NFHS-6 फैक्टशीट से कोविड के आंकड़े गायब
नई दिल्ली । डेस्क: केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)-6 की फैक्टशीट को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. सर्वेक्षण के दौरान कोविड-19 महामारी के प्रभाव, स्वच्छता (शौचालय की उपलब्धता) और रसोई ईंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत आंकड़े जुटाए गए थे, लेकिन मंत्रालय द्वारा जारी की गई आधिकारिक फैक्टशीट से यह डेटा पूरी तरह गायब है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन आंकड़ों के सामने न आने से महामारी के वास्तविक प्रभाव और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत को समझना मुश्किल हो जाएगा.
सर्वेक्षण का दायरा और कोविड से जुड़े सवाल:
यह देशव्यापी सर्वेक्षण 27 फील्ड एजेंसियों के माध्यम से दो चरणों में आयोजित किया गया था. पहला चरण 28 मई, 2023 से 26 फरवरी, 2024 तक और दूसरा चरण 7 फरवरी, 2024 से 31 दिसंबर, 2024 तक चला. इस दौरान देश के 6,79,238 परिवारों, 7,16,397 महिलाओं और 1,00,977 पुरुषों से जानकारी जुटाई गई थी.
सर्वेक्षण में कोविड-19 से जुड़े सात विशिष्ट प्रश्न शामिल थे, जिनमें परिवार में किसी सदस्य के संक्रमित होने, अस्पताल में भर्ती होने, इलाज पर हुए जेब के खर्च (आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंस) और यहां तक कि महामारी के कारण हुई मौतों की जानकारी मांगी गई थी.
शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर यह डेटा जारी किया जाता, तो भारत में कोविड के वास्तविक आर्थिक और मानवीय प्रभाव को समझने में बड़ी मदद मिलती, विशेषकर तब जब आधिकारिक मृत्यु का आंकड़ा 5,33,849 है जबकि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां इसे चार गुना अधिक बताती हैं.
पैरामीटर्स में बड़ी कटौती:
पिछले सर्वेक्षण (NFHS-5) में जहां 131 पैरामीटर्स पर डेटा जारी किया गया था, वहीं NFHS-6 में इसे घटाकर केवल 101 कर दिया गया है. चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार फैक्टशीट में शिशु मृत्यु दर (IMR), नवजात मृत्यु दर (NMR) और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर जैसे बुनियादी स्वास्थ्य संकेतकों को भी शामिल नहीं किया गया है.
उज्ज्वला और स्वच्छ भारत अभियान के आकलन पर असर:
फैक्टशीट में स्वच्छता और ईंधन से जुड़े आंकड़ों का न होना भी नीतिगत विश्लेषकों को खटक रहा है. सर्वेक्षण में शामिल 'क्या आपके पास शौचालय की सुविधा है?' जैसे सवालों के बावजूद स्वच्छता संबंधी डेटा को बाहर रखा गया है. इसी तरह, रसोई ईंधन के मुख्य स्रोतों से जुड़ा डेटा भी गायब है, जिससे केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' (PMUY) के वास्तविक प्रभाव का सटीक मूल्यांकन करना अब कठिन हो गया है. इसके अलावा, वयस्क साक्षरता से जुड़े आंकड़े भी इस रिपोर्ट का हिस्सा नहीं बन सके हैं.
दिल्ली स्थित सामाजिक अनुसंधान संगठन 'सिग्मा' के मुख्य कार्यकारी अधिकारी यू. वी. सोमयाजुलु ने पुष्टि की है कि जमीन पर इन सभी विषयों पर डेटा एकत्र किया गया था. उन्होंने बताया कि इस बार के सर्वेक्षण में कुछ नए बदलाव किए गए थे, जैसे प्रवासन (migration), डिजिटल साक्षरता और हेपेटाइटिस बी/सी की जागरूकता को जोड़ा गया था, जबकि एनीमिया की जांच को बायोमार्कर से हटाकर केवल जागरूकता तक सीमित कर दिया गया.
हालांकि, स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने रिपोर्ट की प्रस्तावना में कहा है कि ये अनुमान सरकारी फ्लैगशिप योजनाओं की प्रगति को ट्रैक करने में मदद करेंगे, लेकिन महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के गायब होने से इस दावों पर सवाल उठ रहे हैं. Symbolic Photo.