पिघलते ग्लेशियर से पानी में घुल रहे एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन
नई दिल्ली । डेस्क : दुनिया भर में बढ़ते प्रदूषण और वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि अब एक नए और गंभीर खतरे की ओर इशारा कर रही है. अब तक ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र-स्तर बढ़ने और तटीय इलाकों के डूबने की आशंका जताई जाती रही है, लेकिन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि खतरा यहीं खत्म नहीं होता.
चीन के वैज्ञानिकों के एक हालिया अध्ययन में दावा किया गया है कि करोड़ों वर्षों से ग्लेशियरों में जमे हुए ऐसे खतरनाक जीन अब पिघलकर नदियों और समुद्रों में मिल रहे हैं, जो भविष्य में जलजनित बीमारियों को और गंभीर बना सकते हैं. ये जीन एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हैं, यानी ये बैक्टीरिया को दवाओं के असर से बचने में मदद करते हैं.
वैज्ञानिकों के अनुसार, गोलबल वार्मिंग से पहले ये जीन ग्लेशियरों में जमे हुए थे और जीव-जगत के लिए खतरा नहीं थे. लेकिन अब ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण ये जीन सक्रिय होकर नदियों, झीलों और पीने के पानी के स्रोतों में पहुंच रहे हैं.
इससे उन इलाकों में स्वास्थ्य संकट गहराने की आशंका है, जहां ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इस्तेमाल होता है.
शोधकर्ताओं ने अंटार्कटिका, आर्कटिक और तिब्बती पठार के ग्लेशियरों से नमूने जुटाकर पाया कि ये जीन प्राकृतिक रूप से बहुत पुराने हैं और लंबे समय तक ठंड में सुरक्षित रहे. लेकिन अब ये आधुनिक बैक्टीरिया के संपर्क में आकर तेजी से फैल सकते हैं.
वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि वायरस के साथ इन जीनों का सह-अस्तित्व संक्रमणों को और जटिल बना सकता है, जिससे इलाज और मुश्किल हो जाएगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियरों को अब सिर्फ जमी हुई बर्फ नहीं, बल्कि ‘जैविक भंडार’ के रूप में देखा जाना चाहिए. यह शोध संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट का कारण भी बन सकता है.