नोटबंदी से paytm के भाग्य खुले

भारत में नोटबंदी से उपजी नगदी की समस्या से लोग पेटीएम जैसी कंपनियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं. पेटीएम ही नहीं नोटबंदी के बाद मोबाइल वॉलेट कंपनियों के यूजर्स तेजी से बढ़ रहें हैं. शनिवार के दिन देश की सबसे बड़ी मोबाइल वॉलेट कंपनी पेटीएम के जरिये 70 लाख से ज्यादा ट्रांजेक्शन हुआ है. इन सौदों का मूल्य 120 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

पेटीएम में चीन के जैक मा की कंपनी अलीबाबा की 40 फीसदी की हिस्सेदारी है. जिसे निकट भविष्य में 70 फीसदी तक ले जाने की योजना है. साल 2015 में इस कंपनी में रतन टाटा ने भी थोड़ा निवेश किया था.


पिछले 10 दिनों में 4.5 करोड़ से भी ज्यादा लोगों ने पेटीएम के माध्यम से भुगतान किया है. जिसमें करीब 50 लाख नये यूजर्स हैं. देशभर में किराना दुकानों, टैक्सी, ऑटोरिक्शा, रेस्तरां, कॉफी शॉप, सिनेमाघर और पार्किंग इत्यादि के लिये 10 लाख से ऊपर लोग ऑफलाइन पेटीएम भुगतान सेवा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

दरअसल, पेटीएम एक प्रकार का ऑनलाइन बटुआ है. जिसमें लोग अपने जेब वाले बटुये की तरह पैसे रख सकते हैं. और फिर इस ऑनलाइन बटुये को डेबिट या क्रेडिट कार्ड के स्थान पर प्रयोग कर सकते हैं. हालांकि ऑनलाइन बटुये में पैसे डालने के लिए डेबिट या क्रेडिट-कार्ड का सहारा ही लेना पड़ता है.

रिजर्व बैंक ने ऑनलाइन बटुये में पैसे रखने की सीमा 10 हजार रुपये तक तय की है. लेकिन केवाईसी फॉर्म भरने के बाद इसकी सीमा को 1 लाख रुपये तक बढ़ाया जा सकता है. इसका अर्थ ये हुआ कि जेब में बटुआ लेकर चलने की जरूरत धीरे-धीरे कम होती जायेगी.

जिस तरह से अचानक भारत में 500 और 1000 रुपये के नोटों की नोटबंदी कर दी उस पर कोलकाता हाईकोर्ट ने भी टिप्पणी की कि बिना सोच विचार कर इसे लागू कर दिया गया है.

गौरतलब है कि 8 नवंबर 2016 की मध्य रात्रि से 500 और 1000 के नोटों को मिलाकर कुल 22,033 मिलियन नोटों को अवैध घोषित कर दिया गया है.

जिनका मूल्य 14,171 बिलियन रुपये है जो कि कुल मुद्रा का 86.4 फीसदी है. जाहिर है कि इस निर्णय से देश में चल रही 86.4 फीसदी मुद्रा अवैध हो गई है. अब उसे बदलवाने तथा उसे जमा कराने के लिये बैंकों में रेलमपेल भीड़ उमड़ पड़ी है. सबको खरीददारी करने के लिये, भुगतान करने के लिये नोट चाहिये.

अब इस बात का आभास होने लगा है कि जल्द ही इतनी बड़ी संख्या में नये नोट उपलब्ध करवाने में रिजर्व बैंक सक्षम नहीं है. इसे कोई आम आदमी भी समझ सकता है कि देश की 86.4 फीसदी मुद्रा को बदलना आसान काम नहीं है.

