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अपनों के ही हमलों से बेचैन साय सरकार

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21 दिस. 2025, 08:54 AM 7 मिनट में पढ़ें 3

साय सरकार
साय सरकार

दिवाकर मुक्तिबोध


घटना अप्रत्याशित ही थी. सोलह दिसंबर की. छत्तीसगढ़ विधान सभा के 14 दिसंबर से 17 दिसंबर के विशेष शीतकालीन सत्र के तीसरे दिन आपसी सवाल-जवाब के दौरान कांग्रेस की विधायक संगीता सिन्हा ने सत्ता पक्ष के जुझारू विधायक अजय चंद्राकर को प्रस्ताव दिया कि वे 15 विधायकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो जाए तो उन्हें मुख्यमंत्री बना देंगे. उनका कहना था कि सदन में चरणदास महंत की अनुपस्थिति में चंद्राकर विपक्ष के नेता की भूमिका निभा रहे हैं. इसलिए वे इधर आ जाएं. 


जाहिर है चंद्राकर ने इसका ताबड़तोड़ जवाब दिया और बात आई-गई हो गयी. फिर भी इसने विमर्श के लिए एक सुरसुरी तो छोड़ ही दी है. यद्यपि प्रदेश में भाजपा की सत्ता पर कतई राजनीतिक संकट नहीं है तथापि वर्ष 2001 में अजीत जोगी के मुख्य मंत्री रहते दलबदल की उस घटना को नहीं भूलना चाहिए, जब तरूण चटर्जी की नुमाइंदगी में भाजपा के बारह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे, जिनमें चटर्जी व अन्य को मंत्री बना दिया गया. 


क्या बीस साल बाद ऐसी कोई उठापटक संभव है? शायद नहीं. क्योंकि कांग्रेस में अब विद्याचरण शुक्ल अथवा अजीत जोगी जैसे 'तोड़फोड़' वाले नेता नहीं है. लिहाज़ा संजारी बालोद से निर्वाचित कांग्रेस की विधायक संगीता सिन्हा के ऑफर और सदन में उग्र तेवर दिखा रहे चंद भाजपाइयों के प्रदर्शन से किसी निष्कर्ष पर पहुंचना बेमानी ही होगी.


दरअसल छत्तीसगढ़ विधानसभा के इस मिनी सत्र में भी सत्ता पक्ष के कुछ वरिष्ठ विधायकों ने वैसी ही आक्रामकता दिखाई, जैसा कि वे पूर्व के सत्रों में भी दिखाते रहे हैं. इनमे सबसे ज्यादा मुखर अजय चंद्राकर हैं, जो रमनसिंह के पंद्रह वर्षीय शासन काल में प्रमुख विभागों के मंत्री रह चुके हैं. 


2023 में भाजपा के विधान सभा चुनाव जीतने के बाद केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर जिन वरिष्ठ विधायकों को सदन की सामान्य बेंच पर ही जगह मिली हुई है, उनमें अजय चंद्राकर भी हैं. सदन में उनकी आक्रामकता तब भी थी जब वे सरकार में शामिल थे तथा विपक्ष के हमलों का जवाब पूरी तैयारी के साथ देते थे. अब वे सदन में पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं. किंतु अपनी ही सरकार पर उनकी आक्रामकता अब अधिक धारदार नज़र आ रही है. पिछले सत्रों के दौरान भी सवाल पर सवाल दागदार अजय विभागीय मंत्रियों को असहज कर चुके हैं. 


शीत सत्र के पहले ही दिन यानी 14 दिसंबर को, जिसका कांग्रेस ने बहिष्कार किया था, राज्य सरकार के विज़न डाक्यूमेंट 2047 पर भी उन्होंने जोरशोर से अपनी बात रखी थी. वित्त मंत्री ओ पी चौधरी के इस दस्तावेज पर विचार विमर्श के दौरान उनका अभिमत था कि प्रस्तावित योजनाओं में राज्य में कौशल विकास व कुटीर उद्योगों को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए ताकि रोजगार के सृजन के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था सुधरे तथा सही मायने में छत्तीसगढ़ विकसित प्रदेश की श्रेणी में आ जाए. 


चंद्राकर ने विजन 2047 के संदर्भ में सरकार को राज्य की जमीनी हकीकत से रूबरू किया था. इस विजन दस्तावेज में अजय चंद्राकर की बातों का कितना ख्याल रखा जाएगा, यह समय ही बतायेगा. अलबता सत्र के अगले दिनों में भी चंद्राकर ही नहीं, वरिष्ठ विधायक धरम लाल कौशिक, सुशांत शुक्ला व अन्य ने भी विभिन्न मामलों में कथित भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए तथा जांच के साथ ही सदन में चर्चा की मांग की. अपने ही विधायकों के ऐसे सवालों से जाहिर है सरकार असहज हुई.


सरकार के कामकाज पर सवालिया निशान लगाने वाले कतिपय भाजपा विधायकों की सदन में ऐसी सक्रियता को भले ही विपक्ष के साथ तालमेल न कहा जाए पर इससे यह संदेश तो पसरता ही है कि पार्टी में सब कुछ ठीक नही है. दरअसल साय सरकार के मंत्रिमंडल के गठन के बाद ही उन विधायकों के सुर बदले हुए हैं जिन्हें मंत्री बनने की उम्मीद थी. लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व ने अप्रत्याशित रूप से ऐसा मंत्रिमंडल दिया, जिसमें पहली बार के विधायक भी मंत्री व उप मुख्य मंत्री बन गए. 


अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत सरीखे उन वरिष्ठ विधायकों के लिए बड़ा झटका था जो यह मानकर चल रहे थे कि उनका पद कहीं नहीं गया है. उम्मीद तब और टूटी जब तीन माह पूर्व मंत्रिमंडल के विस्तार में भी उनकी उपेक्षा की गई. इसलिए उनके लिए अंगूर फिलहाल खट्टे ही नज़र आ रहे हैं. 


हालांकि एक अवसर तब आ सकता है जब प्रदर्शन के आधार पर कुछ मंत्रियों की छुट्टी कर दी जाए ताकि मंत्रिमंडल के पुनर्गठन का मार्ग प्रशस्त हो सके. वैसे भी देर-सबेर यह होना ही है क्योंकि खस्ता हाल स्वास्थ्य विभाग सहित अधिकांश विभागों के मंत्री वांछित प्रभाव नहीं ही दिखा पा रहे हैं. मुख्यमंत्री साय का यह कहना कि सभी मौजूदा सभी मंत्री अपना कार्यकाल पूरा करेंगे, राजनीतिक जुमलेबाजी ही लगती है.


बहरहाल, सवाल पर सवाल दाग कर लगभग विपक्ष की भूमिका निभा रहे अपने विधायकों को 'कायदे' में रहने की नसीहत देना बहुत विनम्र व सरल मुख्य मंत्री के बस में नहीं है. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बिना यह संभव नहीं होगा. चूंकि सदन में सरकार से सवाल पूछने का संवैधानिक अधिकार सभी सदस्यों को है इसलिए अजय चंद्राकर हो या कोई और, वे अपने नैतिक व संसदीय दायित्व का निर्वाह ही कर रहे हैं और ऐसा करना स्वस्थ लोकतंत्र की दृष्टि से अच्छा ही है. 


अलबत्ता प्रदेश संगठन चाहे तो सांकेतिक रूप से अपेक्षाकृत अधिक सक्रियता दिखाने वाले अजय चंद्राकर सरीखे सदस्यों को निर्देशित कर सकता है कि ऐसे सवाल न पूछे जाएं जिनसे उसकी किरकिरी होती हो. आगामी सत्र में भी सरकार को घेरने के मामले में विपक्ष का काम हल्का करने वाले इन भाजपा विधायकों का रूख पूर्ववत रहता है तो संभव है कि भविष्य में ऊपर से कोई दिशा निर्देश जारी हो जाए. क्योंकि 2028 के चुनाव की दृष्टि से अगले तीन वर्ष सरकार व संगठन के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे.


इन दिनों खूब चर्चा है कि विष्णुदेव साय सरकार भीतर व बाहर दोनों तरफ से तरफ से घिरी हुई है. मुख्य मंत्री विराट राजनीतिक व प्रशासनिक अनुभव के बावजूद असहाय से नज़र आते हैं. एक वज़ह यह है कि विधान सभा अध्यक्ष रमनसिंह सत्ता सत्ता का समानांतर केन्द्र बने हुए हैं. 


पंद्रह वर्षों तक मुख्य मंत्री रहते हुए रमन सिंह ने सत्ता व संगठन पर अपनी पकड़ काफी मजबूत बना ली थी. वह एक हद तक अभी भी कायम है. वे अपनी राजनीतिक हैसियत को इतनी ऊंचाई पर ले गए हैं कि 2018 में उनके नेतृत्व में पार्टी के चुनाव हारने के बावजूद केन्द्रीय नेतृत्व उन्हें किनारे नहीं लगा सका. 2023 के विधान सभा के चुनाव के दौरान उन्हें चुनाव परिदृश्य से अलग-थलग रखने की कोशिश की गई थी पर अंतत : आला नेतृत्व को उन्हें महत्व देना पड़ा. 


इसका परिणाम यह रहा कि भाजपा ने 90 में से 54 सीटें जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया. उस समय बंपर जीत के आर्किटेक्ट भले ही और भी रहे हों पर विष्णुदेव साय के साथ रमनसिंह भी मुख्य मंत्री के रेस में थे. लेकिन तूफानी बदलाव के दौर से गुज़र रही पार्टी में उम्रदराज रमन सिंह के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी, फिर भी उनके राजनीतिक रूतबे को कायम रखते हुए उन्हें विधान सभा अध्यक्ष के पद से नवाजा गया. सत्ता व संगठन में उनकी अहमियत व मान सम्मान किस कदर कायम है, इसकी झलक उस एक घटना से भी मिलती है, जब नवंबर में राज्य स्थापना के रजत जयंती समारोह के अवसर पर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से उनकी खूब प्रशंसा की. तत्काल बाद इसके राजनीतिक अर्थ निकाले जाने लगे थे. चर्चाएं शुरू हो गई थीं.


बहरहाल कड़े अनुशासन के कारण प्रदेश भाजपा में असंतोष भले ही उभर कर सामने न आ रहा हो किंतु जिनकी सत्ता में भागीदारी नहीं हो पा रही, वे बेचैन हैं अत: अपने-अपने तरीके से वे स्वयं को अभिव्यक्त कर रहे हैं. इन्हें जब तक सुना नहीं जाएगा, सदन व सदन के बाहर उनकी आवाजें गूंजती रहेंगी.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP