गाजा में ट्रंप के 'पीस प्लान' के बीच हमले, इजरायल पर उठे सवाल
गाजा । डेस्क: गाजा पट्टी में युद्धविराम के दूसरे चरण के रोडमैप की घोषणा के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थितियां लगातार बिगड़ती जा रही हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जहां हमास द्वारा गाजा समझौते की शर्तों को स्वीकार करने को क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया था, वहीं गाजा में हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है.
हालिया सप्ताहांत में इजरायली बलों द्वारा तेज किए गए सैन्य अभियानों में दर्जनों फलस्तीनियों की जान जा चुकी है, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. हमास द्वारा चरणबद्ध तरीके से हथियार डालने की सहमति जताने के बावजूद, इजरायल ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए इस योजना पर कड़ा रुख अपनाया हुआ है.
ऐसे में गाजा पर लगातार जारी बमबारी से न केवल अमेरिकी शांति योजना पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि गाजा के निवासियों के लिए मानवीय संकट और अधिक गहरा गया है.
शांति प्रस्ताव और धरातल की कड़वी सच्चाई
वाशिंगटन द्वारा गाजा में पोस्ट-वॉर प्रबंधन के लिए गठित बोर्ड ऑफ पीस और इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (ISF) ने 15-सूत्रीय रोडमैप के आधार पर युद्धविराम लागू करने का दावा किया था. हमास ने इस दस्तावेज को औपचारिक रूप से स्वीकार भी कर लिया है, लेकिन इजरायल की ओर से लगातार हो रहे हमलों के कारण यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या फलस्तीनी गुट इस समझौते पर टिके रह पाएंगे.
गाजा स्थित विश्लेषकों का मानना है कि यदि फलस्तीनी समूह इस प्रक्रिया से पीछे हटते हैं तो इजरायल इसे एक बड़े सैन्य अभियान के बहाने के रूप में इस्तेमाल कर सकता है. इसलिए, फलस्तीनी गुटों के लिए फिलहाल संयम बनाए रखना ही एकमात्र विकल्प नजर आ रहा है ताकि इजरायल को समझौते की विफलता का आरोप लगाने का मौका न मिले.
हथियार और नियंत्रण पर इजरायल की कड़ी शर्तें
रोडमैप को स्वीकार करने के बजाय इजरायली सरकार ने बेहद सख्त शर्तें सामने रख दी हैं. इजरायल की मांग है कि हमास का पूर्ण विसैन्यीकरण किया जाए और उसके सभी हथियार किसी पश्चिमी देश को सौंपे जाएं. इसके साथ ही इजरायल किसी भी फलस्तीनी संस्था को इस विसैन्यीकरण प्रक्रिया में शामिल करने के सख्त खिलाफ है.
इजरायली अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि हमास के पूरी तरह से निरस्त्रीकरण तक सेना की वापसी संभव नहीं है. दूसरी ओर, फलस्तीनी पक्ष का मानना है कि उनकी पहली प्राथमिकता जनता को राहत पहुंचाना और पुनर्निर्माण शुरू करना है. वे अंतरराष्ट्रीय निगरानी में हथियारों को सीमित करने पर तो सहमत हैं, लेकिन अपने प्रतिरोध के अधिकार को पूरी तरह खत्म करने को तैयार नहीं हैं.
इजरायली राजनीति और अक्टूबर चुनाव का गणित
विशेषज्ञों का कहना है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का यह रुख घरेलू राजनीति और आगामी चुनाव से प्रेरित है. आगामी अक्टूबर में इजरायल में आम चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में नेतन्याहू गाजा में अपनी रणनीतिक पकड़ ढीली नहीं करना चाहते.
वह एक तरफ वाशिंगटन के साथ सीधा टकराव टालने के लिए गाजा में सीमित मानवीय सहायता की अनुमति दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ सेना की वापसी जैसे मुख्य मुद्दों पर टालमटोल की नीति अपना रहे हैं.
इजरायली विश्लेषकों का मानना है कि रोडमैप को वास्तविक रूप से लागू करने से नेतन्याहू को बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता है. इसी वजह से इजरायल इस समझौते को औपचारिक रूप देने से बच रहा है और क्रियान्वयन प्रोटोकॉल पर वार्ता ठप पड़ी हुई है.
गाजा के भविष्य पर मंडराता अनिश्चितता का साया
सैन्य मोर्चे पर इजरायल गाजा पट्टी के लगभग 52 प्रतिशत हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है और पूरे क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई की पूरी आजादी की मांग कर रहा है. इसके विपरीत, रोडमैप में एक स्वतंत्र और तकनीकी विशेषज्ञों की फलस्तीनी प्रशासनिक समिति के गठन की बात कही गई है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजरायली सेना का गाजा पर पूर्ण नियंत्रण रहता है, तो किसी भी फलस्तीनी प्रशासन का अस्तित्व बेमानी हो जाएगा और जनता उसे केवल एक कठपुतली के रूप में देखेगी.
इसके अलावा, इजरायल ने मध्यस्थता प्रक्रिया से कतर और तुर्की जैसे देशों को बाहर करने की मांग की है ताकि फलस्तीन के क्षेत्रीय कूटनीतिक प्रभाव को कम किया जा सके. गाजा में बिगड़ते हालात के बीच अब अमेरिकी मध्यस्थता की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं.