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छत्तीसगढ़ भाजपा में बदलाव के मायने

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16 मई 2026, 11:36 AM 7 मिनट में पढ़ें 2

छत्तीसगढ़ भाजपा
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दिवाकर मुक्तिबोध


भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के इशारे पर छत्तीसगढ़ के संगठनात्मक ढांचे में फेरबदल की शुरुआत कर दी गई है. कोर कमेटी से दिग्गज नेताओं पुन्नूलाल लाल मोहले, गौरीशंकर अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल, रामविचार नेताम, विक्रम उसेंडी, रेणुका सिंह व वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह को बाहर कर दिया गया है. ये सभी अलग-अलग अवधि में सरकार व संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं. इनके स्थान पर डिप्टी सीएम विजय शर्मा, वित्त मंत्री ओपी चौधरी, पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल, लता उसेंडी व शिवरतन शर्मा को लिया गया है. 


प्रदेश कार्यसमिति में भी बदलाव किया गया है. 23 विधायकों को सदस्य नहीं बनाया गया, जबकि परंपरागत रूप से पार्टी के सभी विधायक विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में कार्यसमिति में रहते हैं. प्रदेश अध्यक्ष किरण देव की नई टीम में 14 मंत्री व 17 विधायकों को जगह दी गई है. विधानसभा में भाजपा विधायकों की कुल संख्या 54 है.


केंद्रीय नेतृत्व के मिजाज व कार्यशैली को देखते हुए यह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. भाजपा प्रयोगधर्मी पार्टी है. पिछले दस वर्षों में चाहे संगठन के मामले हों या विधानसभा अथवा लोकसभा चुनावों में प्रत्याशियों के चयन का मसला हो, नेतृत्व ने जोखिम भरे निर्णय लिए, जो कभी गलत साबित नहीं हुए. यह अलग बात है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक हुए लगभग तमाम चुनावों में प्रत्याशी नहीं, पार्टी जीतती रही है. इसलिए अनेक अज्ञात तथाकथित नेता सांसद व विधायक बन गए और कुछ को मंत्री बनने का भी सौभाग्य मिला. 


दरअसल भाजपा में नेता नहीं, संगठन सर्वोपरि है. इसलिए कोई भी जीत व्यक्ति की नहीं, पार्टी की मानी जाती है. छत्तीसगढ़ प्रदेश के मामले में राष्ट्रीय नेतृत्व की कथित सलाह पर कोर कमेटी व कार्यसमिति से वरिष्ठ नेताओं की छुट्टी करके उन्हें स्पष्ट संकेत दिया गया है कि उनके सक्रिय राजनीति से रिटायर होने का वक्त आ गया है.


कोर कमेटी से हटाए गए रमन सिंह पंद्रह वर्षों तक मुख्यमंत्री रहने के बाद अब विधानसभा अध्यक्ष हैं. 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान काफी समय तक उनकी कोई खास पूछ-परख नहीं हुई थी. एक तरह से वे हाशिए पर थे. प्रारंभ में उन्हें चुनाव से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों से बाहर ही रखा गया, लेकिन नेतृत्व को इस बात का अहसास होते ही कि पूर्व मुख्यमंत्री की उपेक्षा पार्टी को भारी पड़ सकती है, उन्हें पुनः मुख्यधारा में लाया गया. 


भाजपा ने चुनाव जीता और रमन सिंह की वरिष्ठता देखते हुए उन्हें एक और मौका दिया. उन्हें ‘एडजस्ट’ करना राजनीतिक ज़रूरत थी, लिहाज़ा उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया. बहुत संभव है कि यह उनका आखिरी राजनीतिक सफर हो. उनकी उम्र तथा स्वास्थ्यगत समस्याओं को देखते हुए नहीं लगता कि उन्हें अगले चुनाव का टिकट दिया जाएगा. अलबत्ता यदि वे दिलचस्पी दिखाएं तो उन्हें किसी राज्य का राज्यपाल बनाया जा सकता है. चर्चा रही है कि 2018 के चुनाव में पार्टी की बुरी हार के बाद उन्हें इस आशय का प्रस्ताव दिया गया था, जिसे उन्होंने मंजूर नहीं किया.


कोर कमेटी से जो अन्य नेता बाहर किए गए हैं, उनमें से बृजमोहन अग्रवाल को छोड़कर शेष की सक्रियता पर सवाल उठते रहे हैं. जिन विधायकों को कार्यसमिति में स्थान नहीं मिला, वे भी हैरान-परेशान हैं. उनके असंतोष की जो धीमी लहरें उठ रही हैं, उसके विशेष मायने नहीं हैं, लेकिन बृजमोहन अग्रवाल का मामला सबसे अलग माना जा रहा है. यह बहुत स्पष्टतः नज़र आता रहा है कि रायपुर के सांसद पर केंद्र मेहरबान नहीं है. 


