भारतीय राष्ट्रीय जनता कांग्रेस पार्टी !

कनक तिवारी | फेसबुक : इतिहास चक्र तेजी से घूम रहा है. 2014 का लोकसभा चुनाव असमंजस, अनिश्चितता और अप्रत्याशित परिणामों की कोख बन बैठा. कांग्रेसनीत गठबंधन दरकता गया. भाजपाई प्रचार शबाब पर रहा. शुरू में क्षेत्रीय दल एन.डी.ए. में शामिल होने को उत्सुक नहीं थे. तीसरे मोर्चे की पुरानी शराब नई बोतल में फिर बिक ही गई. सूबाई पार्टियां ताक में रहीं परिणाम की लॉटरी खुले तो अपने बाजार भाव सत्ता के सेंसेक्स में उछालें. भौंचक जनता ही असली दोषी है. 1991 से किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं दे रही थी. नेपथ्य में दिखा दोनों बड़ी पार्टियां सिर फुटौव्वल के बावजूद कनफुसियां भी कर लेती हैं.

देश विरोधी भारत-अमेरिकी परमाणु करार के लिए संसदीय तकनीक और सियासती तरकीब अपनाते दोनों ने ओबामा को उपकृत कर कम्युनिस्टों को ठिकाने लगा दिया. थोक और खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश को लेकर दोनों के द्विभाषी चिकने चुपड़े चेहरों वाले चपल प्रवक्ता टेलीविजन के परदे पर छा गए. दोनों पार्टियों के साझा दानदाता उद्योगपति राजनीति के रंगमंच के पीछे खड़े मुस्कराते हरी झण्डी दिखाते रहे.


दोनों पार्टियां सुप्रीम कोर्ट, चुनाव और सूचना आयोग की हिदायतों के बावजूद जनता को नहीं बतातीं उन्हें कब, कहां और कितना चंदा मिलता है. काला धन, महंगाई, भ्रष्टाचार दोनों के मुखमंत्र हैं. उनका जाप गुस्सा थूकने और विषवमन के लिए होता है. रक्षा सौदों में करगिल युद्ध के सिलसिले में भ्रष्टाचार का आरोप एक पर लगा तो अगस्ता वेस्टलैण्ड हेलिकॉप्टर खरीद दूसरे की रक्षा के लिए उड़ी चली आई. बोफोर्स तोप भी संधिपत्र बनती रहती है. एक ने संसद नहीं चलाने का रिहर्सल किया. दूसरे ने फिल्म निर्देशक बनकर प्रतिपक्ष की नायिका को सारा श्रेय दे दिया.

लोकपाल अधिनियम की साझा इबारत ने राजनीतिक धीरज अन्ना-आंदोलन को तोड़ दिया. गुरु और चेले में फूट पड़ गई. गुरु चले गए रालेगण सिद्धि के गंगाधाम. शिष्य चले गए दिल्ली के दलदल के यमुनाधाम. जो सही थे वे सुधार आन्दोलन करते घर बैठे गए. अन्ना छब्बे बनने चले थे. दोनों पार्टियों ने उनको दुबे बना दिया.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कुरुक्षेत्र, चक्रव्यूह, हस्तिनापुर जैसे शब्दों का उल्लेख होता रहता है. तेलंगाना विधेयक के फेविकोल से विपरीत दीखते धु्रवों को एक दूसरे के साथ जोड़ा गया. विज्ञान का सिद्धांत है विपरीत ध्रुव एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं. दोनों पार्टियां संसद में मंजी हुई अदाकारी के साथ मैत्रीपूर्ण मल्लयुद्ध करती हैं. फैसला डिनर डिप्लोमेसी में होता है. ताकत पसीने में नहीं सत्ता के नमक में होती है. ऐसी ही हालत में क्रिकेट की तरह की मैच फिक्सिंग भी कर सकते हैं. समझौते के अनुसार एक पार्टी को शब्द प्रहार का शंख दिया गया है. उसके नायक मुंह खोलते हैं तो उसे हुंकार, दहाड़, प्रहार, गर्जना, ललकार जैसे विशेषणों से मीडिया में पेडन्यूज़ की तरह उच्चारित किया जाता है. दूसरी पार्टी को कर्णसुख होने का आशीर्वाद मिलने से नेता को मौनी बाबा कहा जाता है. उन्हें चिकने घड़े की तरह मुस्कराने की स्थायी आदत है.

तयशुदा रणनीति के तहत एक पार्टी दूसरी को छद्म धर्मनिरपेक्ष करार देती है. दूसरी पार्टी पहली को धर्मांन्ध कहती है. दोनों पार्टियों में राष्ट्रपति ओबामा को सलाम करने की मैत्रीपूर्ण दौड़ अब ट्रम्प बन सकती है. एक का नेता अमेरिका से अपमानित या उपेक्षित होने को सम्मानित होना मानता है. दूसरी का नेता अपमानित, उपेक्षित और असम्मानित महसूस करता भी अमेरिका से विसा मांगता रहा, जिससे उसका मुखमंत्र अमेरिका का कर्णसुख बन जाए. करतबों में दोनों संयुक्त हो लें तो क्षेत्रीय पार्टियों और आम आदमी पार्टी जैसी नई फितरतों से देश की राजनीति को छुटकारा दिलाया जा सकता है. उनके लिए केजरीवाल और ममता बनर्जी तो टिटहरी हैं. वे पैसे से राजनीति के आकाश को थामने की कोशिश अकारण करती हैं.

