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अनादि से आदि तक या अनिश्चितता से औपचारिकता तक?

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12 जन. 2026, 08:51 AM 5 मिनट में पढ़ें 4

अनादि से आदि तक
अनादि से आदि तक

दिवाकर मुक्तिबोध


ग्यारह साल बाद छत्तीसगढ़ सरकार की मेजबानी में राष्ट्रीय स्तर का तीन दिवसीय साहित्य उत्सव 23 जनवरी से शुरू हो रहा है. इसे रायपुर साहित्य उत्सव आदि से अनादि तक कहा गया है, जिसमें देश भर के सौ से अधिक साहित्यकारों व कला मर्मज्ञों के आमंत्रित रहने की सूचनाएं सोशल मीडिया में काफी दिनों से चल रही हैं.


अब साहित्य उत्सव प्रारंभ होने में मात्र दस दिन शेष हैं लेकिन अभी भी न तो कार्यक्रमों की रूपरेखा की खबर सामने आई है और न ही आमंत्रित अतिथि साहित्यकारों व कलाकारों के नाम सार्वजनिक हुए हैं. और तो और, संभवत: यह भी तय नहीं हुआ कि उत्सव का शुभारंभ तथा समापन समारोह किसके मुख्य आतिथ्य में होगा. वह कोई सत्ताधीश होगा, कोई लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार. 


चूँकि अब बहुत कम दिन शेष है लिहाज़ा संभव है, आजकल में पूरा विवरण सोशल मीडिया व अखबारों में प्रकाशित हो जाए लेकिन कला, साहित्य व संस्कृति से जुड़े किसी भी विद्वान वक्ता का नाम घोषित न होना आश्चर्यजनक है. इससे एक बात यकीनी तौर पर कही जा सकती है कि महीनों से सोशल मीडिया में जिस उत्सव का ढोल पीटा जा रहा है, वह असल में कितना खोखला है. 


क्या यह मान लिया जाए कि इस समारोह में मंच पर वे वक्ता एवं विचारक होंगे जो भाजपा व आरएसएस की रीती नीति व विचारधारा के पोषक अथवा समर्थक होंगे? जिस तरह ' ढ़की-छिपी ' तैयारियों का मिजाज नज़र आ रहा है, उसे देखते हुए ऐसा मान लेने में कोई हर्ज नहीं है.



प्रदेश में वर्ष 2023 दिसंबर से भाजपा की विष्णुदेव साय सरकार चल रही है. पिछले वर्ष नवंबर में छत्तीसगढ़ ने अपनी स्थापना के पच्चीस वर्ष पूर्ण किए थे. इन वर्षों में कांग्रेस कुल आठ साल सत्ता में रही, जबकि भाजपा ने पूर्व में लगातार पंद्रह वर्षों तक शासन किया और अब पुन: सत्ता में है. 


साहित्य उत्सव के संदर्भ में भाजपा शासन के दौरान के दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम याद आते हैं, जिन्हें राष्ट्रीय प्रतिष्ठा मिली क्योंकि सत्तारूढ दल ने जिसका नेतृत्व डॉक्टर रमनसिंह कर रहे थे, इन्हें अपनी राजनीतिक विचार धारा का संवाहक नहीं बनने दिया. 


नया रायपुर के पुरखौती मुक्तांगण में प्रथम रायपुर साहित्य महोत्सव 12 दिसंबर 2014 से 14 दिसंबर 2014 के बीच सम्पन्न हुआ. इसके पूर्व वर्ष 2005 में राजनांदगांव में जो तीन दिवसीय साहित्यिक आयोजन हुआ वह प्रख्यात कवि, आलोचक व कथाकार स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध , पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी व बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृति में निर्मित त्रिवेणी स्मारक के उद्घाटन के संदर्भ में था. किंतु मुख्यत: वह मुक्तिबोधजी के साहित्यिक अवदान पर केन्द्रित था. 


चूंकि उनकी स्मृति में वह प्रदेश ही नहीं देश में पहला वृहद कार्यक्रम था अत: राजनीतिक विचारधारा से परे, देश-प्रदेश के ख्यातनाम लेखकों व कवियों को इसमें आमंत्रित किया गया था, जिनमें वाम व प्रगतिशील विचारक भी शामिल थे. राज्य में सरकार बीजेपी की थी, फिर भी उनकी उपस्थिति पर किसी प्रकार का विवाद नहीं हुआ. 


