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अयातुल्ला खामेनेई की हत्या: ईरान में 'गैरिसन स्टेट' का उदय

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01 मार्च 2026, 06:32 PM 4 मिनट में पढ़ें 1

अयातुल्ला अली खामेनेई
अयातुल्ला अली खामेनेई

तेहरान । डेस्क: अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़ा भूचाल ला दिया है. 1989 से ईरान की कमान संभाल रहे खामेनेई की मृत्यु को 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरानी नेतृत्व के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है. जहाँ एक ओर उनके समर्थक सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने इस हत्या का बदला लेने को देश का "कर्तव्य और वैध अधिकार" घोषित कर दिया है.


ट्रंप का 'मुक्ति' का दावा बनाम जमीनी हकीकत


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सैन्य अभियान को ईरान के लिए "मुक्ति" का क्षण बताया है. उनका तर्क है कि "सिर" (शीर्ष नेतृत्व) को हटा देने से ईरान का शासन तंत्र ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा. ट्रंप ने सीबीएस न्यूज से बातचीत में दावा किया कि वे जानते हैं कि तेहरान में अब कौन कमान संभालेगा.

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हालांकि, सैन्य विशेषज्ञ और राजनीतिक समाजशास्त्री इस आकलन से इत्तेफाक नहीं रखते. जानकारों का मानना है कि केवल हवाई हमलों से शासन परिवर्तन संभव नहीं है. पूर्व अमेरिकी रक्षा उप सहायक सचिव माइकल मुलरॉय के अनुसार, जब तक "जमीनी सेना" या कोई बड़ा आंतरिक विद्रोह न हो, ईरान का सुरक्षा तंत्र खुद को बचाए रखने में सक्षम है.


ईरान का दोहरा सैन्य ढांचा और प्रोटोकॉल


ईरान की ताकत केवल उसकी नियमित सेना (आर्टेश) नहीं, बल्कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और बसीज मिलिशिया है. ये संस्थाएं किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि 'वेलायत-ए फकीह' (इस्लामी न्यायविद् के शासन) के सिद्धांत की रक्षा के लिए बनाई गई हैं.


तेहरान स्थित विश्लेषक होसैन रॉयवरन के अनुसार, ईरान का तंत्र "संस्थागत" है, "व्यक्तिगत" नहीं. यही कारण है कि खामेनेई और उनके करीबी सलाहकार अली शमखानी की मौत के तुरंत बाद, देश के 'सर्वाइवल प्रोटोकॉल' सक्रिय हो गए हैं. सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने घोषणा की है कि एक अंतरिम नेतृत्व परिषद का गठन किया जा रहा है, जिसमें राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल के एक सदस्य शामिल होंगे.


धार्मिकता से राष्ट्रवादी वजूद की ओर


इस संकट के बीच ईरान की रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है. नेतृत्व अब धर्म के बजाय "क्षेत्रीय अखंडता" और "राष्ट्रवाद" के नाम पर लोगों को एकजुट कर रहा है. अली लारीजानी ने चेतावनी दी है कि इजरायल का अंतिम लक्ष्य ईरान का "विभाजन" करना है. इस विमर्श के जरिए सरकार उन धर्मनिरपेक्ष ईरानियों का समर्थन भी हासिल करना चाहती है जो शासन के विरोधी हो सकते हैं, लेकिन देश के बंटवारे के खिलाफ हैं.


राजनीतिक समाजशास्त्री सालेह अल-मुतैरी इसे एक "अंतिम संस्कार का जाल" कह रहे हैं. 40 दिनों के आधिकारिक शोक के कारण सड़कें समर्थकों से भरी रहेंगी, जिससे सरकार विरोधी प्रदर्शनों के लिए जगह कम हो जाएगी.

'रणनीतिक धैर्य' का अंत और 'गैरीसन स्टेट' का डर


खामेनेई के युग में ईरान अक्सर "रणनीतिक धैर्य" की नीति अपनाता था, लेकिन अब वह दौर खत्म होता दिख रहा है. तेहरान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हसन अहमदीयन का कहना है कि ईरान ने जून 2025 के युद्ध से सीखा है कि "संयम को कमजोरी माना जाता है." अब ईरान 'स्कॉर्च्ड अर्थ' यानी सब कुछ जला देने वाली नीति अपना सकता है.


विशेषज्ञों को डर है कि राजनीतिक नियंत्रण ढीला होने पर सैन्य कमांडर और अधिक उग्र हो सकते हैं. अल जजीरा सेंटर फॉर स्टडीज के लीका माकी के अनुसार, यह अपमानजनक खुफिया विफलता ईरान को एक 'गैरीसन स्टेट' (किलाबंद सैन्य राज्य) में बदल सकती है, जहाँ आंतरिक असंतोष को विदेशी साजिश मानकर कुचल दिया जाएगा.


भले ही ईरान का "सिर" हटा दिया गया हो, लेकिन उसका "शरीर" और उसका विशाल मिसाइल शस्त्रागार अभी भी मौजूद है, जो इस क्षेत्र को एक अनिश्चित और विनाशकारी युद्ध की ओर धकेल सकता है.


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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP