भारत की अंतरिक्ष सुरक्षा रणनीति: 'बॉडीगार्ड सैटेलाइट्स'
नई दिल्ली । डेस्क: भारत, एक उभरती हुई अंतरिक्ष शक्ति के रूप में, अपनी सैटेलाइट्स को सुरक्षित रखने के लिए नए और अभिनव कदम उठा रहा है. 2024 में एक भारतीय सैटेलाइट और विदेशी अंतरिक्ष यान के बीच टक्कर टलने की घटना के बाद, भारत ने अपनी सैटेलाइट्स की सुरक्षा के लिए "बॉडीगार्ड सैटेलाइट्स" की योजना पर विचार शुरू किया है. यह कदम न केवल अंतरिक्ष मलबे से उत्पन्न खतरों का सामना करने के लिए है, बल्कि साइबर हमलों, रेडियो हस्तक्षेप और भू-राजनीतिक खतरों से भी निपटने की रणनीति का हिस्सा है. इस दिशा में भारत नए रडार, टेलीस्कोप और लिडार (LiDAR) जैसी उन्नत तकनीकों को भी शामिल करने की योजना बना रहा है.
अंतरिक्ष में बढ़ते खतरे
आज सैटेलाइट्स वैश्विक संचार, नेविगेशन, मौसम निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हैं. लेकिन जैसे-जैसे कक्षा में सैटेलाइट्स की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे जोखिम भी बढ़ रहे हैं. अंतरिक्ष मलबा, जो एक छोटे स्क्रू से लेकर बड़े रॉकेट हिस्सों तक हो सकता है, 28,000 किमी प्रति घंटे की गति से चलने वाले सैटेलाइट्स के लिए घातक साबित हो सकता है. इसके अलावा, रेडियो सिग्नल जामिंग, साइबर हमले और अन्य देशों के सैटेलाइट्स द्वारा संदिग्ध गतिविधियाँ भी खतरे को बढ़ा रही हैं.
भारत ने इन खतरों से निपटने के लिए बेंगलुरु में इंडियन स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस एंड मैनेजमेंट (IS4OM) केंद्र स्थापित किया है, जो सैटेलाइट्स की निगरानी, खतरनाक टकरावों की चेतावनी और टकराव से बचने के लिए युद्धाभ्यास का समन्वय करता है. 2023 में भारतीय सैटेलाइट्स ने 10 से अधिक टकराव-रोधी युद्धाभ्यास किए. प्रोजेक्ट NETRA के तहत, भारत श्रीहरिकोटा में मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार के साथ-साथ देश भर में नए रडार और टेलीस्कोप स्थापित कर रहा है. फिर भी, निरंतर निगरानी की क्षमता अभी भी सीमित है.
'बॉडीगार्ड सैटेलाइट्स' की अवधारणा
भारत अब "बॉडीगार्ड सैटेलाइट्स" की तैनाती पर विचार कर रहा है, जो महत्वपूर्ण सैटेलाइट्स के साथ रहकर उनकी निगरानी करेंगे, संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाएंगे और आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप करेंगे. ये सैटेलाइट्स लिडार तकनीक से लैस हो सकते हैं, जो नजदीकी खतरों का पता लगाने और प्रतिक्रिया समय को बढ़ाने में मदद करेगी. यह विचार वैश्विक रुझानों को दर्शाता है, जहां प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियाँ रक्षात्मक और आक्रामक सैटेलाइट तकनीकों का परीक्षण कर रही हैं.
साइबर और रेडियो खतरों से निपटना
सैटेलाइट्स के लिए साइबर हमले एक बड़ा खतरा हैं. 2022 में युक्रेन संकट के दौरान वायसैट नेटवर्क पर साइबर हमले ने यूरोप में इंटरनेट सेवाओं को बाधित कर दिया था. भारत में, CERT-In ने 2025 में सैटेलाइट ऑपरेटरों के लिए दिशानिर्देश जारी किए, जिनमें मजबूत एन्क्रिप्शन, नेटवर्क सेगमेंटेशन, सुरक्षित क्रेडेंशियल्स और नियमित पैचिंग पर जोर दिया गया. इसके अलावा, IN-SPACe के नए लाइसेंसिंग ढांचे के तहत निजी ऑपरेटरों को सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा.
भारत का क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम नाविक (NavIC) भी इन खतरों से जूझ रहा है. नाविक ने 2016 से कई परमाणु घड़ी विफलताओं का सामना किया है, और 2025 में NVS-02 सैटेलाइट की लॉन्चिंग में इंजन वाल्व की खराबी के कारण यह सही कक्षा में नहीं पहुंच सका. यदि एक और सैटेलाइट विफल होता है, तो नाविक की नेविगेशन सेवाएँ प्रभावित हो सकती हैं. ISRO नेविगेशन मैसेज ऑथेंटिकेशन (NMA) का परीक्षण कर रहा है, जो सिग्नल की प्रामाणिकता सुनिश्चित करेगा.
सौर तूफानों से सुरक्षा
सौर तूफान सैटेलाइट्स के इलेक्ट्रॉनिक्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं और कक्षा से बाहर धकेल सकते हैं. भारत की आदित्य-L1 मिशन, जो सूर्य का अध्ययन करने के लिए L1 लैग्रेंज बिंदु पर तैनात है, सौर गतिविधियों की चेतावनी दे सकता है. यह ऑपरेटरों को सैटेलाइट्स को सुरक्षित मोड में रखने या युद्धाभ्यास की योजना बनाने में मदद करता है.
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भविष्य की योजनाएँ
भारत ने 2024 में इंटर-एजेंसी डेब्रिस कोऑर्डिनेशन कमेटी (IADC) की मेजबानी की और 2030 तक 'मलबा-मुक्त अंतरिक्ष मिशन' की घोषणा की. यह 2019 के विवादास्पद एंटी-सैटेलाइट टेस्ट से एक बड़ा बदलाव है, जिसने मलबा पैदा किया था. सरकार ने 2026 से शुरू होने वाले 52 नए निगरानी सैटेलाइट्स के लिए ₹27,000 करोड़ की योजना को मंजूरी दी है. निजी स्टार्ट-अप भी अंतरिक्ष-आधारित निगरानी सैटेलाइट्स के साथ योगदान दे रहे हैं.
भारत की सैटेलाइट सुरक्षा रणनीति में IS4OM, प्रोजेक्ट NETRA, लिडार सैटेलाइट्स, और बॉडीगार्ड सैटेलाइट्स जैसे कदम शामिल हैं. साइबर सुरक्षा, सौर तूफान पूर्वानुमान, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी इस रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं. जैसे-जैसे अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, भारत का यह बहुस्तरीय दृष्टिकोण न केवल इसकी संपत्तियों की रक्षा करेगा, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष समुदाय में इसकी स्थिति को भी मजबूत करेगा. (फोटो- प्रतीकात्मक)