एक पीड़िता का ट्रायल है ‘पिंक’

Sunday, September 18, 2016

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taapsee pannu in pink

रायपुर | जेके कर: फिल्म ‘पिंक’ दरअसल एक सेक्स पीड़िता का ट्रायल है जिसमें उससे ‘उस रात’ घटी घटना को लेकर फिर से प्रताड़ित किया जाता है. ‘पिंक’ में तीन लड़कियां और तीन लड़के. लड़की पर जबरदस्ती की कोशिश, लड़की (तापसी पन्नू) का विरोध, लड़के के सिर पर बोतल दे मारना, उसके बाद अपने ऊपर किये जा रहे जुल्म का विरोध करने की सजा भुगतने को फिल्माया गया है.

‘पिंक’ समाज को आयना दिखाती है कि एक लड़की को ‘ना’ कहने के बाद किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है. यदि ‘हां’ कर देती तो इतना बवाल नहीं मचता. तापसी पन्नू के ‘ना’ के बाद उसपर इतने तोहमत लगाये जाते हैं कि एकबारगी लगता है कि शायद ‘हां’ कह देती तो इतना हाय-तौबा नहीं मचती है.
PINK | Official Trailer |

आज समाज में, हर शहर में, हर गली में यही हो रहा है. लड़की को उसकी ‘वर्जिनिटी ब्रेक’ करने के लिये मजबूर किया जाता है. यदि ‘ना’ करती है तो उसके हर कदम को शंका की नज़र से देखा जाता है. यदि लड़की आत्मनिर्भर है, रात को आना-जाना करती है तो उस पर समाज में सेक्स वर्कर होने की तोहमत लगा दी जाती है.

||समाज में पुरुष आइने के पीछे खड़ा होता है और औरत सामने. जिसमें उसकी स्कर्ट की लंबाई, उसके जूते के हिल, उसके बालों के रंग, होठों पर लगी लिपस्टिक के रंग से उसका कैरेक्टर तय किया जाता है. लड़कों से कभी नहीं पूछा जाता है उसने अब तक कितनी लड़कियों को छेड़ा है, कितने के साथ रेप किया है, क्या पहनता है, क्या पीता है. क्योंकि वह आइने के पीछे खड़ा होता है. जहां से कुछ भी आइने में नहीं दिखता है. इसलिये समाज भी अपनी आखें बंद कर लेता है.||

पुरुषों में शराब पीना स्टेटस सिंबल माना जाता है. तर्क दिया जाता है कि शराब पीना सेहत के लिये अच्छा होता है. यदि यही शराब लड़की पीये तो वह चरित्रहीन कहलाती है. उसके चरित्र को सस्ता समझकर उसे ‘इशारे’ किये जाते हैं. मान गई तो फॉरवर्ड नहीं तो ‘नीच औरत’ का तगमा लगा दिया जाता है.

इस फिल्म में पीड़िता याने तापसी पन्नू की आवाज़ बने हैं अमिताभ जो बॉलीवुड में अपने आवाज़ के दम पर, डॉयलाग बोलने के ढ़ंग के कारण शिखर पर पहुंचे हैं. फिल्म का निर्माण ‘विक्की डोनर’ तथा ‘पीकू’ के सूजित सरकार ने किया है. फिल्म देखने के समय बोध होता है की पुरुषवादी सोच ही महिलाओं के दुर्दशा के लिये जिम्मेदार है.

फिल्म की नायिका तापसी पन्नू भी अपने असल जिंदगी में इसी तरह के अनुभव से गुजर चुकी है. तापसी कहती है “मैं दिल्ली की हूं और मैं यहां पली-बड़ी हूं. मेरे लिए छेड़छाड़ और फर्जी फोन आना रोजाना की बात थी. यह सब हर दिन हमारे साथ कभी बस स्टॉप पर, बसों में और बाजारों में होता रहता था.”

तापसी ने एक घटना का वर्णन करते हुए कहा कि “मैं सिख हूं और उस समय 14 या 15 साल की थी. एक बार मैं गुरु नानक देव की वर्षगांठ पर गुरुद्वारा गई थी और अपने दोस्त के साथ पंक्ति मैं खड़ी थी, तभी मुझे एहसास हुआ कि कोई मुझे छेड़ने की कोशिश कर रहा है. मैंने अपने आप को संभाले रखने की कोशिश की. हालांकि, मेरे अंदर इतनी क्षमता नहीं थी कि पीछे पलटकर उस व्यक्ति को देख सकूं.”

जाहिर है कि समाज में लड़की सुरक्षित नहीं है यही फिल्म ‘पिंक’ में फिल्माया गया है.

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