जी20 में US की अनुपस्थिति: ग्लोबल साऊथ को अवसर
जोहान्सबर्ग । डेस्क: दुनिया की 20 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का जी20 सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में हो रहा है. लेकिन इस बार अमेरिका की कुर्सी खाली है. अमेरिका ने कोई बड़ा अधिकारी नहीं भेजा. इससे सब चिंतित हैं. सहयोगी देश परेशान, दुश्मन देश खुश, और चीन, रूस व भारत जैसे देशों को मौका मिल गया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न्योता ठुकरा दिया. उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में गोरे लोगों पर बहुत हमले हो रहे हैं और उनकी जमीन छीनी जा रही है. ये दावे साबित नहीं हुए. न ट्रंप आए, न कोई बड़ा अमेरिकी नेता. सिर्फ दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले छोटे अमेरिकी अधिकारी वहां हैं. राजनयिक कहते हैं कि ये दक्षिण अफ्रीका को सजा देने जैसा है. अमेरिका बहुपक्षीय मंचों से दूर हो रहा है.
इससे सभी देशों का संयुक्त बयान तैयार करना मुश्किल हो गया. आयोजक पहले ही योजना छोटी कर चुके हैं. अमेरिका बड़े फैसलों का समर्थन नहीं करेगा. दक्षिण अफ्रीका के लिए ये बड़ा झटका है. ये अफ्रीका का पहला जी20 सम्मेलन है. देश अपनी नेतृत्व की छवि बनाना चाहता था, लेकिन अब बदनामी हो रही है. अफ्रीका और गरीब देशों (वैश्विक दक्षिण) के नेतृत्व पर असर पड़ेगा.
इस खाली जगह का फायदा चीन उठा सकता है. ये दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. रूस भी मजबूत दिखना चाहता है, जैसे सोवियत समय में था. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी ताकत से हिस्सा ले रहे हैं. अमेरिका के उलट, भारत जी20 में हमेशा सक्रिय रहता है. इससे भारत की साख बढ़ेगी. पूर्व विदेश सचिव पिनक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं, "अब चीन, यूरोप और भारत जैसे देश बड़े फैसले ले सकते हैं. ये वैश्विक अर्थव्यवस्था और गरीब देशों की मदद करेंगे."
सम्मेलन में मुश्किल मुद्दे हैं. जैसे जलवायु परिवर्तन रोकना, महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन बदलना (ताकि कोई एक देश हावी न हो), और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को कंट्रोल करना. अमेरिका के बिना गरीब देशों के मुद्दे आसान हो सकते हैं. जैसे कर्ज माफ करना, जलवायु के लिए समान पैसा देना, डिजिटल सुविधाएं और एआई नियम.
लेकिन समस्या ये है कि अमेरिका के बिना ये फैसले लागू कौन करेगा? दुनिया के ज्यादातर देश इन्हें मानेंगे या नहीं, ये देखना बाकी है. राजनयिक कहते हैं कि ये बदलाव दुनिया को बहुध्रुवीय बना सकता है. यानी एक से ज्यादा देशों का प्रभाव. या फिर BRICS जैसे नए समूह मजबूत हो सकते हैं. भारत, चीन, रूस और दक्षिण अफ्रीका इसे बढ़ावा देते हैं. लेकिन ये अभी जी7 या जी20 जितने मजबूत नहीं बने.
ये जी20 का महत्वपूर्ण पल है. अमेरिका के बिना उभरते देश अपनी भूमिका निभाएंगे. दक्षिण अफ्रीका के लिए चुनौती है, लेकिन गरीब देशों के लिए नया रास्ता खुल रहा है. अंत में जो संयुक्त बयान आएगा, वही बताएगा कि क्या ये एक नई दुनिया की शुरुआत है या सहयोग में और दरार.
BRICS क्या है?
बीआरआईसीएस (BRICS) दुनिया के तेजी से बढ़ते उभरते देशों का एक महत्वपूर्ण समूह है. यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो आर्थिक सहयोग, राजनीतिक संवाद और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए बनाया गया है. मूल रूप से यह ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (BRIC + S) के नाम पर रखा गया. यह समूह वैश्विक दक्षिण (गरीब और विकासशील देशों) की आवाज को मजबूत करने का प्रयास करता है, ताकि दुनिया में अमेरिका और यूरोप जैसे पश्चिमी देशों का एकतरफा प्रभाव कम हो. आज बीआरआईसीएस के 11 सदस्य देश हैं, जो दुनिया की आधी आबादी, 40% जीडीपी और 26% व्यापार को कवर करते हैं.
BRICS का इतिहास
बीआरआईसीएस की शुरुआत 2001 में गोल्डमैन सैक्स के एक अर्थशास्त्री जिम ओ'नील के विचार से हुई, जिन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन को भविष्य की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं बताया. 2006 में ये चार देश पहली बार रूस में मिले. 2009 में न्यूयॉर्क में पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन हुआ, जहां BRIC नाम से समूह बना. 2010 में दक्षिण अफ्रीका शामिल हो गया, और नाम BRICS हो गया.
2014 में न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना हुई, जो विश्व बैंक का विकल्प है. 2023-2024 में समूह का विस्तार हुआ. 2024 के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को पूर्ण सदस्यता मिली. 2025 में इंडोनेशिया 6 जनवरी को शामिल हुआ. अब यह 11 देशों का समूह है.
उद्देश्य और लक्ष्य
BRICS का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है. यह वैश्विक व्यवस्था को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने पर जोर देता है. प्रमुख लक्ष्य हैं:
आर्थिक सहयोग: व्यापार बढ़ाना, निवेश को प्रोत्साहन देना और विकास परियोजनाओं के लिए फंडिंग.
राजनीतिक संवाद: वैश्विक मुद्दों जैसे जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, शांति और सुरक्षा पर एकजुट रुख.
वैश्विक दक्षिण की आवाज: विकासशील देशों के हितों को G7 या संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर मजबूत करना.
बहुपक्षीयता: विश्व बैंक, आईएमएफ जैसे पश्चिमी संस्थानों के विकल्प बनाना.
BRICS कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, बल्कि आर्थिक और कूटनीतिक मंच है.