कैंसर दवाओं के मार्जिन पर कैप लगाने से भी नहीं कम होंगी कीमतें: विशेषज्ञ
नई दिल्ली । डेस्क: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली नॉन-शेड्यूल दवाओं के मार्जिन पर केंद्र सरकार द्वारा 30 प्रतिशत की सीमा (कैप) तय करने के फैसले से भी कई महंगी और खासकर पेटेंट दवाएं आम जनता के लिए सस्ती नहीं होंगी. सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइजेशन के विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार का ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन कदम पेटेंट कैंसर दवाओं की कीमतों को किफायती स्तर पर लाने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि कंपनियों द्वारा इन दवाओं की शुरुआती बिक्री कीमत ही बहुत अधिक रखी जाती है.
'वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट्स' के सह-संयोजक के. एम. गोपाकुमार के अनुसार, वर्ष 2019 में 30 फीसदी मार्जिन कैप लागू होने के बावजूद रीबोसिक्लिब (Ribociclib) दवा का मासिक खर्च 2022 के 58,000 रुपये से बढ़कर 2025 में 78,000 रुपये हो गया. इसी तरह पेम्ब्रोलिज़ुमाब (कीट्रूडा) की एक शीशी की कीमत आज भी लगभग 1,95,000 रुपये है. ऐसे में महज मार्जिन तय कर देने से यह महंगी दवाएं सामान्य मरीजों की पहुंच में नहीं आ सकतीं.
संगठन की सह-संयोजक ज्योत्सना सिंह का कहना है कि इसके लिए पेटेंट अधिनियम के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों का उपयोग करना आवश्यक है. सरकार को धारा 100 के तहत 'गवर्नमेंट यूज लाइसेंस' और 'अनिवार्य लाइसेंसिंग' (कंपल्सरी लाइसेंस) का सहारा लेना चाहिए, ताकि इन दवाओं के जेनेरिक संस्करणों का उत्पादन शुरू हो सके और इनके अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) की एक ऊपरी सीमा तय की जा सके.
गोपाकुमार ने यह भी ध्यान दिलाया कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने खुदरा बिक्री के लिए अलग से मार्जिन तय नहीं किया है, जिससे बड़े अस्पतालों को 30 प्रतिशत तक का पूरा मार्जिन मिल जाता है.
उन्होंने सुझाव दिया कि अस्पतालों को उनकी खरीद मूल्य से 16 से 20 प्रतिशत से अधिक का मार्जिन लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए. चूंकि एमआरपी और एक ही दवा के कई ब्रांड लॉन्च करने पर कोई सीमा नहीं है, इसलिए कंपनियां अस्पतालों को ज्यादा मार्जिन देने के लिए अधिक एमआरपी वाले नए ब्रांड बाजार में उतार देती हैं.
हालांकि ट्रेड मार्जिन लागू करने का निर्णय घोषित हो चुका है, लेकिन प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है. रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत एक विशेषज्ञ समिति इन दवाओं की सूची को अंतिम रूप देगी.
जन स्वास्थ्य अभियान (JSA) और अन्य संगठनों ने सरकार से निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक लगाने, सभी दवाओं और मेडिकल उपकरणों के ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने, निजी अस्पतालों के सेवा शुल्कों की सीमा तय करने, तथा प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) से निजी अस्पतालों की जांच कराने की मांग की है. साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट बढ़ाकर सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने पर जोर दिया है.