RBI ने करीब साढे तीन साल बाद रेपो रेट 25 बीपीएस बढ़ाया
नई दिल्ली । डेस्क: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने देश में बढ़ती महंगाई और जारी पश्चिम एशिया संकट के दबाव को देखते हुए करीब साढे तीन साल के अंतराल के बाद बेंचमार्क रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर इसे 5.5 फीसदी कर दिया है. द्विमासिक मौद्रिक नीति का ऐलान करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने सर्वसम्मति से रेपो रेट बढ़ाने का फैसला लिया है.
इसके साथ ही एमपीसी ने अपना रुख 'न्यूट्रल' से बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना न के बराबर है.
आरबीआई का यह कदम उसकी पिछली मौद्रिक नीतियों के मुकाबले एक बड़ा बदलाव दर्शाता है. इससे पहले केंद्रीय बैंक ने फरवरी 2023 में रेपो रेट बढ़ाकर 6.50 फीसदी किया था और पूरे 2023-24 में दरें स्थिर रखने के बाद 2025 से दरों में कटौती का सिलसिला शुरू किया था.
हालांकि, अगस्त में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82 फीसदी पर पहुंच गई, जो जुलाई में 4.45 फीसदी थी.
रेपो रेट में इस बढ़ोतरी का सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा. नए होम लोन, ऑटो लोन और कॉरपोरेट लोन महंगे हो जाएंगे, जबकि मौजूदा कर्जदारों की ईएमआई (EMI) में इजाफा होगा.
भारतीय केंद्रीय बैंक ने यह कदम वैश्विक परिस्थितियों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व व यूरोपियन सेंट्रल बैंक द्वारा हाल में महंगाई पर काबू पाने के लिए की गई दर बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए उठाया है.
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) द्वारा रेपो रेट बढ़ाए जाने का सीधा मतलब यह है कि वाणिज्यिक बैंकों को केंद्रीय बैंक से लोन लेना महंगा पड़ेगा. जब बैंकों को आरबीआई से महंगी दर पर कर्ज मिलता है, तो वे इसका बोझ आम ग्राहकों और व्यवसायों पर डालते हैं. इसका अर्थव्यवस्था और आम जनता पर व्यापक तथा गहरा असर देखने को मिलता है.
आम जनता पर असर
1) लोन और ईएमआई (EMI) महंगे होंगे: रेपो रेट बढ़ते ही बैंक अपने होम लोन, ऑटो लोन, पर्सनल लोन और कॉरपोरेट लोन की ब्याज दरों में इजाफा कर देते हैं. इसका सबसे ज्यादा असर मौजूदा कर्जदारों पर पड़ता है, क्योंकि उनकी मासिक किस्त (EMI) बढ़ जाती है या फिर लोन की अवधि (Tenure) लंबी हो जाती है. नए लोन लेने वालों को भी अधिक ब्याज चुकाना पड़ता है.
2) मांग और खर्च में कमी: ईएमआई और कर्ज महंगे होने के कारण लोगों के पास खर्च योग्य आय कम बचती है. इससे लोग घर, गाड़ी, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य बड़ी खरीदारी को टालने लगते हैं, जिससे आम जनता की क्रय शक्ति (Purchasing Power) प्रभावित होती है.
3) बचतकर्ताओं को फायदा: रेपो रेट बढ़ने का एक सकारात्मक पहलू यह है कि बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और अन्य बचत योजनाओं पर मिलने वाले ब्याज की दरों में बढ़ोतरी करते हैं. इससे बैंक में पैसे जमा करने वाले आम नागरिकों और वरिष्ठ नागरिकों को उनकी जमा राशि पर बेहतर रिटर्न मिलता है.
अर्थव्यवस्था पर असर
1) महंगाई पर नियंत्रण: रेपो रेट बढ़ाने का प्राथमिक उद्देश्य अर्थव्यवस्था में बढ़ती महंगाई को काबू में करना होता है. जब लोन महंगे होते हैं, तो बाजार में पैसों का फ्लो (Liquidity) घटता है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की मांग में कमी आती है और कीमतें स्थिर होने लगती हैं.
2) आर्थिक विकास (GDP) की रफ्तार धीमी होना: जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो कंपनियां और कारोबारी नए प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज लेने से कतराते हैं या अपने विस्तार की योजनाओं को रोक देते हैं. व्यावसायिक निवेश में कमी आने और उपभोक्ता खर्च घटने के कारण अल्पकालिक रूप से देश की जीडीपी (GDP) ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी धीमी हो सकती है.
3) विदेशी निवेश और रुपये को मजबूती: उच्च ब्याज दरें विदेशी निवेशकों को देश के बांड और वित्तीय बाजारों की ओर आकर्षित करती हैं. इससे देश में विदेशी मुद्रा का आगमन बढ़ता है, जिससे अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये को मजबूती मिलती है और आयात (विशेषकर कच्चा तेल) सस्ता होने में मदद मिलती है.
संक्षेप में, आरबीआई का यह कदम महंगाई को कम करने और अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए उठाया गया एक कड़ा फैसला होता है, जिसका तात्कालिक असर आम जनता की जेब और बाजार की रफ्तार पर पड़ता है.