रवि, 18 अक्टू. 2026

CGKhabar

अरावली में नए खनन पर रोक: केंद्र ने राज्यों को SC का आदेश लागू करने कहा

C

CG Khabar

25 दिस. 2025, 12:21 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

अरावली पर्वत श्रींखला
अरावली पर्वत श्रींखला

नई दिल्ली । डेस्क: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर अरावली पर्वत श्रृंखला में नए खनन पट्टे आवंटित करने पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया है. मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जब तक एक व्यापक 'प्रबंधन योजना' तैयार नहीं हो जाती, तब तक किसी भी नए खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी. 


हालांकि, जिन मौजूदा खदानों के पास पहले से अनुमति है, वे पर्यावरण मानकों का "कड़ाई" से पालन करते हुए अपना काम जारी रख सकेंगी.

विज्ञापन


पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के हालिया बयानों के अनुरूप उठाए गए इस कदम के तहत भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (ICFRE) को एक 'सतत खनन प्रबंधन योजना' तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. 


यह परिषद उन क्षेत्रों की पहचान करेगी जहां खनन संभव है और उन क्षेत्रों को अलग करेगी जो पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील या संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हैं. मंत्रालय के अनुसार, इस कवायद का उद्देश्य उन क्षेत्रों का दायरा बढ़ाना है जहां खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है.


इस बीच, अरावली की परिभाषा को लेकर विवाद भी जारी है. सरकार ने "स्थानीय राहत से 100 मीटर ऊपर" के मानक को अपनाने की सिफारिश की है, लेकिन विपक्षी दल और पर्यावरण कार्यकर्ता इसकी आलोचना कर रहे हैं. 


कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने इसे "छलावा" करार देते हुए कहा कि 100 मीटर की यह परिभाषा वैज्ञानिक संस्थानों और अदालती समितियों द्वारा पहले ही खारिज की जा चुकी है, जिससे पहाड़ियों के बड़े हिस्से पर खनन का खतरा बना रहेगा. '100 मीटर का नियम' क्या है-


अरावली के संरक्षण और खनन को विनियमित करने के लिए सरकार ने एक समान मानक प्रस्तावित किया है, जिसे '100 मीटर का नियम' कहा जा रहा है. इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:


परिभाषा का आधार: इसके तहत अरावली पर्वतमाला की गणना केवल उन भू-आकृतियों से की जाएगी जिनकी ऊंचाई स्थानीय धरातल (local relief) से 100 मीटर या उससे अधिक है.


बफर जोन: दो ऐसी पहाड़ियों (जो 100 मीटर से ऊंची हों) के बीच की 500 मीटर तक की दूरी को भी संरक्षित माना जाएगा. इस 500 मीटर के दायरे में आने वाली जमीन पर खनन की अनुमति नहीं होगी, चाहे उसकी अपनी ऊंचाई कुछ भी हो.


विवाद का कारण: पर्यावरणविदों और विपक्ष का तर्क है कि अरावली की अधिकांश पहाड़ियां कम ऊंचाई वाली या घिस चुकी हैं. यदि केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही 'अरावली' माना गया, तो लगभग 92% पहाड़ियां (भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार) इस सुरक्षा घेरे से बाहर हो जाएंगी और वहां खनन का रास्ता साफ हो सकता है.


प्रबंधन योजना: भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (ICFRE) अब इसी मानक के आधार पर नक्शा तैयार करेगी कि कौन सा हिस्सा 'पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील' है और कहां 'असाधारण परिस्थितियों' में खनन हो सकता है.


फिलहाल सरकार के पास इस परिभाषा के दायरे में आने वाली पहाड़ियों का सटीक आंकड़ा मौजूद नहीं है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP