छत्तीसगढ़: ग्रामीण शिक्षा का बुरा हाल

नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: छत्तीसगढ़ के गांवों में शिक्षा का बुरा हाल है. इसका खुलासा ‘असर’ के हालिया सर्वे से हुआ है. जिसमें छत्तीसगढ़ के गांवों में बच्चों के घरों में जाकर सर्वे किया गया. जो नतीजे सामने आये वे चौंकाने वाले हैं. ‘असर’ ने छत्तीसगढ़ के 16 जिलों के गांवों में जाकर अपना सर्वे किया है. इस सर्वे में 8वीं कक्षा तक के बच्चों के पढ़ने तथा गणित की जानकारी की क्षमता का विश्लेषण किया गया है. कई मामलों में तो यह पाया गया कि शिक्षा का स्तर साल 2010 की तुलना में नीचे गिरा है.

* ग्रामीण छत्तीसगढ़ में 5वीं कक्षा के 56 फीसदी छात्र-छात्रायें ही 3री कक्षा के पाठ पढ़ सकते हैं. जिसमें से सरकारी स्कूलों के 51 फीसदी तथा निजी स्कूलों के 75.9 फीसदी ही 5वीं कक्षा के पाठ पढ़ सकते हैं. यह 2016 का आंकड़ा है. जबकि इसकी तुलना में 2010 में 5वीं कक्षा के 61.6 फीसदी छात्र-छात्रायें 3री कक्षा के पाठ सकते थे. इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले 6 सालों में ग्रामीण शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है.


* इसी तरह से 8वीं कक्षा के 73.5 फीसदी छात्र-छात्रायें ही 2री कक्षा के पाठ पढ़ सकते हैं. जिसमें 70.9 फीसदी सरकारी स्कूलों के तथा 89.9 फीसदी निजी स्कूलों में पढ़ते हैं. यह 2016 का ताजा आंकड़ा है. इसकी तुलना में 2010 में 8वीं कक्षा के 92.7 फीसदी छात्र-छात्रायें 2री कक्षा के पाठ पढ़ सकते हैं. यहां भी शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है.

* इसी तरह से 3री कक्षा के 28.1 फीसदी छात्र-छात्रायें 2री कक्षा के पाठ पढ़ सकने की हालात में हैं. इसमें साल 2010 की तुलना में सुधार आया है. साल 2010 में मात्र 11.3 फीसदी ही 2री कक्षा के पाठ पढ़ने में सक्षम पाये गये थे.

* जहां तक गणित का सवाल है यह पाया गया कि 3री कक्षा के 3.8 फीसदी छात्र-छात्रायें 1 से 9 तक की संख्या को नहीं पहचान पाते हैं. 38.6 फीसदी 9 तक की संख्या को पहचान पाते हैं परन्तु 99 तक की संख्या को वे नहीं पहचान पाते हैं. 37.6 फीसदी 99 तक की संख्या को पहचान पाते हैं परन्तु इन्हें घटाना नहीं आता है. 16.5 फीसदी को घटाना आता है परन्तु उन्हें विभाजन करना नहीं आता है.

* कक्षा 5वीं के 23.1 फीसदी छात्र-छात्राओं को विभाजन आता है जबकि साल 2010 में इससे ज्यादा 38.9 फीसदी को विभाजन आता था. इसी तरह से कक्षा 8वीं के 28.1 फीसदी को विभाजन आता है जबकि साल 2010 में 77.6 फीसदी को विभाजन आता था. इस तरह से इस मामले में भी शिक्षा का स्तर गिरा है.

* जहां तक अंग्रेजी पढ़ने की बात है 3री कक्षा के 22.8 फीसदी छात्र-छात्रायें अंग्रेजी का कैपिटल लेटर नहीं पढ़ पाते हैं. 23.2 फीसदी अंग्रेजी का कैपिटल लेटर पढ़ सकते हैं परन्तु स्माल लेटर नहीं पढ़ सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015-16 में, अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में स्कूल और उच्च शिक्षा पर भारत में केंद्रीय सरकारी खर्च कम था. भारत के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 3 फीसदी खर्च हुआ है जबकि रूस में 3.8 फीसदी, चीन में 4.2 फीसदी, ब्राजील में 5.2 फीसदी, और दक्षिण अफ्रीका में 6.9 फीसदी खर्च किया गया है.

इसके अलावा भारत में शिक्षक के पदों में रिक्तियां लगातार बनी रहती हैं. लोकसभा में दिए एक जवाब के अनुसार, देश भर के सरकारी स्कूलों में 60 लाख शिक्षकों के पदों में से करीब 9,00,000 प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक पद रिक्त हैं.

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