डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मोदी को चुनौती-2

कनक तिवारी
डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो इरादतन कहा था कि अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित सभी स्कूल, काॅलेज, तकनीकी और अन्य संस्थाओं को राज्य से वही सहायता मिलेगी और स्वायत्तशासी प्रशासन से भी, जैसे बहुसंख्यक लोगों या पूरे सामान्य वर्ग के लिए स्थापित की जाती संस्थाएं हों.
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कोई पूछे आज की सभी सरकारों से क्या अल्पसंख्यकों के शिक्षा संस्थानों को वित्तीय, प्रशासनिक और अभिभावकनुमा प्रोत्साहन देने की वास्तविक स्थितियां हैं भी?

अचरज ये सुझाव ऐसे शिक्षाशास्त्री की ओर से आ रहे थे जो, बहुत कम उम्र में कलकत्ता विश्वविद्यालय का कुलपति निर्वाचित हो गया था. कांग्रेस या दूसरी संस्थाओं की बात छोड़ें.


नरेन्द्र मोदी जैसे स्वयं-प्रचारित प्रखर व्यक्तित्व को डॉ. मुखर्जी के नोट की जानकारी जरूर रहनी चाहिए. उन्हें अपनी पार्टी के धर्मनिरपेक्षता के नज़रिए को लेकर कूढ़मगज समझ से अलग कोई राष्ट्रीय दृष्टि विकसित करने की इच्छा हो, तो उन्हें अपने इस पूर्वज का कथन अपने लिए दिशानिर्धारक यंत्र की तरह क्यों नहीं इस्तेमाल कर लेना चाहिए.

एक और साहसिक सुझाव श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने दिया था यदि किसी प्रदेश में कोई धार्मिक, जातीय या भाषायी अल्पसंख्यक वर्ग समूह मांग करे कि उसकी प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा संबंधी संस्थाओं के पर्यवेक्षण के लिए अलग अथॉरिटी की नियुक्ति की जाए. तो ऐसा सुनिश्चित किया जाए. ऐसी स्थिति होने पर सरकार नियुक्त प्राधिकारियों को वित्तीय सहायता भी दे. राज्य की प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में किए जाने वाले व्यय का आनुपातिक वितरण अल्पसंख्यकों की आबादी के अनुपात में किया जाए.

दिलचस्प है श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इसे अपने विचार की तरह पेश करने का दावा नहीं किया. स्पष्ट लिखा कि यह सुझाव सोवियत संविधान के अनुच्छेद 121 के आधार पर दिया जा रहा है. कम्युनिज़्म से तो लगातार हिन्दू महासभा, जनसंघ, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को परहेज होता रहता है. इसलिए मोदी प्रशासन में भी भारत-रूस मजबूत दोस्ती की नेहरू द्वारा रखी गई बुनियाद में दरारें भी आ गई हैं.

मोदी हुकूमत की अमेरिकापरस्ती भारत के इतिहास में अपशकुन या सवालिया निशान की तरह प्रगतिशील विचारों की आंखों की किरकिरी बन गई है. बुद्धिजीवी प्रजाति की संख्या तो भाजपा में बहुत कम ही होती है.

भाजपा के पूर्वज कुलपिता ने विश्व ज्ञान के तमाम उपलब्ध स्त्रोतों को टटोलने में कोताही नहीं की थी. यह तब की बात है, जब वे नेहरू मंत्रिपरिषद में शामिल होने को आश्वस्त रहे होंगे. कांग्रेस की मदद से ही भारतीय संविधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे. क्या इसीलिए?

इसके पहले 1941-42 में डॉ. मुखर्जी मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की संयुक्त सरकार में मंत्री भी रह चुके थे. 1947 से 1951 के बीच सत्तानुकूलता का मौसम हासिल हो जाने के कारण बाद में डॉ. मुखर्जी के बयानों से हिन्दू मुस्लिम नफरत की गंध नहीं आई थी. देश में तेजी से सांप्रदायिक धुवीकरण होने पर मुखर्जी को उनके अनुयायियों और समर्थक सहयोगियों द्वारा महान राष्ट्रवादी बताते उनके शुरुआती प्रगतिशील (?) विचार पर बहुत चतुराई के साथ पर्दा डाल दिया गया. डॉ. मुखर्जी कभी भी वैचारिक प्रगतिशील हो गए थे. ऐसा नहीं कहा जा सकता.

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी
डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी

आज समकालीन इतिहास कई असुविधाजनक पुराने सवालों से जूझ रहा है. कुछ और कुलबुलाते विचार मुखर्जी ने व्यक्त किए थे. उन्हें सुन, पढ़कर भाजपाई हुकूमत और पार्टी को अपने उद्दाम पर प्रतिबंध लगाना पड़ सकता है. वह अल्पसंख्यकों के जेहन को प्रोन्नत, राष्ट्रसम्यक और समावेशी बनाने के मुखर्जी के सुझावों को कम से कम कांग्रेस को कोसने की भड़ास में मुस्लिम तुष्टिकरण तो नहीं कहेगा.

श्यामाप्रसाद मुखर्जी के ऐसे कुछ काम के विचारों का तो भाजपा और पहले जनसंघ ने बंटाधार कर ही दिया है. सियासी पूर्वज पुराने नीबू के अचार की तरह तब तक मुफीद लगते हैं. जब तक चटखारे लेकर उनके विचारों की जुगाली करते अपना वोट बैंक मजबूत किया जाए. वे बुजुर्ग आम के उस पुराने अचार की तरह तब बुरे लगते हैं, जब ऐसे अचार में खुद अनुयायियों द्वारा उन्हें मर्तबान में बंद रखे रहने की उपेक्षा की वजह से विचारों में फफूंद लगी दिखाई दे. यही तो श्यामाप्रसाद मुखर्जी पूछ रहे हैं आज नरेन्द्र मोदी की सरकार से!

लिखा है श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कि हर नागरिक को निजी विवेक की पूरी आज़ादी होगी. वह निर्भयतापूर्वक अपने मजहब का पालन और अभ्यास तथा लोक व्यवस्था और नैतिकता को ध्यान में रखते धार्मिक क्रियाकलाप कर सकेगा. हर व्यक्ति को अधिकार होगा कि अपने धर्म के पूजागृह स्थापित कर सके. ऐसे उपासनागृह ऐसी जगहों पर नहीं बनें, जिससे किसी की नागरिक आज़ादी में दखल हो, या सड़कों पर आवाजाही में किसी तरह की बाधा पहुंचे.

महत्वपूर्ण है कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने दो टूक कहा कि धार्मिक स्थलों में टूट फूट हो जाने पर उनकी मरम्मत करने की गारंटी भी देनी चाहिए. बेचारी बाबरी मस्जिद को यह नहीं बताया गया. तब श्यामाप्रसाद मुखर्जी के ही राजनीतिक वंशज उसमें न केवल तोड़फोड़ कर रहे थे, बल्कि उस बूढ़ी इमारत को ही उन्होंने पूरी तौर पर नेस्तानबूद ही कर दिया!

कौन मानेगा संविधान सभा में श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने विधायिका और अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं में अल्पसंख्यकों की तयशुदा हिस्सेदारी की भी वकालत की थी. यह बात अलग है कि अल्संख्यकों और बहुसंख्यकों के संयुक्त निर्वाचन बनाने का डॉ. मुखर्जी और अन्य कुछ सदस्यों का सुझाव पहले ही बहुमत से उपसमिति की बैठक में ही खारिज हो गया था.

श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सरकारी नौकरियों के लिए भी अनोखा फार्मूला सुझाया. उसके लागू हो जाने पर अल्पसंख्यक वर्ग के उम्मीदजदा लोगों को काफी नौकरियां मिल जातीं और वे हकपरस्ती महसूस करते.

