दवाएं सस्ती करने पर संसदीय पैनल सख्त
नई दिल्ली । डेस्क: संसदीय समिति ने दवा कंपनियों और सरकार को फटकार लगाते हुए जल्द से जल्द एक बड़ा नीतिगत फैसला लेने को कहा है ताकि आम जनता को सस्ती दवाएँ मिल सकें. यह मामला ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 के तहत दवाओं पर ट्रेड मार्जिन रैशनलाइज़ेशन यानी मुनाफाखोरी पर लगाम लगाने से जुड़ा है.
संसद की रसायन और उर्वरक मामलों की स्थायी समिति ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि फार्मास्युटिकल्स विभाग और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने ट्रेड मार्जिन रैशनलाइज़ेशन लागू करने में बहुत देर कर दी है. समिति ने इस बात पर चिंता जताई कि कई ज़रूरी और आम बीमारियों की दवाएँ बाज़ार में बहुत ऊंचे दामों पर बिक रही हैं, जिसका मुख्य कारण ट्रेड मार्जिन पर कोई नियंत्रण न होना है.
समिति ने याद दिलाया कि ट्रेड मार्जिन रैशनलाइज़ेशन का तरीका कोविड-19 महामारी के दौरान और 42 महंगी कैंसर रोधी दवाओं पर पहले भी इस्तेमाल किया गया है, जिसके अच्छे नतीजे आए थे. कैंसर की दवाओं पर इसे लागू करने से 526 ब्रांडों के दाम औसतन 50% तक कम हो गए थे और मरीज़ों को सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की बचत हुई थी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रेड मार्जिन रैशनलाइज़ेशन को 2019-2020 में लागू किया गया था और अब करीब पाँच साल बीत चुके हैं, लेकिन ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 में इसे स्थायी रूप से लागू करने के लिए ज़रूरी बदलाव अब तक नहीं किए गए हैं. पैनल ने इस देरी पर नाराज़गी जताते हुए कहा कि इससे दवाओं के दाम कंट्रोल करने में अनावश्यक देरी हो रही है.
फार्मास्युटिकल्स विभाग ने समिति को बताया कि इस बारे में सभी हितधारकों से राय ली जा रही है, लेकिन कुछ बातों पर सहमति नहीं बन पा रही है. हालांकि, विभाग ने माना कि ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाना ही आगे बढ़ने का सही रास्ता है और इस पर जल्द ही एक नीतिगत फैसला लेने की ज़रूरत है.
समिति का सीधा संदेश है कि सरकार और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी तुरंत इस मामले की समीक्षा करें और ट्रेड मार्जिन रैशनलाइज़ेशन को लागू करने के लिए उचित नियम लाएं ताकि देश के साधारण नागरिकों को कम कीमत पर दवाएँ मिल सकें.