छत्तीसगढ़ में कोल ब्लॉक पर कैग का निशाना

Friday, March 22, 2013

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कोयला

रायपुर | छत्तीसगढ़ संवाददाता: कैग ने अपनी रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ में हजारों करोड़ की गड़बड़ी का मामला सामने लाया है. कैग की इस रिपोर्ट में बिलासपुर-अंबिकापुर मार्ग पर स्थित हसदेव अरंड कोयला क्षेत्र के परसा कोल ब्लॉक के लिए संयुक्त उद्यम कंपनी को भुगतान किए जाने वाले कोयला खनन शुल्क संबंधी निविदा शर्तों में अनुचित संशोधन के कारण 1549 करोड़ रुपए की हानि की आशंका व्यक्त की गई है.

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा बजट सत्र के अंतिम दिन 31 मार्च 2012 को समाप्त वर्ष के लिए कैग की रिपोर्ट विधानसभा में पेश की गई. रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी को उसकी मड़वा ताप विद्युत परियोजना के कैप्टिव उपयोग के लिए आबंटित परसा कोल ब्लॉक की निविदा शर्तों में अनुचित संशोधन के कारण हुई गड़बड़ी को मुख्य रूप से उजागर किया गया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि परसा कोल ब्लॉक का आबंटन अगस्त 2006 में किया गया था. इसमें 150 मिलियन टन का अनुमानित कोल भंडार था. सीएसईबी, वर्तमान पॉवर कंपनी के संचालक मंडल ने जून 2008 में अपनी 77वीं बैठक में परसा कोल ब्लॉक को संयुक्त उद्यम कंपनी के माध्यम से विकसित करने का निर्णय लिया.

कैग ने कहा है कि यद्यपि परसा एक अनएक्सप्लोर्ड ब्लॉक था परंतु भारतीय भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण की क्षेत्रीय अन्वेषण रिपोर्ट के अनुसार क्षेत्र में कोयले की समग्र गुणवत्ता डी से ई श्रेणी की थी. संचालक मंडल के निर्णय के अनुपालन में कंपनी ने खदान का विकास, खनन तथा कोयले का परिवहन कोल ब्लॉक से मड़वा परियोजना तक करने के लिए संयुक्त उपक्रम कंपनी बनाने फरवरी 2009 में निविदा जारी की. एनआईटी के अनुसार संयुक्त उपक्रम कंपनी का गठन ऐसे बोलीदाता के बीच किया जाना था जो कोयला खनन एवं सेवा समझौते पर हस्ताक्षर करने की तिथि को प्रचलित एफ श्रेणी कोयले के सीआईएल/एसईसीएल द्वारा अधिसूचित मूल्य पर उच्चतम छूट प्रस्तावित करे. ऐसी छूट प्राप्त मूल्य को कंपनी द्वारा संयुक्त उपक्रम कंपनी को देय कोयला खनन शुल्क माना जाएगा. 19 मई 2009 को बोली पूर्व बैठक के दौरान एक बोलीकर्ता अडानी इंटरप्राइजेस लिमिटेड ने कोयले की लागू की जाने वाली दरों के संबंध में यह प्रश्न उठाया कि यदि विस्तृत खोज के उपरांत कोयले की गुणवत्ता एफ श्रेणी से अधिक पाई जाती है. कंपनी ने 20 मई 2009 को स्पष्ट किया कि एफ श्रेणी के कोयले के मूल्य के बजाए वास्तविक श्रेणी के कोयले के एसईसीएल मूल्य पर लागू होगा.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एनआईटी की प्रतिक्रिया में 3 फर्मों एसईसीएल, एमएमटीसी तथा एईएल ने भाग लिया तथा तीनों बोलीदाताओं की बोलियों को 6 अगस्त 2009 को खोला गया. संयुक्त उपक्रम साझेदार के रूप में एईएल का चयन किया गया. क्योंकि इस संस्था ने एफ श्रेणी के कोयले की विद्यमान दरों पर सर्वाधिक 3 प्रतिशत की शर्त रहित छूट प्रस्तावित की थी. कंपनी तथा एईएल के बीच 6 जुलाई 2010 को संयुक्त उद्यम समझौता निष्पादित किया गया. जिसके माध्यम से सीएसपीजीसीएल-एईएल परसा कोलियासिस लिमिटेड नामक कंपनी का गठन किया गया.

