सेक्स के जंगलों में चट्टानों और गुफाओं में अकेले खेलने का आनंद

शरद कोकास
भंडारा की गर्मियों का दुख हम लोगों को अधिक दिनों तक सहन नहीं करना होता था.इधर स्कूल की छुट्टियाँ लगतीं और हम लोग बैतूल पहुँच जाते. सतपुड़ा रेंज के घने जंगलों की वजह से बैतूल हम लोगों के लिए एक हिल स्टेशन की तरह ही था. वहाँ घर की छत चांदनी कहलाती थी. चांदनी पर सोते हुए हम लोगों को गर्मियों में भी कम्बल या रजाई रखनी होती थी वर्ना सुबह तक कुल्फी जमने का पूरा चांस रहता था .

स्कूल खुलने से पहले हम लोग भंडारा लौट आते. मौसम फिर करवट बदलता और हवा में काई की गंध घुल जाती. बंदरों के उत्पात की वजह से टूटे हुए छपरी और रसोईघर के कवेलुओं को बरसात से पूर्व रिपेयर कराना ज़रूरी होता था. कभी रिपेयरिंग में देर हो जाती तो बारिश में छत टपकने लगती. जहाँ जहाँ पानी टपकता था वहाँ वहाँ हम लोग बर्तन रख दिया करते. कई बार रात के सन्नाटे में पानी टपकने की यह आवाज़ संगीत की तरह सुनाई देती थी.


बरामदे में आराम कुर्सी पर बैठकर या खिड़की की सलाखों पर ठोढ़ी टिकाकर बाहर बरसती बूंदों को देखने जैसा कार्य मुझे सुविधाभोगी वर्ग का प्रतीत होता था. मैं आदिम मनुष्य की तरह उस बरसात को महसूसना चाहता था जिसमे वह पहली बार भीगा था. कभी कभी स्कूल जाते या स्कूल से आते हुए भीगने का आनंद प्राप्त करने का यह अवसर अनायास ही प्राप्त हो जाता था.

उन दिनों बरसाती या छाता लेकर स्कूल जाने का चलन नहीं था बस इस बात का ख्याल रखना होता था कि किताबें न भीगें इसलिए बस्ते के भीतर उन्हे प्लास्टिक में लपेट कर रखा जाता था. वैसे इस तरह भीगने का एक सुख और था कि भीगकर आने के बाद माँ की डाँट के साथ गरम दूध और लाई भी खाने को मिलती थी.

नाइंथ क्लास तक पहुँचते पहुँचते पड़ोस में रहने वाले अधिकांश मित्रों के पिताओं के तबादले हो चुके थे और वे शहर छोड़कर जा चुके थे. स्कूल से लौटने के बाद स्कूल से दोस्तों से मिलने का कोई औचित्य नहीं था, वैसे भी वे लोग मेरे घर से दूर दूर रहते थे. अचानक बरसात की एक शाम मैंने महसूस किया कि दोस्तों के बिना शाम बिताना कितना मुश्किल काम है.

ऊब के इस दौर में किताबों से मेरी दोस्ती कुछ और गहरी हुई. स्कूल से आने के बाद मैं बस्ता पटकता और हाथ मुँह धोकर जोगीतालाव मैदान और अन्धविद्यालय के सामने की टेकड़ी पार कर मनरो स्कूल के परिसर में स्थित जिला ग्रंथालय पहुँच जाता था.

उस लायब्रेरी में हिन्दी की पत्रिकायें बहुत कम आती थीं लेकिन मराठी पत्रिकाओं की कमी नहीं थी. हिन्दी की प्रमुख पत्रिकायें थीं ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ तथा मराठी की ‘किर्लोस्कर’, ‘मनोहर’ , ‘अमृत कलश’ आदि. ‘मनोहर’ नामक मराठी पत्रिका में एक कालम हुआ करता था जिसका नाम था ‘कौतुहल’ इस कालम में बच्चों की सेक्स विषयक जिज्ञासाओं के उत्तर दिये जाते थे. मेरे सेक्स सम्बन्धी ज्ञान का पहला पाठ मुझे इसी कालम से मिला.

मैं लायब्रेरी पहुँचकर इस पत्रिका को ढूँढता और उसे लेकर किसी कोने में बैठ जाता. कोई व्यक्ति यदि मेरी बगल में आकर बैठता तो मैं सतर्क होकर पन्ना पलट देता. मुझे लगता था कि कोई मुझे उस कालम को पढ़ता हुआ न देख ले. यह वह दौर था जब विवाह से पूर्व बच्चों के लिए सेक्स संबंधी बातें अनावश्यक मानी जाती थीं.

माँ-बाप सोचते थे शादी के बाद इन्हें सब कुछ पता चल ही जाएगा. इधर बच्चे माता-पिता को उनके खूबसूरत भ्रम के साथ खुश होने का अवसर प्रदान करते हुए कुछ बड़ी उम्र के दोस्तों,बड़े भाई बहनों , चौकीदारों,घर के नौकरों,छोटी काकी जैसे गृह सहायिकाओं और मोहल्ले के दुकानदारों से सेक्स ज्ञान प्राप्त करते रहते थे.

फिर अचानक किसी किशोर होते बालक को सुबह सुबह अपनी पट्टे वाली अंडरवियर पर ऑस्ट्रेलिया या मध्य पूर्व की तरह कोई कड़ा सा नक्शा बना हुआ दिखाई देता तो वह चौंक जाता. वह अपने किसी मित्र से पूछता तो उसे पता चलता इसे ‘धात गिरना’ कहते हैं. रामू या परश्या चौकीदार उसे बताता कि यह अच्छी बात नहीं है, अगर ऐसा हमेशा होता रहा तो इससे तुम्हारी ताकत ख़त्म हो जायेगी, फिर तुम शादी के लायक नहीं रहोगे.

बच्चों के लिए यह अबूझ पहली जब सुलझ नहीं पाती तो वे अपने जिस्म के जंगलों में चट्टानों और गुफाओं के बीच उन रहस्यों की तलाश करते. इधर रहस्य बढ़ते ही जाते लेकिन साथ ही साथ तलाश का आनंद भी बढ़ता जाता. किसी खोजी की तरह आनंद की तलाश करते हुए जब वे अकस्मात के किसी क्षण में इस आनंद के चरम तक पहुँचते उन्हें वह सुख महसूस होता जो उससे पहले कभी नहीं हुआ था.

परश्या चौकीदार उन्हें फिर डराता, ऐसा मत करना वर्ना टेढ़ा हो जायेगा,पतला हो जायेगा, तुम सूख जाओगे,तुम्हारी सब हड्डियाँ दिखाई देने लगेंगी, फिर तुम शादी के लायक नहीं रहोगे. दो साल की उम्र में ‘छूना नई , छी गंदी बात ‘ जैसे कमांड सुनकर बड़े हुए वे बच्चे डर तो जाते लेकिन आनंद प्राप्ति के अवसर नहीं छोड़ पाते.

इधर परश्या के शब्द उनके अवचेतन में अटके होते और फिर एक दिन वे उन लोगों के पास पहुँच जाते जिनके प्रवचन शहर की दीवारों पर लिखे होते ..’गुप्त रोगी तुरंत मिलें’, ‘मर्दाना ताकत फिर लौटेगी’. अखबार के किसी कोने में छपे विज्ञापन पर उनकी नज़र अटक जाती जिसमें लिखा होता ‘लिंग के पतलेपन, शीघ्रपतन,धात,स्वप्नदोष का शर्तिया इलाज किया जाता है৷’

मैं जाने कितने दिनों से ‘कौतुहल’ कॉलम में पढ़ता चला आ रहा था,न स्वप्नदोष से कोई नुकसान है न हस्तमैथुन से, यह उम्र के साथ स्वाभाविक है.’ मैंने जब अपने दोस्तों से उनकी शंकाएँ और भय जाने तो मैंने वास्तविकता बताते हुए उनसे कहा ‘ऐसा कुछ नहीं होता.’ बड़े कमीने दोस्त थे मेरे, मेरी बातों पर विश्वास नहीं करते थे बल्कि उस चौकीदार पर भरोसा करते जो उन्हें डर के साथ साथ कई झूठे मनगढ़ंत किस्से भी परोसता था.

‘सत्य के ज्ञान’ की बजाय ‘झूठ के मनोरंजन’ को तरजीह देने का यह मानव स्वभाव था . यहाँ तक कि बहुत से ‘ममाज़ गुड चाइल्ड’ जैसे बच्चे तो इस विषय की चर्चा शुरू होते ही ‘छी…गंदी बात’ कहकर उठकर चले जाते. बरसों बाद यह बच्चे मुझे दुष्यंत की पंक्तियाँ ‘शरीफ़ लोग उठे दूर जाके बैठ गए’ में शरीफ़ लोगों के रूप में मिले.

कौतहुल कॉलम मेरे लिए एक अच्छे शिक्षक की तरह काम कर रहा था. मैं भी एक अच्छे शिष्य की तरह उन पाठों को पढ़ते हुए कभी कभार जंगलों में भटकते हुए रहस्य खोजने का आनंद ले ही लेता था. मेरी निजता में मैं ही अपने आप का सबसे अच्छा मित्र था.

बस एक कमी मुझे उस कॉलम में दिखाई दे रही थी कि लड़कियों के लिए पीरियड्स,यौनांगों का विकास जैसे विषयों पर तो उसमे सामग्री बहुत थी लेकिन जंगलो और गुफाओं में भटकते हुए आनंद प्राप्त करने की जानकारी उसमे नहीं थी. पितृसत्ता उन दिनों पारिवारिक पत्रिकाओं पर इस तरह हावी थी कि वे प्रगतिशील होते हुए भी प्रगतिशील दिखाई नहीं देती थीं.

बहुत बाद में यौन विज्ञान पर लिखी विभिन्न अधिकृत पुस्तकों का अध्ययन करते हुए मुझे ज्ञात हुआ कि प्रकृति ने स्त्री पुरुष दोनों को इस निरापद आनंद से वंचित नहीं रखा है. यद्यपि पितृसत्ता का आतंक जो उस समय की स्त्रियों के अवचेतन में हावी हुआ वह आज तक समाप्त नहीं हुआ है, यौन जीवन के अनेक क्षेत्र आज भी उनके लिए वर्जित प्रदेशों की सूची में हैं.

उन दकियानूसी पत्रिकाओं का विस्तार अब सोशल मीडिया के रूप में हो चुका है. परश्या, रामू जैसे कुपढ़ चौकीदार और छोटी काकी जैसी अपढ़ माताएँ अब भी बच्चों को बहत सी बातों के लिए डरा रहे हैं उनके दिमागों में वही सब भर रहे हैं जो उन्हें विरासत में मिला है.

उन दिनों के वे ‘ममाज़ गुड चाइल्ड’ अब खुद ‘ममाज़ ‘और ‘पप्पाज़’ बन चुके हैं और बच्चों को बगैर सेक्स और पोर्न में अंतर बताये, प्रकृति प्रदत्त सहज स्वाभाविक ज्ञान के अभाव में इस नई पीढ़ी को भी वही भय और अधूरा ज्ञान प्रदान रहे हैं जो उन्हें उनके बचपन मे मिला था. और इसे केवल यौनिकता के क्षेत्र तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा लेकिन वह चर्चा फिर कभी.

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