उनका कहना था कि सरकारी नौकरियां 50 प्रतिशत स्थान तुलनात्मक मेरिट के आधार पर भरी जाएं. बाकी 50 प्रतिशत नौकरियां आबादी की संख्या के अनुपात में भरी जाएं. उनका सुझाव था कि बाकी 50 प्रतिशत नौकरियां आनुपातिक फॉर्मूले की हर पांच बरस में पुनरीक्षित की जाएं और अंत में यह फॉर्मूला हटा दिया जाए. फिर सभी नौकरियों को मेरिट के आधार पर ही पाना सुनिश्चित किया जाए.

डॉ. मुखर्जी ने यह भी सुझाया था कि यदि किसी राज्य में पचास हजार या अधिक की जनसंख्या के कुछ ऐसे समूह हों, तो उन्हें अधिकार होगा कि सरकार उन्हें अल्पसंख्यक वर्ग घोषित करे. सभी सरकारी कुओं, जलाशयों, तालाबों, होटल, रेस्टोरेन्ट, पार्क और सामूहिक आमोद प्रमोद की जगहों पर सभी नागरिकों का बराबर अधिकार होगा. केवल उन धार्मिक संस्थाओं को छोड़कर जो किसी वर्ग विशेष द्वारा उनके लिए चलाई जा रही हों. धार्मिक संप्रदायों में भी कोई अल्पसंख्यक हो तो उसे अपने ही समुदाय के बहुमत के लोग पूजा या उपासना पद्धति से अलग नहीं कर सकें. सिक्खों द्वारा कृपाण रखना और झटका मांस के पारंपरिक अधिकार सुरक्षित रखे जाएं.

डॉ. मुखर्जी ने अजीबोगरीब सुझाव दिया कि देश का बहुसंख्यक वर्ग किसी प्रदेश में यदि अल्पसंख्यकों से कम संख्या में हो तो उनकी जनसंख्या 70 लाख या अधिक होने पर अपने लिए भाषायी, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से एक अलग प्रदेश की स्थापना की मांग कर सकते हैं. ऐसे लोग अपने पड़ोसी प्रदेश में मिल सकने का हक भी इस्तेमाल कर सकेंगे. उन्होंने कहा था कि उनके द्वारा दिए जा रहे सभी सुझावों को संविधान के मूल ड्राफ्ट में शामिल किया जाना चाहिए.

यह डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का सुझाव था कि केन्द्र और राज्यों में अल्पसंख्यक आयोगों का गठन किया जाए. उन्होंने लिखा- इस बात की भी प्रेरणा मैंने चीन के संविधान से ली है. राज्यों के अल्पसंख्यक आयोग प्रदेश सरकारों को जरूरत के मुताबिक सलाह देंगे. उनकी सलाह को दरकिनार कर यदि राज्य सरकारें आचरण करें तो वे केन्द्र के हस्तक्षेप से अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा कर सकें. आजादी के बाद तो देश में तरह तरह के आयोग बने ही हैं. किसी में वह शक्ति नहीं है, जिसका खुलासा श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने किया था. आयोग तो नख दंतविहीन सजवटी मनुष्य केन्द्र होते हैं. यह भी डॉ. मुखर्जी ने चीन के संविधान से प्रेरित होकर सुझाव दिया था.

डॉ. मुखर्जी का थोकबंद यह प्रस्ताव भी था कि जितने भी केन्द्रीय और प्रादेशिक सरकारों के कानून संवैधानिक प्रावधानों से असंगत हैं, उन्हें तत्काल विधिशून्य घोषित किया जाए. यही बात सभी प्रशासनिक आदेशों पर भी लागू हो.

उन्होंने कहा था केन्द्र और राज्यों के स्तर पर लोकसेवा आयोगों का गठन किया जाए. राज्य में तीन सदस्यीय आयोग में दो सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से रखे जाएं और तीसरा हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज हों. भारत की नागरिकता को लेकर भी उन्होंने कई सवाल उठाये थे. जो भी भारत में पैदा हुआ या यहां नेचुरलाइज हो गया है उसे भारत (संघ) के बदले किसी प्रदेश के नाम पर भी नागरिकता के लिए सोचा जा सकता है.