बृजमोहन प्रदेश भाजपा के ताकतवर व लोकप्रिय नेता हैं. चुनाव संचालन में उन्हें महारत हासिल है. किसी समय उन्हें पार्टी का ‘ट्रबलशूटर’ भी माना जाता रहा है. हर कठिन परिस्थिति में उन्होंने स्वयं को साबित किया है. राज्य के अनेक उपचुनावों में पार्टी की जीत के पीछे बृजमोहन की रणनीति कारगर रही है. उन्हें संसदीय कार्यों का भी लंबा अनुभव है. वे मध्यप्रदेश के जमाने में और बाद में अलग बने छत्तीसगढ़ में लगातार विधानसभा सदस्य रहे हैं. 


मध्यप्रदेश में भाजपा की पटवा सरकार व छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार के पंद्रह वर्षों के शासनकाल में महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल के बढ़ते कद से जो अघोषित विरोधी आतंकित रहे हैं, उनमें डॉ. रमन सिंह का भी नाम लिया जाता है. उन्होंने ही अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में बृजमोहन के पर अहिस्ता-अहिस्ता कतरने शुरू किए. उनके मुकाबले में राजेश मूणत को खड़ा किया गया. किंतु कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद बृजमोहन की राजनीतिक सेहत पर प्रभाव नहीं पड़ा और न ही उनकी लोकप्रियता कम हुई. उन्हें प्रदेश की राजनीति से हटाना आसान नहीं था. फिर भी उनके खिलाफ प्रयास जारी रहे. 


2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद यद्यपि वे विष्णुदेव साय सरकार में शामिल कर लिए गए थे, लेकिन उन्हें प्रदेश की राजनीति से दूर रखने की कवायद तेज हो गई. मौका मिला छह माह बाद ही हुए 2024 के लोकसभा चुनाव का. उनकी अनिच्छा के बावजूद उन्हें रायपुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से टिकट दे दिया गया. चुनाव में बंपर जीत के साथ ही अब वे लोकसभा सदस्य हैं. उन्हें प्रदेश की राजनीति से दूर रखने की कोशिश अंततः सफल रही. 


लेकिन बृजमोहन आश्वस्त हैं कि सांसद के रूप में प्रदेश की जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है. उनका मानना है कि राजनीतिक विरोधी कितनी भी कोशिश कर लें, उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे क्योंकि उनके पीछे जनता की ताकत है. कोर कमेटी में अब वे नहीं हैं, किंतु प्रदेश की जनपक्षधर राजनीति में उनका दखल अभी भी यथावत है.


फिर भी यह मान लेना चाहिए कि अब भाजपा में बृजमोहन की राजनीति ढलान पर है. यदि कोई चमत्कार हो जाए और उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में ले लिया जाए तो बात अलग है, लेकिन फिलहाल इसकी संभावना कम ही नज़र आती है.


बहरहाल, कोर कमेटी व कार्यसमिति से दिग्गज नेताओं को बाहर किए जाने के बाद सरकार व संगठन से नाराज़ असंतुष्टों की कतार लंबी होती जा रही है. राज्य विधानसभा के अब तक के सत्रों में विष्णुदेव साय सरकार को दोहरे मोर्चे पर लड़ना पड़ रहा है. मुख्य विपक्ष कांग्रेस तो है ही, दूसरा उसका अपना प्रतिपक्ष अर्थात अपनी ही सरकार से तल्ख सवाल करने वाले वे विधायक हैं, जो असंतुष्ट खेमे का प्रतिनिधित्व करते हैं. अब सवाल है कि क्या केंद्रीय नेतृत्व तथा प्रदेश संगठन कथित असंतुष्टों की मिजाजपुर्सी करेगा? उन्हें शांत करने के लिए कोई मीठी या बहुत कड़वी दवाई दी जाएगी? 


भाजपा की राजनीति को देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसा कुछ नहीं होगा. कोई भी पार्टी से विद्रोह करने की स्थिति में नहीं है. लिहाज़ा चाय में असंतोष का जो थोड़ा-बहुत उबाल दिखाई पड़ रहा है, वह कुछ समय में ही झाग की तरह अपने आप नीचे बैठ जाएगा. लेकिन यदि कार्यकर्ताओं की पूछ-परख नहीं होगी, सत्ता व संगठन में उन्हें सम्मान नहीं मिला, सरकार से संबंधित छोटे-मोटे कार्यों के लिए भी उन्हें तरसाया गया, तो जाहिर है असंतोष का लावा अंदर ही अंदर खदबदाता रहेगा और अवसर मिलते ही बाहर आ जाएगा. बीते ढाई वर्षों में साय सरकार व संगठन के कामकाज से यह स्थिति धीरे-धीरे बनती जा रही है.


फिलहाल राज्य संगठन के संदर्भ में किसी महत्वपूर्ण घटनाक्रम की प्रतीक्षा की जा रही है. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की कार्यकारिणी के शीघ्र गठन की उम्मीद की जा रही है. यह देखना दिलचस्प रहेगा कि संगठन प्रभारी महामंत्री पवन साय के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में जमकर कार्य करने वालों में से किसे राष्ट्रीय संगठन में काम करने का अवसर मिलेगा या केवल जबानी तारीफ ही चलती रहेगी? जो भी हो, पर यह स्पष्ट है कि साय सरकार स्वतंत्र नहीं है. सत्ता के वास्तविक सूत्र संगठन के चंद नेताओं के हाथ में हैं, जिनमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पवन साय का नाम विशेष रूप से चर्चा में रहता है.


* लेखक हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP