चीन ने अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड में निवेश घटाया
बीजिंग/ रायपुर । डेस्क: चीन ने अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड (US Treasuries) में अपना निवेश कम कर दिया है. अमेरिकी वित्त विभाग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, नवंबर महीने में चीन के पास मौजूद अमेरिकी बॉन्ड घटकर 682.6 अरब डॉलर रह गए. यह अक्टूबर के मुकाबले 6.1 अरब डॉलर कम है. सितंबर 2008 के बाद यह चीन का सबसे निचला स्तर है.
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन पिछले कुछ वर्षों से अपने विदेशी निवेश को डाइवर्सिफाई कर रहा है, ताकि संपत्तियों की सुरक्षा बनी रहे, जोखिम कम हो और बेहतर रिटर्न मिल सके. इसी नीति के तहत चीन अमेरिकी बॉन्ड पर निर्भरता घटा रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 की शुरुआत से अब तक चीन की अमेरिकी ट्रेज़री होल्डिंग्स में 10 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई है. फिलहाल अमेरिका के बाहर सबसे ज्यादा अमेरिकी बॉन्ड जापान के पास हैं, जबकि ब्रिटेन दूसरे स्थान पर है. चीन अब तीसरे नंबर पर है.
इस बीच चीन लगातार सोने का भंडार बढ़ा रहा है. चीन के केंद्रीय बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के अनुसार, दिसंबर 2025 के अंत तक देश का सोना भंडार बढ़कर 7.415 करोड़ औंस हो गया. यह लगातार 14वां महीना है जब चीन ने सोने की खरीद बढ़ाई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि सोने का भंडार बढ़ाने से विदेशी मुद्रा भंडार ज्यादा सुरक्षित और स्थिर होता है और बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता मजबूत होती है.
चीन का कुल विदेशी मुद्रा भंडार दिसंबर 2025 के अंत में बढ़कर 3.3579 ट्रिलियन डॉलर हो गया, जो नवंबर के मुकाबले 11.5 अरब डॉलर ज्यादा है. अधिकारियों के अनुसार, डॉलर में कमजोरी और वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव के कारण यह बढ़ोतरी हुई है.
विदेशी मुद्रा नियामक संस्था SAFE ने कहा है कि 2026 से शुरू हो रही 15वीं पंचवर्षीय योजना के तहत चीन विदेशी मुद्रा प्रबंधन को और ज्यादा सुरक्षित, खुला और आधुनिक बनाएगा. साथ ही, युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने और पूंजी खाते को धीरे-धीरे खोलने पर भी जोर दिया जाएगा.
सरकार का कहना है कि उसका लक्ष्य विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा, तरलता और मूल्य बढ़ोतरी को हर हाल में सुनिश्चित करना है.
गौरतलब है कि चीन द्वारा अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड में निवेश घटाने का असर अमेरिका पर सीमित लेकिन प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है. आर्थिक रूप से देखें तो चीन भले ही बड़ा निवेशक हो, लेकिन वह अकेला नहीं है. उसके निवेश घटाने से अमेरिकी सरकार के लिए कर्ज लेना कुछ हद तक महंगा हो सकता है और ब्याज दरों पर हल्का दबाव बन सकता है, लेकिन अमेरिका का बॉन्ड बाज़ार इतना बड़ा है कि जापान, ब्रिटेन, अमेरिकी बैंक और वैश्विक निवेश फंड इस कमी को काफी हद तक पूरा कर लेते हैं.
इसलिए इससे अमेरिका की अर्थव्यवस्था को कोई तात्कालिक बड़ा झटका नहीं लगता. डॉलर और वित्तीय स्थिरता के स्तर पर भी असर सीमित रहता है, क्योंकि चीन अचानक बड़े पैमाने पर बिकवाली नहीं कर रहा है और अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड आज भी दुनिया की सबसे सुरक्षित संपत्तियों में गिने जाते हैं.
राजनीतिक दृष्टि से यह कदम अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे अमेरिका-चीन के बढ़ते रणनीतिक टकराव के संकेत के रूप में देखा जाता है. अमेरिकी राजनीति में इससे यह धारणा मजबूत होती है कि चीन आर्थिक दबाव बनाने की क्षमता रखता है, जिसके परिणामस्वरूप चीन पर निर्भरता घटाने, घरेलू निवेश बढ़ाने और चीन के खिलाफ सख्त नीतियां अपनाने की मांग तेज होती है.
कुल मिलाकर, अल्पकाल में चीन का यह कदम अमेरिका की अर्थव्यवस्था को नहीं हिलाता, लेकिन दीर्घकाल में यह वैश्विक व्यवस्था में बदलते शक्ति-संतुलन और अमेरिका के लिए एक राजनीतिक तथा रणनीतिक चेतावनी जरूर देता है.