आदिवासियों का धर्म क्या है?

कनक तिवारी
यह सवाल देश और खुद आदिवासियों तक को लगातार परेशान किए है. इसका समाधानकारक उत्तर मिल नहीं रहा. जानबूझकर और नादानी से भी उलझनें पैदा की जाती हैं. मामला कब तक हल होगा, साफ नहीं है. अंग्रेजी हुकूमत के वक्त 1891 की जनसंख्या गणना में आदिवासियों के लिए कॉलम था ‘फॉरेस्ट ट्राइब‘. 1901 में उसे लिखा गया ‘एनीमिस्ट‘ या प्रकृतिवादी. 1911 में लिखा गया ‘ट्राइबल एनीमिस्ट‘. 1921 में लिखा गया ‘हिल ऐंड फॉरेस्ट ट्राइब‘. 1931 में लिखा गया ‘प्रिमिटिव ट्राइब‘. 1941 में लिखा गया ‘ट्राइब्स.‘ आज़ादी के बाद 1951 की मर्दुमशुमारी में आदिवासी आबादी वाला कॉलम हटा दिया गया.

धर्म की पहचान हटाने की वजह से आदिवासियों की गिनती अलग अलग धर्मों में बंटती गई. उसके चलते उनके समुदाय की संख्या कम गिनी जा रही है. धर्म के लिए सिर्फ छह विकल्प दिए जाते हैं- हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख. 2011 से पहले धर्म कोड में सातवां कॉलम ‘अन्य‘ शीर्षक से हुआ करता था.


कई लोग उसे चुन लेते थे. उसे हटा दिया गया है. इससे नुकसान यह है कि आगे चलकर पता भी नहीं चल पाएगा कि देश में आदिवासियों की वास्तविक आबादी कितनी है.

‘ब्रिटिश शासन काल के जनगणना (1871-1931 तक) कॉलम में आदिवासियों के लिए Aboriginal (मूलनिवासी) का विकल्प चुनने की व्यवस्था थी. फिर आदिवासियों को हिंदू या किसी अन्य धर्म में जोड़कर दिखाया जाने लगा. आरोप है कि मूलनिवासी का विकल्प हटाकर सरकार ने 1947 से ही उन्हें धार्मिक गुलाम बनाना शुरू कर दिया. आदिवासियों का कहना है कि देश में आदिवासियों में कुल 83 धार्मिक रीतिरिवाज हैं. वे राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट धार्मिक पहचान चाहते हैं. जिससे मजबूरन किसी अन्य धर्म का दामन थामना न पड़े.

क्षेत्रीय स्तर पर मान्यताओं और सांस्कृतिक स्वरूपों में विविधता भले ही हों, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सभी आदिवासियों के लिए समान धार्मिक पहचान या कोड की उनकी मांग है. उन्होंने कहा हिंदू धर्म में भी तो धार्मिक रीति रिवाज या पूजा-अर्चना की विधियां एक जैसी नहीं हैं. आदिवासी प्रतिनिधियों का मानना है कि देश के विभिन्न आदिवासी समुदायों में धार्मिक रीति-रिवाज काफी हद तक एक जैसे ही होते हैं. सभी समुदाय मूलतः प्रकृति के पूजक हैं. उनके दार्शनिक विचार भी लगभग एक जैसे हैं.

लेटिन भाषा से लिए गए अंग्रेजी शब्द ‘एनिमिस्ट‘ का आशय है ‘जड़ात्मवाद‘ या ‘जीववाद.‘ एनिमिस्ट प्रकृति की वस्तुओं में और गैरइंसानी गतिविधियों या प्रतीकों में विष्वसनीयता है. उनमें वह आध्यात्मिकता महसूस करता है. धर्म और सोसाइटी से संबंधित एनसाइक्लोपीडिया का कहना है भारत मे एक से लेकर पांच प्रतिशत तक आबादी एनीमिस्ट रहती ही है. भारत सरकार ने भी मंजूर किया है.

हिंदू सभ्यता के आने के पहले के मूल निवासी अधिकतर प्रकृति आधारित धर्मों के सहकार के साथ रहते रहे हैं. यह बात तर्कसिद्ध बल्कि अनुभवसिद्ध भी है कि प्रत्येक संस्कृति की अपनी एक विशेषता होती है. इस वजह से दूसरों से उसका अलगाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. प्रत्येक देश में आदिवासी समाज में लगभग कमोबेश उसी रूप में अब तक पाया जाता रहा है. संगठित और नामधारित मजहब एक तरह की ‘सुपरनैचुरल‘ (पराभौतिक) सत्ता में विश्वास करते हैं. आदिवासी जो महसूसते हैं, उसे शब्द आधारित किसी भाषा में अभिव्यक्त करना या व्याकरणसम्मत भाषा में समझाने की उन्होंने कोई प्रणाली अपनी समझ में विकसित करने की जरूरत महसूस नहीं की.

