प्रसंगवश

बस यादें ही रह जाती हैं

अब्दुल असलम

फोटोग्राफी एक ऐसी विद्या है जिसका कोई विकल्प ही नहीं है. समृतियों को चीर सजीव रखने के लिए कला का भौतिक व रसायनिक विज्ञान के साथ ऐसा अनोखा संबंध भी हो सकता है. इसका ज्ञान मनुष्य को तकरीबन सात सौ वर्ष पूर्व हुआ. इस विज्ञान का उपयोग कर घर-घर में लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है फोटो ग्राफी के प्रेणता श्री इस्टमेंट कोडेक को .

विश्व के तमाम फोटोग्राफर 19 अगस्त को श्री कोडक का जन्मदिन ‘विश्व फोटोग्राफी दिवस’ के रूप में मनाते है. छत्तीसगढ़ में फोटोग्राफी की तकनीक एवं कला को स्वयं तक सीमित न रख कर आम फोटोग्राफरों में इस ज्ञान को बांटने वाले और फोटोग्राफी के पाठ्शाला कहे जाने वाले स्व.गुलाब भाई दवे का निधन कुछ वर्ष पूर्व हुआ.

आज विश्वभर में तकरीबन 80 से 90 प्रतिशत घरों में कैमरा एक आवश्यक वस्तु है. करीबन 99 प्रतिशत घरों में अपने परिवार अथवा पारिवारिक अवसरों पर निकाला गया फोटो ग्राफ तो अवश्य रहता है. इसका आंकलन से स्पष्ट हो जाता है कि फोटोग्राफी की कला का व्यवसाय के रूप में कितना बड़ा व अहम योगदान है.

प्रचलित कहावत है- कलाकार सदा भूखा ही सोता है. अमूमन कला गरीबी में जन्म लेती है. मुफलिसी में पलती है. और कंगाली में जन्म तोड़ देती है, लेकिन फोटोग्राफी के साथ यह कहावत लागू नहीं होती. फोटोग्राफी ही एक ऐसी विधा है जिसमें कैमरा हाथों में आते ही धनोपार्जन का साधन ही बन जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो फोटोग्राफी के लिए कला की साधना , रोजगार और आत्म संतुष्टी का कारण बनती है.

फोटोग्राफी की विषय वस्तु का विस्तार आपार है. इसके दो पहलू होते है. एक तो कैमरा व उसकी तकनीक और दूसरा छायाकंन, यानी कैमरे के माध्यम से रसायन द्वारा लेप किए हुए नेगेटिव से तस्वीर खिचना. फोटोग्राफी के लिए फोटोग्राफी का यह दूसरा पक्ष पहले पक्ष के ज्ञान को सही उपयोग करते हुए अपनी कल्पना को मूर्त रूप देने का जरिया है.

अब बात आती है कि विषय वस्तु क्या हो सकती है? बेहतर होगा कि हम अपने आस-पास की विषय वस्तु की तलाश करें. हम पाएंगे कि हर दो वस्तुएं ,हमारी आंखों के सामने से गुजर रही है. उनकी फोटो आप ने कहीं अवश्य देखी है.

दिनचर्या में काम आने वाली वस्तुएं मसलन,तेल, साबुन, फ्रिज, टीवी, मंजन, टूथपेस्ट इत्यादी तस्वीरों सहित इनके विज्ञापन पत्र पत्रिकाओं में देखने को मिलते है. टेबल टॉप, स्टीम लाइफ फोटोग्राफी कहलाते है.

वहीं वाइल्ड लाईफ, वृत्य चित्ररण, लैंड स्कैप, फूल, प्रदूषण, बच्चे, इंडस्ट्रीज, व्यक्तित्व चित्रण, प्रोयटे्रेट, माडलिंग फैशन फोटोग्राफी काफी प्रचलन में है. इनमें मॉडलिंग, फैशन, ग्लैमर फोटोग्राफी, रजतपट पर आने का पहला पायदान है.

फोटो पत्रकारिता से प्राप्त छायाचित्र के बिना आज किसी भी समाचार पत्र या पत्रिका की कल्पना ही नहीं की जा सकती. सम-सामयिक विषय को लेकर खेल , राजनैतिक विषय पर फोटोग्राफी पत्र-पत्रिकाओं की जान है. जिसका जीवंत उदाहरण है.

अमेरिका के टैकसेंटर पर हमला , विश्व फुटबाल कप, 26/11 हमला, उडि़सा का तूफान और गुजरात में भूंकप व दंगे, बेनजीर की हत्या, उत्राखंड की प्राकृतिक आपदा ऐसे ही न जाने कितने मामले हमारे जहन में होगें. जिनसे हम घटना स्थल पर पहुंचे बिना ही अवगत हुए है और दिलों दिमाग में उनकी तस्वीर भी खिच ली. घटना स्थल की फोटो देखकर ही हम वहां के हालात से भलीभांति परिचित हो जाते है.

यहीं नहीं, हमारे परिवार में कुछ रोज या वर्षो पहले बर्ड डे पार्टी, विवाह और इस दौरान दूर-दूर से आए रिश्तेदारों और उनके साथ गुजरे हुए पल की याद ये तस्वीरें तुरंत ताजा कर देती है.

यहीं तो है फोटोग्राफी की महत्ता, लेकिन क्या हमने इन छाया चित्रों के पिछे छिपे कलाकारों की ओर कभी ध्यान दिया है? रोजगार परख होते हुए भी फोटोग्राफी का स्तर गिरता जा रहा है. चालिस-पचास के दशक ही श्वेत श्याम फोटो के सामने उच्च तकनीक की रंगीन फोटो कहीं नहीं टिकटी समय के साथ आए इस बदलाव के दौड़ में यह फोटोग्राफी का दुरभाग्य ही कहा जाएगा कि श्वेत-श्याम फोटोग्राफ अब केवल इंकमटेक्स की फाइलों तक सिमट कर रह गए है.