कंपनी को 51 प्रतिशत हिस्सेदारी लेनी थी तथा एईएल को 49 प्रतिशत हिस्सा देना था. संयुक्त उपक्रम कंपनी का प्रबंध संचालक एईएल से लिया जाना था तथा समस्त कार्यकारी अधिकारों का उपयोग उसके द्वारा किया जाना था. 23 फरवरी 2011 को कंपनी तथा संयुक्त उपक्रम कंपनी के बीच सीएमएसए को अंतिम रूप दिया गया जो यह प्रावधानित करता है कि यह समझौता तब तक प्रभावित रहेगा जब तक कि कोयला ब्लॉक का भंडार खत्म नहीं हो जाता. अन्यथा इसे समय से पूर्व निरस्त नहीं कर दिया जाता.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हमने पाया कि मूल्य/कोयला खनन शुल्क के संबंध में निविदा शर्त जो कि एफ श्रेणी के कोयले के स्थान पर वास्तविक श्रेणी के कोयले के एसईसीएल द्वारा अधिसूचित मूल्य पर छूट को लागू किए जाने से संबंधित था, में संशोधन किया जाना अनावश्यक एवं कंपनी के हित के खिलाफ था. अधिकतम लाभ लेने तथा न्यूनतम लागत पर कोयला प्राप्त करने के लिए बोली दस्तावेज के अनुसार ऐसे प्रमुख बोलीदाताओं को संयुक्त उपक्रम पार्टनर के रूप में चयन करने का मापदंड था. जो एसईसीएल के एफ श्रेणी के कोयले पर अधिकतम छूट प्रस्तावित करे. क्योंकि कंपनी को यह मालूम था कि परसा कोल ब्लॉक का कोयला डी और ई श्रेणी का है जो कि एफ श्रेणी के कोयले से ज्यादा कीमती है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त उपक्रम कंपनी की भूमिका केवल कोयला खान के विकास, खनन तथा उसको विद्युत संयंत्र तक पहुंचाने तक थी. जिसके लिए कंपनी ने अपनी दरें प्रस्तावित की थी, उच्चतर श्रेणी के कोयले का लाभ संयुक्त उपक्रम कंपनी को दिया जाना न्यायोचित नहीं है. विशेष रूप से इस बात को दृष्टिगत रखते हुए कि कंपनी खदान की स्वामी है और जिस भी श्रेणी के कोयले का निष्कर्षण हो उसका उपयोग उसके स्वयं के उपभोग के लिए किया जाएगा. रिपोर्ट में कहा गया है कि निविदा के मूल्य वाक्य में परिवर्तन के द्वारा कंपनी ने संयुक्त उपक्रम कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया. अनावश्यक संशोधन के कारण कंपनी को सीएमएसए की संपूर्ण अवधि के दौरान 1549 करोड़ रुपए की हानि संभावित है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि इस बारे में मई 2012 में शासन ने कहा कि मूल्य वाक्य को एफ श्रेणी के कोयले से बदलकर वास्तविक श्रेणी के कोयले में बदलने का निर्णय विक्रेता का तटस्थ निर्णय था. शासन द्वारा यह भी कहा गया कि कंपनी को हुई हानि के संबंध में लेखा परीक्षा की परिकल्पना परसा में उच्च श्रेणी के कोयले की उपलब्धतता पर आधारित है. यह निष्कर्ष एकतरफा है क्योंकि अडानी माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड ने विस्तृत अन्वेषण के बाद भू वैज्ञानिक प्रतिवेदन तैयार किया था. यह सिद्ध करता है कि परसा में कोयले की संयुक्त श्रेणी की परत एफ श्रेणी की ही है.

कैग ने कहा है कि शासन का उत्तर स्वीकार्य नहीं है क्योंकि कंपनी एक वाणिज्यिक उपक्रम है और इस प्रकार उसे अपना स्वयं का हित पहले सुरक्षित करना चाहिए था. निविदा प्रपत्रों में कंपनी ने एफ श्रेणी के कोयले के लिए मूल्य वाक्य मानदंड से ही निर्धारित किए थे क्योंकि कंपनी परसा में उपलब्ध कोयले की वास्तविक श्रेणी को जानती थी. जो कि उस समय उपलब्ध जीएसआई के आंकड़े डी और ई श्रेणी जो कि एफ श्रेणी से अधिक महंगा था को बताते हैं. निविदा प्रपत्र के मूल्य वाक्य के अंतिमीकरण के बाद ऐसा कोई परिवर्तन नहीं हुआ जिसकी वजह से मूल्य वाक्य की शर्तों में एफ श्रेणी की बजाए वास्तविक श्रेणी के कोयले के मूल्य के आधार को बदला जाए. रिपोर्ट में कहा गया है कि एएमपीएल द्वारा अप्रैल 2012 में तैयार भू वैज्ञानिक रिपोर्ट में भी परसा कोल ब्लॉक में उच्च श्रेणी के कोयले जैसे डी और ई की उपलब्धतता की पुष्टि होती है. तीन परतों में से चौंथी परत अति महत्वपूर्ण है. क्योंकि 172.30 मीट्रिक टन में से अकेले 123.93 मीट्रिक टन कोयला अकेली चौंथी परत में मौजूद था.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दिसंबर 2012 में शासन द्वारा पुन: यह सूचित किया गया कि कंपनी ने एसईसीएल के एफ श्रेणी के कोयले के मूल्य के आधार पर संयुक्त उपक्रम कंपनी को कोयला खनन शुल्क के भुगतान करने के लिए सीएमएसए में संशोधन की प्रक्रिया शुरू कर दी है और इसे जल्द ही अंतिम रूप दिया जाएगा. उत्तर यह स्पष्ट करता है कि कंपनी द्वारा निविदा के मूल्य वाक्य में किया गया परिवर्तन उसके लिए लाभदायक नहीं था और उसमें किया जाने वाला संशोधन आडिट आपत्ति के बाद ही अब प्रस्तावित किया जा रहा है.

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