मसलन झारखंड में आदिवासियों ने अपने कुदरती धर्म का नाम सरना रखा है. वह पवित्र वृक्षों या उपवनों के धर्म के रूप में समझा जाता है. झारखंड के मुंडा, हो, संथाली, खुरुक आदिवासी इस तरह के धर्म पर भरोसा और विश्वास करते हैं. पवित्र वनस्पतिज, वन-उपवन की भौतिक उपस्थिति से उपजे अहसास का नाम सरना है. इनमें कई तरह के पशु पक्षी और पौधे वगैरह शामिल हैं. गाय, मछली, मोर, हाथी, नाग, पीपल, तुलसी, नीम आदि शब्द आदिवासियों की परंपराओं से कथित आर्य-हिंदू समाज में अंतरित हुए हैं.

प्रसिद्ध मानवशास्त्री निर्मल कुमार बोस गांधीजी के निजी सचिव भी रहे हैं. 1941 में बोस ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सामने शोध पत्र प्रस्तुत किया. वह आदिवासियों और हिन्दुओं के बीच तब से कथित आंतरिक रिश्ते को लेकर समझ की नई खिड़की की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.

बोस का अध्ययन ओडिशा के पाललहरा इलाके में जुआंग आदिवासियों की सामाजिक व्यावहारिकता और बदलते समीकरणों को लेकर रहा है. राष्ट्रीय फलक पर लंबे अंतराल तक फिर किसी बड़े शोध प्रबंध या शोध प्रणाली को विकसित नहीं समझा गया. बोस की थ्योरी है कि आदिवासी हिन्दुओं के दिन प्रतिदिन संपर्क में रहे हैं. इस प्रक्रिया में वे क्रमश: अपनी आदिवासी पहचान और अस्मिता भूलते गए.

सवर्ण हिन्दू भले ही उन्हें वर्णाश्रम पद्धति को सिर माथे लादे शूद्रों अर्थात दलितों आदि के समकक्ष कथित नीची जातियों के साथ रखते हैं. बोस के शोध पत्र को मानवशास्त्र के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित करते उस अकादेमिक क्षेत्र में मील के पत्थर की तरह प्रशंसा और मान्यता दे दी गई है.

गांधी के सचिव निर्मल कुमार बोस की थ्योरी में कई खामियां रही हैं. यह जांचने की कोशिश नहीं की गई कि कथित उच्चवर्णवाद बल्कि ब्राह्मणवाद को जब आदिवासी सामाजिकता पर श्रेष्ठता का अहंकार लिए लाद दिया गया तो आदिवासियों की क्या प्रतिक्रिया रही होगी.

आदिवासियों के कई धड़ों ने निश्चित तौर पर इस तरह के उच्चवर्णीय हिन्दूवाद की मुखालफत तो की होगी, लेकिन उस संबंध में व्यापक अध्ययन मानवशास्त्रियों ने नहीं करते हुए हिन्दू श्रेष्ठता के पक्ष में अपनी तयशुदा अवधारणाओं को इतिहास की प्रासंगिकता के लिए लिख दिया. कहीं कहीं अतिरेकी उत्साह के साथ लिखा गया है कि कथित निचली जातियां अपने से श्रेष्ठ द्विज जातियों की नकल करती आई हैं.

उनमें एक तरह का खालीपन कुंठा के साथ उन्हें उकसाता है कि वे भी उच्च वर्ण की तरह बेहतर नस्ल की जिंदगी जिएं. इस सिद्धांत को संस्कृतीकरण का नाम दिया गया. यह भी विश्वविद्यालयों में मानवशास्त्र तथा समाजशास्त्र के पाठ्यक्रमों के आधारभूत सिद्धांतों की तरह पढ़ाया जाता है.

इसका श्रेय एम.एन. श्रीनिवास को दिया जाता है जो निर्मल बोस के दृष्टिकोण के समर्थक रहे हैं. यह भी तथ्य है कि आज़ादी के पहले और बाद में पश्चिमी अध्ययनशील शोधकर्ता भारत आते जाते रहे. उन्होंने भी हिन्दू धर्म के पुख्ता फैलाव की परिधि के अंदर रहते हुए ही आदिवासियों के समाजविज्ञान और मनोविज्ञान को जांचने की कोशिश की. उनमें से कई मैदानी सतह पर जाकर खोज करने से बचते हुए अकादेमिक नस्ल की पुनरावृत्ति करते मानवशास्त्र और समाजशास्त्र के इतिहास में प्रतिष्ठित भी हो चुके हैं. हालांकि कई अपवाद भी हैं.