कहते है कि इतिहास स्वंय को दोहराता है अगर यह सच है तो वह वक्त भी आएंगा जब श्वेत-श्याम फोटोग्राफी की पूछ परख बढ़ेगी. फोटोग्राफी की गुणवत्ता के हास का कारण यह नहीं है कि फोटोग्राफी के इंस्टुमेंट्स या तकनीकी की गुणवत्ता में कमी आई हो बल्कि इनमें तो उत्रोत्तर विकास हुआ है. और फोटोग्राफी पहले की तुलना में अधिक सुलभ हो गई है. कारण है बेरोजगारी और मंदी से उपजी प्रतिद्धंदता.

लोग बिना तकनीक ज्ञान के फोटोग्राफी के क्षेत्र में उतर आते है. ग्राहक भी इसका फायदा उठकर कम से कम कीमत पर फोटो खिचाना चाहते है. इसके लिए वे फोटोग्राफी की गुणवत्ता से समझौता करने के लिए तैयार होते है. जिसका असर फोटो ग्राफी की गुणवत्ता पर पडऩा लाजमी है.

आज फोटोग्राफी का तकनीक क्षेत्र क्रमोत्तर प्रगति करते हुए नई-नई सुविधाएं व तकनीक रोज परोस रहा है जिनमें शक्तिशाली जूम लेंस, माइक्रोलैंस, आटोफोक्स कैमरा और डिजिटल कैमरा आदि शामिल है.

इन दिनों डिजिटल कैमरे की तो बाजार में बाढ़ सी आ गई है रोल के झंझट से छुटकारा तो मिला ही परंतु खिची हुई फोटो को देखने की सुविधा के कारण ये कैमरा आम व्यक्ति की भी पहली पसंद बन गया है. मोबाइल हैड सेंट में कैमरे ने फोटोग्राफी के क्षेत्र में नए युग का सूत्रपात किया है.

अब आवश्यकता है नई पीढ़ी इन वस्तुओं के उपयोग की जानकारी हासिल करने एवं उनसे खिची जाने वाली तस्वीरों के कला पक्ष को समझने की है. हर परिवार कैमरा रखना आवश्यक समझता है. जरूरी यह भी है कि लोग फोटोग्राफी का तकनीकी ज्ञान हासिल करने की दिशा में हासिल करने का प्रयास करें.

अन्यथा होगा वहीं, जो हमेशा होता आया है, किसी का सिर गायब तो किसी का पैर, या फिर हमने तो पूरी रोल खिंच ली लेकिन आई सिर्फ दर्जन भर फोटो हमारी खिंची हुई फोटो बेहतर आई हो या फिर आई ही न हो. दोनो ही स्थितियों में सिर्फ यादें ही रह जाती है.

फोटोग्राफी की कहानी

सर्वप्रथम वर्ष 1569 में इटली के डेलापोर्ट ने फोटोग्राफी की पहल की एक बार जब वे कमरे में बैठे थे तब उन्होंने सूरज की किरणों को बाहर लगे पेड़ से छन कर आते हुए देखा और उस तस्वीर को किसी तरह एक ऐसे माध्यम से कैद करने की सोची, जो बाद में भी देखने को मिले. तब से उनकी खोच निरंतर जारी रही.

रसायन शास्त्र की फोटोग्राफी में महत्वपूर्ण भूमिका है. गेबर नामक एक व्यक्ति ने 18वीं शताब्दी में यह पता लगाया कि सफेद लाइट में सिल्वर क्लोराइड में कुछ छण रखा जाए तो वह काला हो जाता है. इसके बाद सिल्वर क्लोराइडको लेकर खोज शुरू हो गई. सन् 1776 में चाल्र्स विल्यम में रंगीन किरणों में सिल्वर क्लोराइड से कई प्रयोग किए. 1780 में सिल्वर साल्ट के सल्यूशन की मदद से श्याम- श्वेत तस्वीर बनाई गई.

अब चित्रों को स्थाई कैसे बनाया जाए, इस पर खोज हुई. सिल्वर साल्ट के सल्युशन से निर्मित कागज पर स्थाई चित्र बनाने के लिए सर जॉन हारचल ने सन् 1810 में सोडियम थाईयो सल्फेट नामक फिक्सिंग एजेंट की खोज की . इसके बाद 1824 में धातु व कांच की प्लेट पर फोटो को एक्सपोज किया गया. उन्होंने लेवेंडर के तेल में विटूमैन घोल कर कांच पर उनकी एक परत चढ़ाई इससे सूर्य की रौशनी में 8-10 घंटे रखा और लेंवेडर के तेल व तेजाब से अच्छी तरह धोकर नेगेटिव का अविष्कार किया.

अब बारी थी डेवलेपिंग यानी निगेटिव धोने की तरकीब खोजने की 1826 में सर जोसेफ नाइस फोर्ड ने सर्वप्रथम श्वेत-श्याम फोटो ली. सर फाल्स टैलबॉट ने एक ऐसा कागज तैयार किया, जो नेगेटिव व पॉजिटीव बनाने में उपयोग किया जाता है. सर हैनरीबैल गुडविल ने 1898 में रोल फिल्म बनाई, जो 80-90 के दशक में अत्यधिक इस्तेमाल की जाती रही. सबसे पहले रोल फिल्म का निर्माण कोडेक कंपनी ने शुरू किया था.

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