छत्तीसगढ़: प्रेमचंद जयंती मनाई

Monday, August 1, 2016

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प्रेमचंद जयंती

बिलासपुर | समाचार डेस्क: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर लिखने-पढ़ने वाले तथा सड़क पर लड़ने वालों से एक साथ खड़े होने की जरूरत पर जोर दिया गया. प्रेमचंद जयंती पर प्रगतिशील लेखक संघ बिलासपुर ने ‘इस कारपोरेट समय में प्रेमचन्द’ विषय पर गंभीर चर्चा का आयोजन किया.

जानीमानी रंगकर्मी और लेखक ऊषा बैरागकर आठले ने व्याख्यान में विषय वस्तु को विस्तार से रखा. उन्होंने कहा प्रेमचन्द की चिंताएं आज कारपोरेट युग में किसानों के जीवन में गंभीर संकट के रूप में मुंहबाये खड़ा है.

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में इवनिंग टाइम्स सभाकक्ष में रविवार शाम प्रसिद्ध रंगकर्मी और लेखक उषा बैरागकर आठले ने प्रेमचन्द और कारपोरेट लूट से सबसे ज्यादा प्रभावित किसानों और संसाधनों की लूट पर विस्तार से आधार वक्तव्य दिया. उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुये कहा कि प्रेमचन्द जिस खतरे की ओर अपने लेखन में बार-बार कह रहे थे वह और ज्यादा भयावह रूप में आज किसानों के सामने गंभीर संकट बन गया है.

उन्होंने अपने संबोधन में कहा किसानों की संस्कृति उनके जीने के संसाधन छीन कर उन्हें पूरी तरह से हाशिये पर ढकेला जा रहा है. उन्हें बायोमास में बदल दिया गया है. समाज की रीढ माने जाने वाला तबका मनुष्य के जीने के मूल अधिकार से वंचित किया जा रहा है. किसानों की जमीन उधोग लील रहे है, जल-जंगल-जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को निर्मम तरीके से छीना जा रहा है. सवाल यह भी है कि जब किसान ही विलुप्त हो जायेगा तब खाद्य का क्या होगा. अब सरकारों को अपने मतदाताओं तक की चिंता नहीं बची हैं.

उषा वैरागकर आठले ने शोषण के बदलते रूप को रेखांकित करते हुये कहा कि शोषण तो पहले भी होता ही था लेकिन साम्राज्यवादी हमले में और सामंती पूंजीवादी हमले में मूलतः फर्क था कि जब हम बगावत करते थे तब साधन हमारे स्वाधीन हुआ करते थे. अब जब हमला हो रहा है तब हमारी ज़मीन, जमीन के रूप में नहीं रह गई है. कोयला या दूसरे संसाधन अब हमारे उस रूप में नहीं रह गये है. यह सब अब उनके हाथ में आ गये हैं. हमारे संघर्ष के हथियार अब हमारे हाथ से निकल से गये है.
प्रेमचंद के लिखे और उनके किये को आज संघर्ष मे उतारने की जरूरत है.

प्रोफेसर शीतेन्द्र नाथ चौधरी ने वक्तव्य पर चर्चा की शुरुआत की. नंदकश्यप, अजय आठले, शाकिर अली, श्रीमती विध्या गोवधर्न, प्रताप ठाकुर, रफीक खान, सुनील चिपडे, प्रियंका, नमिता घोष और डा. लाखन सिंह ने अपने विचार रखे.

अध्यक्षता प्रलेस छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष नथमल शर्मा ने की और कहा कि आज के समय में मुक्तिबोध की वह पंक्तियाँ पूरी तरह सटीक उतरती है कि पार्टनर तुम्हारी पोलटिक्स क्या है? यह पोलटिक्स ही सबकी भूमिका तय करेगी. उन्होंने बताया कि सभी सांस्कृतिक और लेखक संगठनों के साझा मंच की प्रक्रिया शुरू हो रही है जिससे कि वे साझा लड़ाई, साझा रूप में एक मंच से व्यक्त कर सकें.

सचिव शोभित बाजपेयी ने संचालन किया. सभा में चंद्र प्रकाश बाजपेयी, हबीब खान, उषा किरण बाजपेयी, कपूर वासनिक, नीलोत्पल शुक्ला, सविता प्रथमेश, मोहम्मद रफीक, डॉ. सत्यभामा अवस्थी, नंदनी पाण्डेय, अमीश श्रीवास, अजय अग्रवाल, श्रीमती देवरस, प्रथमेश मिश्रा, नवल शर्मा आदि उपस्थित थे.

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