वर्मा मेरी कब्र खोद रहे थे-कनक तिवारी

रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ अधिवक्ता कनक तिवारी ने कहा है कि क्षुद्र राजनीति ने उनके पद से हटने का रास्ता प्रशस्त किया है. उन्होंने सरकार द्वारा नियुक्त नये महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा पर कई गंभीर आरोप लगाये हैं. कनक तिवारी की यह बातचीत बार एंड बेंच में प्रकाशित हुई है.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में महाधिवक्ता कनक तिवारी को हटा कर उनकी जगह सतीशचंद्र वर्मा को नया महाधिवक्ता नियुक्त किया गया है. इसके बाद से ही विवाद जारी है.


कनक तिवारी ने बार एंड बेंच से कहा कि सतीश वर्मा के मुख्यमंत्री से करीबी व्यक्तिगत संबंध हैं और उन्हें सत्ता में आने पर महाधिवक्ता कार्यालय की कमान दिये जाने का वादा किया गया था.

श्री तिवारी ने कहा-मुझे महाधिवक्ता बनाये जाने के बाद सतीश वर्मा का व्यवहार बहुत शत्रुतापूर्ण हो गया. मैंने उन्हें शांत किया और उनसे कहा कि राजनीति में वायदे टूट जाते हैं. कनक तिवारी ने अंततः वर्मा को उनके साथ काम करने के लिये मना लिया, जिसके बाद उन्हें राज्य का अतिरिक्त महाधिवक्ता बनाया गया.

श्री तिवारी के अनुसार-पहले दिन से ही वे मेरी कब्र खोद रहे हैं. उनके मुख्यमंत्री के साथ व्यक्तिगत संबंध हैं और वे शुरु से ही मेरे विरुद्ध साजिश कर रहे थे.

कनक तिवारी का कहना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद, विपक्षी दल के नेताओं और नौकरशाहों के खिलाफ कई विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया था. मैंने सीएम को सलाह दी कि हम कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो बहुत प्रभावशाली नहीं था. मैंने उन्हें सलाह दी कि वे इसे बदले की कार्रवाई की तरह न बनाएं.

इन एसआईटी का गठन भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 13 (1) (बी) के तहत लगाए गए आरोपों की जांच के लिए किया गया था, जो धन के बेहिसाब संचय के लिए सजा से संबंधित है. तिवारी कहते हैं- “कोई भी वकील आपको बताएगा कि अभियोजन के लिए यह अधिनियम का सबसे कमजोर बिंदु है. कंपनी कानून, आयकर अधिकारियों या बैंकों के बारे में जाने बिना, उन्होंने बस इस धारा के तहत लोगों को चार्ज करना शुरू कर दिया. इसलिए, अदालत ने स्वाभाविक रूप से जमानत दी, क्योंकि जांच पूरी भी नहीं हुई थी. मैंने भविष्यवाणी की थी कि ये लोग जमानत के साथ छूट जाएंगे, और आखिरकार ऐसा हुआ. जिन्हें अब एजी नियुक्त किया गया है, वही सज्जन उन मामलों को संभाल रहे थे. बुरी तरह से विफल होने के बाद, वे अब निराश हैं. ”

कनक तिवारी ने बार एंड बेंच से कई अहम मुद्दों पर चर्चा की है.

उन्होंने कहा-“वे मुझसे छुटकारा पाना चाहते थे, लेकिन मैंने कभी इस्तीफा नहीं दिया. मुझे बताया गया है कि कुछ पत्रों में, मैंने उल्लेख किया है कि मुझे एजी के कार्यालय को चलाना मुश्किल हो रहा है. उन्होंने इसे त्याग पत्र मान लिया. उस आधार पर, कानून मंत्री ने फाइल स्थानांतरित की और मुख्यमंत्री ने इस पर हस्ताक्षर किए और इसे राज्यपाल को सौंप दिया. ”

यह पूछे जाने पर कि क्या उनकी योजना कोई कार्रवाई करने की है, तिवारी कहते हैं-“अभी, मेरी कोई योजना नहीं है. मैंने अभी तक इस्तीफे का पत्र नहीं देखा है जो मैंने कभी नहीं लिखा. मैं पहले पत्र देखना चाहता हूं. यह एडवोकेट जनरल जैसे संवैधानिक अधिकारी को बाहर करने का तरीका नहीं है.”

कनक तिवारी के पक्ष में उतरे हिंदी के लेखक

छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता पद से कनक तिवारी को हटाये जाने को लेकर देश के जाने-माने लेखक उनके पक्ष में उतर आये हैं. कई शीर्ष लेखकों ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर गंभीर टिप्पणियां की हैं.

हिंदी के जाने-माने कथाकार उदय प्रकाश ने इस मुद्दे पर विस्तार से लिखा है. उन्होंने लिखा है-आप किसी राजनीतिक दल के हैं या नहीं, किसी विचारधारा के प्रति आपकी प्रतिबद्धता है या नहीं, यह महत्वपूर्ण और निर्धारक नहीं रहा. हम उत्तर-विचारधारा के दौर में लगभग दो-ढाई दशकों से गुज़र रहे हैं. पिछले दो दशकों में सत्ता-केंद्रिकता (power centricity) बढ़ती गयी है. यह ‘पॉवर’ (प्रभावी सत्ता) आती कहाँ से है, कैसे हासिल की जाती है, यह लगभग अब सब जानते हैं.

महाधिवक्ता का पद सिर्फ किसी पद तक पहुँच कर, उसके अधीन प्रभावी सत्ता के उपयोग का वैधानिक अधिकार ही हासिल करना भर नहीं था, बल्कि उसके लिए संविधानसम्मत निर्णयों और कार्रवाई या अनुदेशों की योग्यता और अनुभव की भी ज़रूरत थी. भारतीय संविधान की आपकी समझ और जानकारी के साथ-साथ उसके प्रति आपकी निष्ठा के बारे में बहुतेरे जानते हैं.

छत्तीसगढ़ में लंबे अरसे के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी, तब निस्सन्देह महाधिवक्ता के पद पर आपका चयन न सिर्फ प्रशंसनीय था बल्कि यह स्वाभाविक था. आप इस पद के लिए निर्विवाद सहज विकल्प थे.

यदि आपकी उम्र और आपका स्वास्थ्य इस पद के प्रभावी निर्वहन में कहीं रुकावट थी तो उसके लिए निश्चय ही प्रशासनिक व्यवस्था के द्वारा आपके सहयोगियों-सहायकों का प्रबंधन होना चाहिए था. यह न सिर्फ इस पद के प्रति न्याय होता, बल्कि संभवत: कांग्रेस पार्टी को भी इसका लाभ मिलता.

मेरा राजनीति से किसी भी तरह का व्यावहारिक संबंध नहीं है, सोचने की वह प्रणाली भी नहीं है, लेकिन आपको पढ़ता रहा हूँ और कुछेक निजी या मित्रों के अनुभव भी हैं.

मेरा कहना बस यही है कि आप मौजूदा सरकार के इस अप्रत्याशित क़दम को नियमों और क़ानूनों के वैधानिक कठघरे तक ले जायें. इसे चुनौती दें.

प्रथम दृष्टि में ही मुख्यमंत्री का यह निर्णय राजनीति और ‘पॉवर-गेम’ का चालू-चलताऊ उदाहरण लगता है.

लेकिन क्या न्यायपालिकाएं अब भी अपनी स्वायत्तता बचाये हुए हैं? क्या न्याय मिलेगा ?

आपकी चुनौती कम से कम इसका सच तो उद्घाटित करेगी.

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