आर्सेलर मित्तल की जनसुनवाई विवादों में
आर्सेलर मित्तल की जनसुनवाई में हंगामा
दंतेवाड़ा | संवाददाता: आर्सेलर मित्तल निप्पोन स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तावित आयरन ओर बेनीफिशिएशन प्लांट की क्षमता 8 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 12 मिलियन टन प्रतिवर्ष किए जाने को लेकर आयोजित पर्यावरण स्वीकृति की लोक सुनवाई मंगलवार को विवादों में घिर गई. लोक सुनवाई के दौरान की गई व्यवस्थाओं को लेकर जनप्रतिनिधियों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और इसे जनता के साथ अपमानजनक व्यवहार बताया.
लोक सुनवाई में एक दर्जन से अधिक ग्राम पंचायतों के सरपंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत के पूर्व व वर्तमान जनप्रतिनिधि तथा बस्तर संभाग के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता मौजूद थे. सुनवाई का उद्देश्य परियोजना से प्रभावित क्षेत्र की जनता की राय, आपत्तियों और सुझावों को सुनना था, लेकिन मंच की संरचना और अधिकारियों के बैठने की व्यवस्था ने पूरे आयोजन पर सवाल खड़े कर दिए.
सिंहासन जैसी व्यवस्था, जाली के बाहर जनता
लोक सुनवाई के लिए जिस मंच का निर्माण किया गया था, वह सामान्य से काफी ऊंचाई पर बनाया गया था. मंच पर अपर कलेक्टर और क्षेत्रीय पर्यावरण संरक्षण मंडल के अधिकारी बैठे थे. मंच के चारों ओर लोहे की मोटी जाली लगाई गई थी, जिससे मंच पूरी तरह ढका हुआ नजर आ रहा था. इसके बाहर जनता और जनप्रतिनिधियों के लिए खड़े होकर माइक के माध्यम से अपनी बात रखने की व्यवस्था की गई थी.
इस दृश्य को देखकर कई जनप्रतिनिधि आहत हो गए. उनका कहना था कि यह लोक सुनवाई कम और किसी राजा-महाराजा के दरबार जैसा अधिक प्रतीत हो रहा था, जहां अधिकारी सिंहासन पर बैठे हों और जनता को दूर, जाली के बाहर खड़ा कर दिया गया हो.
पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष तूलिका कर्मा का तीखा विरोध
लोक सुनवाई के दौरान पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष तूलिका कर्मा का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने मंच और व्यवस्थाओं पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि यह लोक सुनवाई नहीं बल्कि “अकबर का दरबार” लग रहा है.
उन्होंने कहा कि पर्यावरण स्वीकृति की प्रक्रिया में अधिकारियों को जनता के बीच बैठकर उनकी समस्याएं सुननी चाहिए, न कि खुद को राजा की तरह ऊंचे मंच पर स्थापित करना चाहिए.
तूलिका कर्मा ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था से साफ जाहिर होता है कि जनता की राय को गंभीरता से लेने का कोई इरादा नहीं है.
उन्होंने इसे जनता और जनप्रतिनिधियों का खुला अपमान बताते हुए लोक सुनवाई का बहिष्कार किया और कार्यक्रम स्थल से बाहर निकल गईं.
आदिवासियों के अधिकारों पर सवाल
कड़पमाल के सरपंच ने भी लोक सुनवाई के दौरान कड़ा विरोध दर्ज कराया. उन्होंने कहा कि यहां के पहाड़, मिट्टी और पानी पर पहला अधिकार आदिवासियों का है, लेकिन लगातार इन्हें कंपनियों को सौंपा जा रहा है.
उन्होंने सवाल उठाया कि आयरन हिल के नीचे बसे दर्जनों गांवों को कंपनियों ने विकास के नाम पर क्या दिया है.
सरपंच ने कहा कि गांवों की स्थिति यह है कि लोग धूल फांकने को मजबूर हैं, खून जैसे लाल रंग का प्रदूषित पानी पी रहे हैं और पिछले 60 वर्षों से आदिवासी समाज बेबसी की जिंदगी जी रहा है. ऐसे में उत्पादन क्षमता बढ़ाने की बात करना स्थानीय लोगों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है.
पेसा एक्ट और पांचवीं अनुसूची का उल्लंघन
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संयुक्त महासचिव उमाशंकर शुक्ला ने भी लोक सुनवाई की व्यवस्था पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि उन्होंने कई लोक सुनवाई देखी हैं, लेकिन पहली बार ऐसी लोहे की जाली देखी है, जिसने अधिकारियों और जनता के बीच दीवार खड़ी कर दी हो.
उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है और यहां पेसा एक्ट लागू है. इसके बावजूद अधिकारियों का यह रवैया चौंकाने वाला और झकझोर देने वाला है. उमाशंकर शुक्ला ने आरोप लगाया कि पर्यावरण स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया महज एक ढोंग है, क्योंकि केंद्र सरकार पहले ही परियोजना को अनुमति दे चुकी है. लोक सुनवाई सिर्फ औपचारिकता निभाने के लिए की जा रही है.
नदियों के दोहन और प्रदूषण पर चिंता
उमाशंकर शुक्ला ने क्षेत्र की नदियों की स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि इंद्रावती नदी में पहले ही पानी की भारी कमी है. डंकनी और संकनी नदियों को एनएमडीसी द्वारा प्रदूषित किया जा चुका है और अब शबरी नदी के पानी के दोहन की प्रक्रिया तेज की जा रही है.
उन्होंने बताया कि शबरी नदी में विशेष प्रजाति का झींगा पाया जाता है, जो पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होंने सवाल उठाया कि इस प्रजाति के संरक्षण के लिए कंपनी के पास क्या ठोस योजना है. जब तक कंपनी इस बारे में स्पष्ट और संतोषजनक योजना प्रस्तुत नहीं करती, तब तक शबरी नदी से एक बूंद पानी का दोहन नहीं होने दिया जाएगा.
उन्होंने सुझाव दिया कि कंपनी अपने माल का परिवहन पाइपलाइन या नदी के पानी के जरिए करने के बजाय रेल लाइन या ट्रकों के माध्यम से करे, ताकि स्थानीय जलस्रोतों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े.
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पर्यावरण स्वीकृति की लोक सुनवाई की पारदर्शिता और उद्देश्य पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि जनता की आवाज को इस तरह दबाया जाएगा और अधिकारियों व कंपनियों के बीच दूरी नहीं, बल्कि दीवार खड़ी की जाएगी, तो ऐसी लोक सुनवाई का कोई औचित्य नहीं रह जाता.