दाढ़ी केश धारे पूर्व प्रधानमंत्री के बदले अधकटी दाढ़ी रखे प्रधानमंत्री क्यों नहीं आ सकते? विदेशी मूल की जबरिया आरोपी सोनिया गांधी को संयुक्तदल का अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया जा सकता? एनी बेसेन्ट, सिस्टर निवेदिता, श्री मा और मदर टेरेसा जैसी महान विदेशी नारियों ने राजनीति से बाहर अंदर भारत की असंदिग्ध सेवा की ही है. देश और दुनिया के उद्योगपतियों की तिजोरियां अनिश्चितता, चुगलखोरी और गलाकाट प्रतियोगिताओं से बचकर लोहा, कोयला, पानी, बॉक्साइट, बिजली वगैरह के ठेके आसानी से थैलीबंद कर सकेंगी. देश तेजी से विकास करता गुजरात मॉडल कहलाएगा. विकास ऑक्सीजन है. उसके सिलेंडर नेताओं के पास हैं. वटवृक्ष नेता अंधेरे में जनता पर कार्बन डाइआक्साइड छोड़ते ही रहते हैं.

भाजयुमो और युवक कांग्रेस की शब्दसंस्कृति, वस्त्राचरण, मांसाहार, शीतलउष्ण पेय, रमणीप्रेम, चंदासंग्रहण वगैरह एक दूसरे के लिए ही हैं. मुसलमानों, आदिवासियों और दलितों आदि को वोटबैंक बनाने के लिए पेशबंदी नहीं करनी पड़ेगी. एक ही थैले में समा जाने से इन वर्गों में भी आपसी समरसता बढ़ेगी. महिला सशक्तिकरण के लिए लालू यादव, शरद यादव, अखिलेश यादव, मायावती और नीतीश कुमार वगैरह की लल्लोचप्पो नहीं करनी पड़ेगी. कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, रविशंकर प्रसाद, मीनाक्षी लेखी जैसे एक साथ प्रवक्ता हो जाएं तो बाकी प्रवक्ताओं की क्या ज़रूरत होगी? नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू चंद्रशेखर राव, शिवसेना, अन्ना डी.एम.के. वगैरह से निपटने पटाऊ रणनीति की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. सोनिया गांधी, अमित शाह, अरुण जेटली, मोतीलाल वोरा, सुषमा स्वराज, नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, राहुल
गांधी, चिदंबरम वगैरह एक साथ मंच पर महाभारत का शांतिपर्व रचने मोहनदास करमचंद गांधी का तिरस्कार कर मोहन भागवत से प्रेरणा ग्रहण कर सकेंगे.

कौटिल्य ने विरोधी राजाओं को एक साथ करने के ऐतिहासिक जतन किए ही थे. नेहरू और पटेल की प्रतिश्ठा के प्रचार पर समझौता हो जाए. दोनों को लगता ही है गांधी को दोनों ने अमेरिका भेजकर मिलेनियम महापुरुष बनवा दिया है. दोनों पार्टियों के नेताओं को भी नोबेल पुरस्कार मिल जाए तो देश गांधीमुक्त हो जाए. और गांधी शौचालय मुक्त. कांग्रेस को भंग कर लोक सेवक संघ बनाने का गांधी का सुझाव था. दोनों पार्टियां गांधी को ऐसे समझ रही होंगी. लोक याने राश्ट्रीय और सेवक याने स्वयंसेवक. जो कांग्रेस अर्थात लोक सेवक संघ याने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ चाहे अर्थात भाजपा वही होगा.

साझा विधेयक पारित होकर सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ते ही हैं. छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तरांचल और तेलंगाना बने ही हैं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी से खुंदक है ही. विपरीतों को रिझाने की वेलेंटाइन हरकतों को राजनीति भी कहते हैं. मतभेद का प्रचार होता रहे. अंतःपुर में स्वार्थों का एका होता रहे. दोनों के नेता अनगिनत उद्योगों और ठेकों में पार्टनर बने ही हुए हैं. कांग्रेस के दलबदलू नेता भाजपा की सरकार देश में घूम घूम कर बनवा ही रहे हैं.

प्रसिद्ध पत्रकार राजेन्द्र माथुर कहते थे कांग्रेस सत्ता से कभी नहीं जाएगी. जो भी पार्टी सत्ता में बैठेगी, वही कांग्रेस हो जाएगी. बेचारी राजनीति और बहुत बेचारी जनता के हित में भारतीय राष्ट्रीय जनता कांग्रेस पार्टी का उदय क्यों नहीं होना चाहिए!

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