8 अगस्त 1947 को अल्पसंख्यक अधिकारों की सलाहकार समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल ने संविधान सभा अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को पत्र लिखा था. उन्होंने स्पष्ट किया था कि संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों के जरिए चुनाव कराने का ख्याल खारिज ही कर दिया गया है. कुछ सदस्यों ने कैबिनेट में आबादी के अनुपात में अल्पसंख्यकों को मंत्री बनाए जाने की सिफारिश की है. समिति इसे भी खारिज कर चुकी है. इसे मानने से कई कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं. इस स्थिति से उबरते अल्पसंख्यकों को सम्भावित नुकसान हो सकने की भरपाई करने के नाम पर राज्यपालों को निर्देशावली जारी करने का सुझाव दिया गया. यह कि राज्यों की मंत्रिपरिषद इस तरह गठित की जाए कि उसमें संयुक्त उत्तरदायित्व की भावना सुनिश्चित की जा सके.

अनुभव लेकिन इसके उलट है और सिफर है. मुख्यमंत्री अपनी हिकमत और श्रेष्ठता दिखाता मंत्रिपरिषद गठित करता है. अमूमन राज्यपाल संविधान के प्रावधानों के अनुसार उस पर अंगूठा लगाने की मुद्रा में दस्तखत कर देते हैं. संविधान निर्माताओं द्वारा दी गई सद्भावनापूर्वक सलाह खुद अपने आप में कब की दाखिल खारिज हो चुकी है.

सरदार पटेल ने यह भी लिखा कि अल्पसंख्यकों को आबादी के अनुपात में नौकरियां दिए जाने की संवैधानिक गारंटी का सुझाव आया है. उन्होंने कहा- नहीं मालूम कि दुनिया के किसी संविधान में ऐसा प्रावधान है. प्रशासनिक काबिलियत और जरूरत को देखते राज्य भले ही अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को नौकरी देने पर विचार करे, लेकिन इसे संविधान के तहत किसी गारंटी की शक्ल नहीं दी जा सकती.

उन्होंने मान लिया कि प्रत्येक राज्य के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करने तथा उन पर लगातार निगरानी रखने के लिए एक अधिकारी या आयोग की नियुक्ति की जाए. अनुभव बताता है कि राज्यों और केन्द्र के अल्पसंख्यक आयोग लिजलिजे निकाय ही तो हैं.

जितने सुझाव डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने दिए थे, उनमें से कुछ पर विचारण हुआ, लेकिन कई सुझाव गुमनामी के अंधरे में डूब गए हैं. उन पर किसी जिम्मेदार सदस्य ने बातचीत करने की न ज़रूरत समझी और न ही शिष्टाचार दिखाया.

कुल मिलाकर डॉ. मुखर्जी ने निश्चित रूप से कई नागरिक अधिकारों सहित अन्य कई सदस्यों से आगे बढ़कर अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए सुझाव दिए तो थे. संविधान के मूल पाठ में उनका जिक्र नहीं हो सका. उसकी अनदेखी करने का दोष उनके राजनीतिक वंशजों को भी क्यों नहीं दिया जा सकता?

हिन्दू-मुस्लिम दो फांक करके जो पार्टी अनंतकाल तक हुकूमत करना चाहती है, उसके पास डॉ. मुखर्जी के सुझावों को लेकर कोई कार्ययोजना क्यों नहीं है?

वह हिन्दू बहुमत के जेहन में सांप्रदायिकता का जहर भरती रहती है. मुस्लिम कठमुल्लापन की पार्टियों और नेताओं से साठगांठ कर मुसलमानों को भी राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल होने से रोक कर अलग अलग रखने में गौरव अनुभव करती है.

लगभग 20 प्रतिशत की संख्या के देश के सभी अल्पसंख्यक अब करोड़ों में हैं. उनकी अनदेखी करके भारतीय लोकतंत्र कैसे चल और पनप सकता है? यही आदिम सवाल है. इतिहास की खंदकों में डॉ. मुखर्जी के गुम हो गए सवाल आज भी विशेषकर भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार से फुसफुसाकर ही सही पूछ तो रहे हैं.

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