नई चिंताओं से लबरेज खोजों के कारण एक प्रसिद्ध मानवशास्त्री और निर्मल बोस के समकालीन तारकचंद्र दास (1898-1964) उभरकर प्रतिष्ठित हो गए हैं. उन्होंने बोस के बरक्स अपनी समझ की तात्विकता को बेहतर, वैज्ञानिक और सेक्युलर आधारों पर जांचते हुए लगभग उलट या अलग निष्कर्ष निकाले.

तारकचंद्रदास ने बोस के शोधपत्र ‘हिन्दू मेथड आफ ट्राइबल एब्साॅर्प्शन‘ के बरक्स अपने कई शोध पत्र प्रकाशित किए. अजीब और दुर्भाग्यपूर्ण है कि तारकचंद्रदास की खोजों को वह प्रसिद्धि और प्रचार नहीं मिला जिसके वे हकदार रहे हैं. उन्होंने छोटा नागपुर की हो, खरिया और भूमिज जनजातियों पर शोध प्रबंध किए. उन्होंने भी 1941 में महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रस्तुत किया था जिसका शीर्षक था ‘कल्चरल एंथ्रोपोलाॅजी इन द सर्विस आफ द इंडिविजुअल एंड द नेशन.‘ वह भी एक तरह से भुला दिया गया है.

तारकदास ने जोर दिया कि कई आदिवासियों ने हिन्दू धर्म के बढ़ते प्रभाव के बावजूद आदिवासी नस्लीय पहचान को जीवित रखा. तारकदास की खोजें मैदानी अध्ययन की हकीकतों पर ज़्यादा निर्भर रही हैं. उन्होंने यह भी कहा ‘‘जनजातियों का आज़ादी पसंद तबका ब्रिटिश वर्चस्व और हिन्दू संस्कृति के आगे बढ़ते कदमों के सामने झुकने की बजाय पीछे हट गया और उसने पहाड़ों की कंदराओं और साल के जंगलों में शरण ली. उसने अपने समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए सामाजिक वर्जनाओं की दीवारें खड़ी कर लीं.‘‘

उन्होंने यह भी माना कि इससे हिन्दू धर्म के प्रभाव में कमी आई. कई जातियों और उत्तरपूर्व की जनजातियों में अब भी विवाह एक सामाजिक करार है न कि एक ऐसा पवित्र बंधन जिसे तोड़ा नहीं जा सकता था और जिसके अंतर्गत पति अपनी पत्नी और उसकी संपत्ति का मालिक बन जाता है. वे कहते हैं खरिया जाति के आदिवासी हिन्दू धर्म के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रहे हैं. इस तरह यह अवधारणा कि आदिवासी हिन्दू धर्म से इस कदर प्रभावित और आच्छादित रहे हैं कि उनके हिन्दूकरण पर कोई सवाल नहीं उठाए जा सकते का तार्किक द्वैध रचने से स्वीकार्य थ्योरी नहीं मानी जा सकती.

भारतीय मानवशास्त्रीय विद्वानों ने आदिवासियों और हिंदुओं की जातिप्रथा के बीच अन्योन्यक्रिया का काफ़ी अध्ययन किया है. बी.के. रॉय बर्मन, एल.पी. विद्यार्थी और वेरियर एल्विन जैसे अध्येताओं ने जनजातीय समूहों को चार या पांच भागों में अपने अपने हिसाब से वर्गीकृत किया है. इनमें ऐसे आदिवासियों की श्रेणियां भी शामिल हैं जिनका हिंदू समाज में पूरी तरह से विनियोग किया जा चुका है, या जो हिंदू समाज के प्रति सकारात्मक रुख रखते हैं, या जो ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं और जिनका पूरा या आधा रूपांतरण हो चुका है, या जो मैदानी समाज के सम्पर्क में भी हैं और जिन्होंने अपना आदिवासीपन नहीं छोड़ा है, या जिनका हिंदू समाज के निचले पायदान में विनियोग कर लिया गया है, या जो पूरी तरह से हिंदू हो चुके हैं.

जाहिर है कि इनमें ऐसे आदिवासियों की श्रेणियां भी शामिल हैं जो हिंदू बनने के लिए तैयार नहीं हैं और हिंदू समाज के प्रति नकारात्मक रुख रखते हैं. इस मानवशास्त्रीय विद्वत्ता की आदिवासी विद्वानों की तरफ़ से आलोचना भी की गयी है. पर यह आलोचना भी मानती है कि ‘सैद्धांतिक रूप से यह सम्भव है कि हिंदू धर्म का एक रूप और उसके संस्कार ग्रहण कर लिए जाएं, और जाति के अर्थों में हिंदू समाज का अंग भी न बना जाए. फिर भी तारकचंद्र दास की स्थापनाओं का वैज्ञानिक अनुपालन और खंडन अभी तक हुआ नहीं लगता है.
जारी…

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