बिहार चुनाव: वोट चोरी व SIR पर हमले को जनता ने नकारा
नई दिल्ली । डेस्क: राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का पूरा चुनावी अभियान स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और 'वोट चोरी' के आरोपों पर केंद्रित था, लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह रणनीति काम नहीं कर पाई. बिहार विधानसभा चुनाव में इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (INDIA) ब्लॉक के खराब प्रदर्शन ने गठबंधन के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
अभियान में देरी, सीट बंटवारे पर आंतरिक कलह, और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर हठधर्मिता कुछ प्रमुख कारण थे जिन्होंने महागठबंधन को उड़ान भरने का मौका नहीं दिया. हालांकि तेजस्वी यादव और राहुल गांधी जैसे शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक रूप से एकजुटता दिखाने की कोशिश की, लेकिन गठबंधन के भीतर की अंदरूनी कलह ने इसकी एकजुटता को प्रभावित किया. नामांकन की अंतिम तिथि करीब होने पर उम्मीदवार चयन और सीट वितरण में अंतिम समय पर लिए गए निर्णय ने मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा किया.
तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने पर आरजेडी का अड़ियल रुख भी गठबंधन को महंगा पड़ा. मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर आरजेडी और कांग्रेस के बीच खींचतान इतनी बढ़ गई थी कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ पर्यवेक्षक अशोक गहलोत को आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद और उनके बेटे तेजस्वी यादव से मिलने के लिए पटना जाना पड़ा. इस विशेष कारण से चुनाव प्रचार में देरी हुई.
23 अक्टूबर को तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद ही उन्होंने अपना चुनाव प्रचार शुरू किया. तेजस्वी यादव को प्रचार के लिए केवल 17 दिन मिले, और इस कम अवधि में, उन्हें हर सार्वजनिक सभा में कम समय देना पड़ा. शुरू में उन्होंने रोज़ाना 10 से 12 जनसभाओं से शुरुआत की, लेकिन दिन बीतने के साथ, उन्हें सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने के लिए लगभग 18 जनसभाओं को संबोधित करना पड़ा.
जिस तरह तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बनने पर अड़े थे, उसी तरह विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी ने उप-मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने पर जोर दिया, जिसने फिर से जनता के बीच उनकी छवि को खराब किया. कांग्रेस पर टिकट 'बेचने' के आरोप, साथ ही पार्टी के पिछले चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों को टिकट न देने के फैसले को भी मतदाताओं ने स्वीकार नहीं किया.
गठबंधन का नेतृत्व कर रहे तेजस्वी यादव ने कई चुनावी वादे किए, जिसमें हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देना शामिल था - जिसे कई लोगों ने अव्यावहारिक माना. आरजेडी और कांग्रेस के पूरे अभियान के दौरान, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और 'वोट चोरी' पर हमला मुख्य विषय था, जो ज़मीन पर काम नहीं कर सका. इतना ही नहीं, 12 विधानसभा सीटों पर गठबंधन के भीतर दोस्ताना मुकाबले ने वोटों का बंटवारा किया.
पिछले एक दशक से, आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी रही थी, जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में 75 सीटें जीती थीं. इस बार, आरजेडी ने INDIA ब्लॉक में सबसे ज़्यादा 143 उम्मीदवार उतारे, लेकिन उसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा. सबसे खराब प्रदर्शन वीआईपी का रहा, जो अपना खाता भी नहीं खोल पाई.
गठबंधन में सहनी को 15 सीटें दी गई थीं. इसी तरह, कांग्रेस को 62 सीटें दी गई थीं, जिनमें से उसने छह सीटें जीतीं. बिहार में तीनों वाम दलों का प्रदर्शन भी उतना ही खराब रहा, जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (लिबरेशन) ने लड़ी गई 20 सीटों में से दो सीटें जीतीं. सीपीआई (एम) ने एक सीट जीती.