केन्द्र सरकार ने 500 और 1000 के नोटों को मिलाकर कुल 22,033 मिलियन नोटों को अवैध घोषित किया है. रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट के अनुसार साल 2015-16 में 500 रुपयों के 4,291 मिलियन नये नोट तथा 1000 रुपये के 977 मिलियन नये नोट छापे गये थे. यदि इसी गति से 2000 तथा 500 के नये नोट छापे गये तो भारतीय अर्थव्यवस्था में नगदी की कमी बनी ही रहेगी.

इसकी पुष्टि रिजर्व बैंक द्वारा सोमवार को जारी किये गये आकड़ों से भी होती है. जिसके अनुसार नोटबंदी के बाद जिस रफ्तार से मार्केट में पैसे की सप्लाई हो रही है, उससे स्थिति को सामान्य होने में कम से कम सात हफ्ते और लगने का अनुमान है.

अब तक करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये मार्केट में आये हैं. ये पैसे पुराने नोटों को बदलने और कैश निकासी के माध्यम से आये हैं. वहीं, मार्केट में करीब 14 लाख करोड़ रुपये के बड़े करंसी नोट हैं. यानी अब तक पुराने नोटों के मूल्य का 10 फीसदी से भी कम बदला जा सका है.

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की चीफ इकॉनमिस्ट सौम्या कांति घोष के मुताबिक, अर्थव्यवस्था में नगदी की जरूरत का अंदाजा दो महीने के उपभोग की जरूरतों से लगाया था. अगर इसको पैमाना माना जाता है तो अभी 10 लाख करोड़ रुपये की नई करेंसी और छापनी पड़ेगी.

|| अगर बैंक मौजूदा रफ्तार से नये नोट मार्केट में बांटते रहे तो 10 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित जरूरत को पूरा करने में करीब सात सप्ताह और लग जायेंगे. ||

अगर बैंक मौजूदा रफ्तार से नये नोट मार्केट में बांटते रहे तो 10 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित जरूरत को पूरा करने में करीब सात सप्ताह और लग जायेंगे.

नतीजन, इसका फायदा ऑनलाइन वॉलेट कंपनियों को हो रहा है. पेटीएम ने शायद इसी कारण से नोटबंदी लागू होने के 24 घंटे के भीतर ही अखबारों में बड़े-बड़े एड प्रकाशित किये जिसमें प्रधानमंत्री मोदी के चित्र का इस्तेमाल करते हुये उन्हें बधाई दी गई और लिखा “अब एटीएम नहीं पेटीएम करो.”

ऐड में कहा गया, paytm माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को स्वतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था के इतिहास का सबसे निर्भीक निर्णय लेने के लिये बधाई देता है.

राजनीतिक अर्थशास्त्र के नजरिये से देखा जाये तो देश की अर्थव्यवस्था को प्रशासनिक आदेश के कारण नगदी से मोबाइल वॉलेट तथा ऑनलाइन भुगतान की ओर मुड़ना पड़ रहा है.

उल्लेखनीय है कि चीन में एक समय सर्वेसर्वा रहे माओ जे दुंग ने भी राजनीतिक को नियंता घोषित करके अर्थव्यवस्था में मनचाहा बदलाव करने की कोशिश की थी जिसका नतीजा देश को लंबे समय तक भुगतना पड़ा था.

आज दुनिया बदल गई है. माओ चीनी इतिहास में दर्ज होकर रह गये हैं. आज उसी चीन के अलीबाबा को भारत का विशाल बाजार तोहफे के रूप में दिया जा रहा है वह भी बिना ‘खुल जा सिम-सिम’ कहे.

बात की शुरुआत पेटीएम के बड़े शेयर धारक चीनी अलीबाबा कंपनी के जैक मा से शुरु हुई थी. खत्म भी उसी से होनी चाहिये. क्या आपकों नहीं लगता कि नोटबंदी का ऐलान चीनी अलीबाबा के लिये ‘खुल जा सिम-सिम’ के समान है जो उसके लिये नये उम्मीदें लेकर आया है जिसमें देश के कारोबार का मुनाफा विदेश चला जायेगा.

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