंपनी का तर्क है कि एस्टोनियाई एजेंसी का निर्णय विरोधाभासी और तर्कहीन है, जिससे कंपनी को भारी वित्तीय नुकसान हुआ है. अब यह कानूनी विवाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत की ओर बढ़ता दिख रहा है.
एस्टोनियाई प्रशासन पर उठते गंभीर सवाल
इस मामले ने एस्टोनियाई सरकार की खरीद प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं. आरकेआईके ने स्वीकार किया है कि बार-बार अनुरोध के बावजूद एस्टोनिया के राष्ट्रीय लेखा परीक्षा कार्यालय को 70 मिलियन यूरो का यह अनुबंध देखने के लिए नहीं दिया गया था. इसके अतिरिक्त, यह रहस्य भी गहरा गया है कि ये तोपखाने के गोले वास्तव में कहां बनाए जा रहे थे-क्या नेको ग्रुप इन्हें भारत में बनाने की योजना बना रहा था या डाटासेल केवल एक मध्यस्थ के रूप में किसी अन्य निर्माता से खरीदकर आपूर्ति करने वाली थी. इन अनुत्तरित सवालों ने एस्टोनियाई राजनीति में हलचल मचा दी है.