अलबत्ता रायपुर में वर्ष 2014 के महोत्सव में वामपंथी खेमे में ही वाम लेखकों के द्वारा भाजपा सरकार के आमंत्रण को स्वीकार करने एवं महोत्सव में शामिल रहने के मुद्दे पर खासी बहस छिड़ी तथा लानत मलानत की गई लेकिन वैचारिकता के सम्मान की दृष्टि से इस महोत्सव को देशव्यापी ख्याति मिली. 


ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि जनसम्पर्क व संस्कृति विभाग में उच्च सरकारी पदों पर बैठे हुए आयोजन के कर्ता-धर्ता न केवल सामाजिक जीवन में कला-साहित्य-संस्कृति के महत्व को समझते थे वरन आयोजन की तैयारियों की दृष्टि से भी उन्हें प्रदेश के विद्वानों से परामर्श लेने में कोई हिचक नहीं हुई. 


जहां तक मुझे ज्ञात है, आयोजन में प्रख्यात आलोचक स्वर्गीय डॉक्टर राजेंद्र मिश्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी. यह भी महत्वपूर्ण है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री रमनसिंह ने इस मामले में जरा भी हस्तक्षेप नहीं किया था और न ही अपनी पसंदगी लादी थी. जो नामचीन साहित्यकार व रंगकर्मी रायपुर साहित्य महोत्सव में शामिल हुए थे उनमें से कुछ प्रमुख हैं -सर्वश्री अशोक वाजपेयी, विनोद कुमार शुक्ल, नरेश सक्सेना, विष्णु खरे, केदार नाथ सिंह, नंदकिशोर आचार्य, मैत्रेयी पुष्पा, प्रयाग शुक्ल, पुरुषोत्तम अग्रवाल, अशोक चक्रधर, सुधीर सक्सेना, तेजिंदर, लीलाधर मंडलोई, रमेश अनुपम , सुशील त्रिवेदी, संजीव बख्शी, नादिरा बब्बर, गीताश्री, विनय पाठक, जयप्रकाश, मृदुला सिन्हा, सच्चिदानंद जोशी सहित राज्य के अनेक मूर्धन्य रचनाकार. 


समारोह में करीब बारह सत्र छत्तीसगढ़ी साहित्य,कला व संस्कृति पर केन्द्रित थे. कार्यक्रम स्थल पुरखौती मुक्तांगण में जो चार मंडप बनाए गए, वे छत्तीसगढ़ के दिवंगत मनीषियों के नाम पर थे-गजानन माधव मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय व हबीब तनवीर.


वर्ष 2014 के रायपुर साहित्य महोत्सव की अप्रतिम सफलता को अशोक वाजपेयी के बाद के वक्तव्य के एक अंश से समझा जा सकता है. उन्होंने कहा-"पहला प्रयत्न, इतना महत्वकांक्षी, इतना लोकप्रिय व सफल ! थोड़े अचरज की बात जरूर है. बताया गया कि मुख्यमंत्री डॉक्टर रमनसिंह ने अपने वक्तव्य में वैचारिक असहमति का स्वागत करते हुए उसे शिक्षाप्रद बताया. वे उद्घाटन वक्तव्य भर के लिए मंच पर आए लेकिन बाकी वक्त श्रोताओं के बीच बैठे रहे. यही संस्कृति मंत्री ने किया. सिर्फ परिसर में नहीं, पूरे परिवेश में खुलापन था, स्वतंत्रता थी. आप पर कोई बंदिश नहीं थी, आप क्या कहें."


ऐसे में 2005 तथा 2014 में सम्पन्न साहित्यिक आयोजनों की तुलना जनवरी 2026 में प्रस्तावित इस साहित्य उत्सव से करना तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता. पूर्ववर्ती आयोजनों की विशिष्टता उनकी वैचारिक उदारता, संस्थागत पारदर्शिता और साहित्यिक समुदाय की व्यापक भागीदारी में निहित थी. इसके विपरीत, वर्तमान आयोजन के संदर्भ में कार्यक्रम की संरचना, आमंत्रित वक्ताओं और बौद्धिक दिशा को लेकर जो अनिश्चितता और अस्पष्टता बनी हुई है, वह इसके घोषित उद्देश्यों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है. आयोजन समिति के दावों और जमीनी तैयारियों के बीच स्पष्ट असंगति है. ऐसी स्थिति में यह आशंका स्वाभाविक है कि यह साहित्य उत्सव साहित्यिक विमर्श को समृद्ध करने के बजाय, एक औपचारिक, सीमित और प्रतीकात्मक आयोजन बनकर न रह जाए.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP