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जजों के लिए 'व्यक्तिगत कवच' नहीं है अवमानना शक्ति: सुप्रीम कोर्ट

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10 दिस. 2025, 05:09 PM 3 मिनट में पढ़ें 2

सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली । डेस्क: आपराधिक अवमानना की शक्ति जजों के लिए आलोचना को दबाने का "व्यक्तिगत कवच" नहीं है, यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 10 दिसंबर, 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट के एक आदेश को रद्द कर दिया. इस आदेश में नवी मुंबई की एक महिला को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराते हुए एक सप्ताह के साधारण कारावास की सज़ा सुनाई गई थी. 


महिला ने एक हाउसिंग सोसायटी सर्कुलर प्रसारित किया था, जिसमें कथित तौर पर जजों को "कुत्ता माफिया" का हिस्सा बताया गया था.

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न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि महिला, विनीता श्रीनंदन ने जल्द से जल्द बिना शर्त अपनी गलती पर पश्चाताप व्यक्त किया और माफी मांगी थी. बेंच ने रेखांकित किया कि अवमानना क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते समय, अदालतों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यह शक्ति जजों के लिए निजी कवच नहीं है, न ही आलोचना को शांत करने की तलवार है. 


पीठ ने कहा कि जहां अवमानना करने वाला ईमानदारी से अपनी गलती स्वीकार करता है और प्रायश्चित करना चाहता है, वहां दया न्यायिक विवेक का एक अभिन्न अंग बनी रहनी चाहिए.


यह फैसला बम्बई हाई कोर्ट के 23 अप्रैल के आदेश के ख़िलाफ़ आया, जिसने सीवुड्स एस्टेट्स लिमिटेड की सांस्कृतिक निदेशक सुश्री श्रीनंदन को दोषी ठहराया था. हाई कोर्ट ने जनवरी में महिला द्वारा जारी किए गए सर्कुलर पर स्वतः संज्ञान लिया था. यह सर्कुलर सीवुड्स कॉम्प्लेक्स में आवारा कुत्तों को खिलाने से जुड़े एक मामले के लंबित होने के दौरान जारी किया गया था. 


हाई कोर्ट ने महिला की माफी को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि इसमें पछतावा या वास्तविक की कमी है, और उस पर ₹2,000 का जुर्माना और एक सप्ताह के कारावास की सज़ा सुनाई थी.


सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के दृष्टिकोण को 'गैर-आवश्यक सावधानी' (requisite circumspection) बरतने में विफल रहने के लिए अस्वीकार कर दिया, खासकर इसलिए क्योंकि सुश्री श्रीनंदन ने स्वतः संज्ञान कार्यवाही में अपनी पहली उपस्थिति से ही बिना शर्त माफी मांग ली थी. 


पीठ ने 'अवमानना अधिनियम, 1971' (1971 Act) की धारा 12 का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि माफी को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह योग्य या सशर्त है, जब तक कि वह 'सद्भावना' (bona fide) से प्रस्तुत की गई हो. 


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सद्भावना की कमी का कोई सबूत नहीं है, तो हाई कोर्ट को कानून के अनुसार सज़ा को कम करने पर विचार करना चाहिए था. इस आधार पर, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के सज़ा वाले आदेश को रद्द कर दिया.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP