किसान मरे नहीं तो क्या करें

Friday, January 8, 2016

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छत्तीसगढ़ का किसान

दिवाकर मुक्तिबोध
लालसाय पुहूप. आदिवासी किसान. उम्र करीब 33 वर्ष. पिता – शिवप्रसाद पुहूप. स्थायी निवास – प्रेमनगर विकासखंड स्थित ग्राम कोतल (सरगुजा संभाग, छत्तीसगढ़). ऋण – 1 लाख. ऋणदाता बैंक – सेंट्रल बैंक प्रेमनगर शाखा. बैंक का ऋण वसूली नोटिस – लोक अदालत में 10 हजार रुपये जमा. आत्महत्या दिनांक – 26 दिसंबर 2015. वजह – कर्ज न पटा पाने से मानसिक संताप. सबूत – सुसाइडल नोट. प्रशासन का पक्ष – जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होगी.

छत्तीसगढ़ में पिछले 4-5 महीनों में बैंक के कर्जदार किसानों की आत्महत्याओं का यह 36वां प्रकरण है. ऋणग्रस्तता की वजह से जिंदगी खत्म कर देने वाले और भी कई नाम है – मसलन – रेखराम साहू (धमतरी), केजूराम बारले (अभनपुर), गोकुल साहू (आरंग), मानसिंह (कोण्डागांव), रघुराम मंडावी (विश्रामपुर), शत्रुहन देवांगन (छुरिया), बलिराम सोनवानी (भाटापारा), जागेश्वर कुमार (कोरबा) आदि आदि.

और तो और नए वर्ष की शुरुआत भी फांसी की घटनाओं से हुई. बेमेतरा जिले के सनकपाट गाँव के 55 वर्षीय किसान फिरंगी राम साहू ने फांसी लगाकर जान दे दी. इस सीमांत कृषक ने बैंक से कर्ज लिया हुआ था. नए वर्ष में आत्महत्या की दूसरी घटना मुंगेली जिले के बावली गाँव में घटी. शत्रुहन साहू भी कर्जदार था. 36 से 38 हुए ये आंकड़े चौकाने वाले है और राज्य में किसानों की बदहाली का जीता – जागता सबूत भी.

बीते वर्ष यानी 2015 में छत्तीसगढ़ में वर्षा औसत से कम हुई फलत: धान की फसल लगभग चौपट हो गई. सरकार ने 117 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित करके व्यापक पैमाने पर किसानों की मदद के तथाकथित उपाय किए है लेकिन आत्महत्या की घटनाएं नहीं थम रही है. जान देने वाले अलग – अलग जिलों के हैं जिनमें आदिवासी किसान भी शामिल है. सभी सीमांत कृषक है. दो-ढाई एकड़ जोत के मालिक. प्राय: सभी ने खेती के लिए ऋण ले रखा है और उसे अदा न कर पाने व बैंकों के वसूली अभियान से संतप्त होकर जान दी है.

जैसा कि आमतौर होता है – राज्य सरकार भूख से हुई मौतों एवं अकाल व सूखे के कारण होने वाली आत्महत्या की घटनाओं को स्वीकार नहीं करती लिहाजा छत्तीसगढ़ में अब तक किसानों की खुदकुशी के जितने भी मामले सामने आए है संबंधित जिला प्रशासन ने कारण कुछ और बताए है. फसल के चौपट होने एवं सरकारी व राष्ट्रीय बैंकों द्वारा ऋण वसूली के लिए बनाए गए दबाव को नहीं. कतिपय मामलों में ऐसा संभव है लेकिन यह भी अपनी जगह सत्य है कि सूखे की वजह से खेतों के सूख जाने तथा बैंक कर्ज की अदायगी में नाकामयाबी की वजह से जो मानसिक उत्पीड़न हुआ है, जान देने की एक बड़ी वजह यह भी है, जैसा कि परिजन बताते हैं.

राज्य विधानसभा में प्रतिपक्ष कांग्रेस ने किसानों की आत्महत्या की घटनाओं पर स्थगन प्रस्ताव जरुर पेश किया किन्तु इस मुद्दे पर न तो वह सदन में कोई दबाव बनी सकी और न ही विधानसभा के बाहर, शहर और गाँवों की सड़कों पर किसानों के हक में कोई प्रभावशाली प्रदर्शन कर सकी. अलबत्ता किसान नेताओं ने अपने स्तर पर अपनी जमात को इकट्ठा कर रखा है और उनका धरना-प्रदर्शन व आंदोलन लगातार जारी है.

कांग्रेस ने केवल इतना किया उसने आत्महत्या की प्रत्येक घटनाओं पर अपनी जांच बैठायी. टीम गठित की जिसने क्षेत्र का दौरा किया और प्रभावितों से बातचीत की. प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने दावा किया कि उसने 53 मामलों की जांच कराई जिसमें तकरीबन हर मामले में किसान की आत्महत्या की वजह फसल चौपट होने के कारण गहरी निराशा या ऋण अदा नहीं कर पाने और परिवार के भरण-पोषण की चिंता हैं.

कांग्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के राजनांदगाँव, बालोद, दुर्ग, बेमेतरा, धमतरी, रायपुर, कोण्डागाँव, बलौदाबाजार, भाटापारा आदि में किसान आत्महत्या की घटनाएँ घटी. अकेले राजनांदगाँव जिले में एक दर्जन से अधिक किसानों ने खुदकुशी की.

किसान आत्महत्या प्रकरणों के संदर्भ में आम आदमी पार्टी का भी यही मत है. प्रदेश संयोजक और कृषि विशेषज्ञ संकेत ठाकुर के अनुसार पार्टी के संज्ञान में 29 मामले आए. इनमें से 8 की विस्तार से जांच रिपोर्ट राज्य मानवाधिकार आयोग को सौंपी गई है लेकिन इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई. महाराष्ट्र के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि किसान आत्महत्या करता है तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है.

1 नवंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर एक पृथक राज्य के रुप में अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ न केवल प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध है वरन खेती किसानी के मामले में विशेषकर धान के उत्पादन में देश में अग्रणी रहा है. विपुल उत्पादन की वजह से उसे धान के कटोरे के रुप में विशेषीकृत किया जाता है बावजूद इसके कि सिंचाई सुविधाओं के सवाल पर वह अभी भी फिसड्डी है जबकि राज्य की भाजपा सरकार ने बीते महीने में ही अपनी बारहवीं वर्षगांठ मनाई है. यानी खेती में उसकी उत्पादकता मूलत: प्रकृति पर आश्रित रही है.

इन 12 वर्षों में राज्य पहली बार सूखे की जबरदस्त मार झेल रहा है हालांकि वर्ष 2000-2001 में भी अल्पवर्षा की वजह से अकाल ने दस्तक दी थी लेकिन राज्य बनने की खुशी में इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया. वैसे भी अकाल का प्रभाव प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से शहरों में कम, गाँवों में ज्यादा नजर आता है. वह पूरी आबादी को समान रुप से प्रभावित नहीं करता. विश्वविख्यात अर्थशास्त्री एवं नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्तय सेन के अनुसार अकाल हमेशा एक विभाजक प्रक्रिया होती है. पीडि़त लोग अमूमन समाज के सबसे निचले तबके के होते है – गरीब किसान, अधिकांश भूमिहीन खेतिहर मजूदर, सीमांत या छोटे किसान आदि. कदाचित ऐसा अकाल कभी नहीं हुआ जिसने हर एक व्यक्ति को समान रुप से प्रभावित किया हो.

प्रो. अमर्तय सेन के ये विचार कितने यथार्थपरक है इसका प्रमाण राज्य में सूखे एवं अकाल पीडि़त ग्रामीणों के आर्तनाद से जाहिर हैं. वर्ष 2000 में नया राज्य बनने की खुमारी के बावजूद अकाल की त्रासद घटनाओं में कोई कमी नहीं आई थी. तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री एवं रायपुर लोकसभा के वर्तमान विधायक रमेश बैस ने छत्तीसगढ़ में करीब 4 लाख किसानों एवं कृषि मजदूरों के पलायन मुद्दा जोरशोर से उठाया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अकाल से निपटने एवं राहत कार्यों के लिए केंद्र से 500 करोड़ की मांग की थी. राहत कार्य खुले पर अकाल का कोई ज्यादा हल्ला-गुल्ला नहीं हुआ. किसी किसान ने जान नहीं दी. लेकिन वर्ष 2015 में कम वर्षा के कारण जो सूखा पड़ा है वह इस मामले में भयावह है कि कृषि जीवन की बदहाली से तंग होकर छोटी जोत के किसान जान देने पर उतारु हैं और दे भी रहे हैं.

इसकी तुलना यद्यपि अकाल की अन्य विभीषिकाओं से नहीं की जा सकती पर छत्तीसगढ़ का इतिहास भीषण हैं. सन् 1828-29 में तत्कालीन छत्तीसगढ़ जिले में घोर अकाल पड़ा था जब बिलासपुर में चावल 1 रुपये में 12 सेर यानी 10 गुना अधिक कीमत पर बिका था. जबकि सामान्यत: चावल 1 रुपये में 120 सेर मिलता था. मध्यप्रदेश शासन द्वारा 1973 में प्रकाशित अकाल संहिता में दिए गए विवरण के अनुसार वर्ष 1832-35 के दौरान फसलें अत्यंत खराब हुई थी जिसमें विभिन्न भागों के हजारों लोग अकाल मौत के शिकार हुए थे. पुन: 1885 के सूखे ने छत्तीसगढ़ में विभीषिका दिखाई. फिर 1893-1900, 1902-03, 1918-19, 1920-29, 1940-41 अकाल के त्रासद वर्ष रहे. 1965-1970 के दौरान अविभाजित मध्यप्रदेश में भारी अकाल पड़ा था जिसमें 43 में से 38 जिले बुरी तरह प्रभावित हुए थे.

सौभाग्य से राज्य में पिछले तीन-चार दशक में प्रकृति का कोई ऐसा चित्र उपस्थित नहीं हुआ जिससे समस्त छत्तीसगढ़ समान रुप से प्रभावित हो.

नया राज्य बने डेढ़ दशक हो गए हैं पर छत्तीसगढ़ के किसानों की माली हालत में कोई खास परिवर्तन होता नजर नहीं आता. विशेषकर सीमांत कृषक वैसे ही परेशान है जैसे दशकों पूर्व थे बल्कि उनके जीवन में कठिनाईयां ज्यादा बढ़ी हैं, वह तरह-तरह के दबाव वह झेल रहा है. खेती के लिए ऋण, खाद, बीज आदि की सरकारी व्यवस्था है पर खेतों के लिए पानी कहां है? सरकार उद्योगों को पानी, बिजली और भूमि देने के मामले में अतिरिक्त उदारता बरतती है पर छोटी जोत के किसानों के जीवन को सुगम बनाने की न तो उसे चिंता है और न ही कोई उपाय समझ में आता है.

अब यदि बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं से उसके कान खड़े हो जाए तो अलग बात है हालांकि इसकी संभावना भी नगण्य है क्योंकि खेती का अगला सीजन आते ही बात आई गई हो जाएगी और किसान ऋण के बोझ से नीचे और नीचे धंसता चला जाएगा.

कहने के लिए कृषि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है. इसीलिए पिछले कुछ वर्षों से वह कृषि के अलग बजट विधानसभा में पेश करती रही है जिसमें कृषि की उत्पादकता बढ़ाने, रसायनों की मार से आहत भूमि की उर्वरा शक्ति को मजबूत करने खाद, बीमा, ऋण की व्यवस्था एवं सिंचाई के साधनों के विस्तार के उपायों के लिए बजटीय प्रावधान करती है. सरकारी व्यवस्थाओं से उत्पादकता तो बढ़ी है लेकिन खेती का रकबा तेजी से सिमटता जा रहा है. जाहिर है घाटे के सौदे की वजह से खेती छोड़कर अन्य कार्यों में किसानों को दिलचस्पी बढ़ी है. किंतु छोटी जोत के करीब 30 लाख किसानों के पास खेती के अलावा कोई उपाय नहीं है. और यदि प्रकृति दगा दे जाए तो फाकेकशी निश्चित है. ऐसे में ऋण का दबाव, बीमारी, गरीबी और अन्य पारिवारिक कारण उसकी जान के ग्राहक बन जाते हैं. छत्तीसगढ़ में कम से कम वर्ष 2015 के रबी और खरीफ फसल सीजन में तो यही हुआ है.

आंकड़े बताते है कि देश में किसान और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश अग्रणी है. छत्तीसगढ़ 5वें-6वें पर है. यह कहा जाता है कि आत्महत्या की ऐसी घटनाओं के लिए राज्य सरकार कैसे जिम्मेदार है? जवाब है- क्या सरकार की सीधी और नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वह ऐसे उपाय करें कि ताकि कोई भी व्यक्ति अकाल और भूख से न मरे और सभी को रोजी-रोटी के साधन आसानी से मुहैय्या हो. बड़ों एवं समृद्धों को छोड़ दें किंतु छोटी जोत के किसानों का अकाल की स्थिति में संरक्षण सरकार का दायित्व है और अनहोनी की स्थिति में इसकी जवाबदेही से वह बच नहीं सकती. उसके ऐसे उपाय किस काम के जो गरीब किसानों को मौजूदा हालातों से न उबार सकें. सिर्फ सिंचाई कर माफ करने या राजस्व वसूली को स्थगित रखने या राहत कार्य खोलने से उनका काम नहीं चलेगा. उन्हें ठोस उपाय चाहिए पर सरकार के नीति निर्धारकों की योजनाएँ कागजों पर भले ही लुभावनी नजर आए पर हकीकतन वे व्यावहारिता से कोसों दूर हैं.

यह बात ठीक है कि ऋण माफी भी समस्या का स्थाई हल नहीं है. छोटी जोत के तमाम किसानों के खेतों तक नहरों का पानी पहुंचाना भी असंभव हैं लेकिन ऐसी व्यवस्थाएं तो की जा सकती है ताकि अवर्षा या अल्पवर्षा की स्थिति में खेतों को पानी मिल सकें. सिंचाई के छोटे-छोटे साधन मसलन डबरी, कुएं तथा छोटे-छोटे तालाबों का निर्माण, बरसात में पानी का संरक्षण आदि काफी कुछ मदद कर सकते हैं. इसके अलावा स्थायी रोजगार की व्यवस्था से भी स्थितियां बेहतर हो सकती है.

वैसे भी छत्तीसगढ़ का किसान एक फसली धान लेने के बाद तो लगभग 6 महीने इधर-उधर के काम-धंधों में लग जाता या रोजगार के लिए सपरिवार पलायन कर जाता है. नया राज्य बनने के बाद यद्यपि पलायन का सिलसिला कम जरुर हुआ है पर खत्म नहीं. इसलिए सीमांत कृषकों एवं खेतिहर मजदूरों के लिए काम की व्यवस्थाएँ ऐसी होनी चाहिए जिसमें निरंतरता हो. तब शायद वह ऋण का भार बर्दाश्त करने की स्थिति में होगा और तब कम से कम इस वजह से तो आत्महत्या नहीं करेगा.

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