आखिर कांग्रेस क्यों हारी ?

Monday, December 9, 2013

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कांग्रेस पार्टी

जे के कर
चार राज्यों के अप्रत्याशित चुनाव परिणाम पूछते हैं कि आखिर कांग्रेस चुनाव क्यों हारी. विवेचना को ऐसे भी किया जा सकता है कि भाजपा क्यों जीती. भाजपा के जीत के नेपथ्य में कांग्रेस की हार ही है इसलिये इस बात की पड़ताल करना चाहिये कि कांग्रेस क्यों हारी. हालांकि यह विवेचना तो कांग्रेस को करनी चाहिये तथा वह शायद करेगी भी. लेकिन एक मतदाता के तौर पर हमारा भी यह अधिकार बनता है कि कांग्रेस को यह बतायें कि वह क्यों हारी है.

कांग्रेस की हार को इसलिये अप्रत्याशित कहा जा रहा है कि किसी ने भी नही सोचा था कि उसकी इतनी बुरी गत बनेगी. चार राज्यों के कुल 589 विधानसभा सीटों की मतगणना का नतीजा चीख-चीख कर जतला रहा है कि कांग्रेस को केवल 21 फीसदी सीटों पर ही अर्थात 126 सीटों पर जीत मिल पाई है. दूसरी तरफ भाजपा को 69 फीसदी सीटें या कहें तो 408 सीटें मिली हैं. चारो राज्यों में अन्य तथा आम आदमी पार्टी को मिलाकर 9 फीसदी सीटें मिली है जिसका आकड़ा 53 सीटों का है. कांग्रेस की यह हार अप्रत्याशित ही नही वरन् इतिहासिक भी है क्योंकि आने वाले वाले लोकसभा चुनाव की इसे पदचाप माना जा सकता है.

ऐन चुनाव के पहले जब प्याज 90-100 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा हो तो कौन ऐसा शख्स होगा जो इसके लिये जिम्मेवार कांग्रेस को वोट देगा. जबकि यह सत्य है कि बेमौसम पानी गिरने से केवल पॉच फीसदी प्याज ही खराब हुए थे. फिर 20-30 रुपये में बिकने वाले प्याज की कीमत इतनी क्यों हो गई थी. एक अनुमान के अनुसार इससे प्याज के बड़े थोक व्यापारियों ने करीब 8,000 करोड़ रुपये कमाये हैं. खाद्य मंत्रालय केन्द्र के पास है तथा वह चाहती तो समय पर हस्तक्षेप कर जनता को इस दलदल में फंसने से रोक सकती थी. परन्तु उसने ऐसा नही किया. खाद्य तथा कृषि मंत्री राकपा के शरद पवार हैं जिनका महाराष्ट्र के शुगर तथा प्याज लॉबी से रिश्ता जग जाहिर है.

केवल प्याज ही क्यों टमाटर तो 60 रुपये तक में बिका है. कोई भी सब्जियों का मूल्य 40-50 रुपये से कम नही था. बाजार जाने पर मालूम चलता था कि यहां तो आग लगी हुई है. कांग्रेस तथा यूपीए के नीति निर्धारकों को तो बाजार नही जाना पड़ता और न ही उन्हें खाद्य पदार्थो के बढ़ती कीमत से फर्क पड़ता है. लेकिन जिसे फर्क पड़ता है वह वोट देता है जिसे फर्क नही पड़ता है वह वोट मांगता है यह फर्क करने से कांग्रेस चूक गयी है. अब रोये क्या होगा जब चिड़िया चुग गई खेत. लोगों की माली हालात पर ही यह निर्भर करता है कि वह कौन सी राजनीति करेगा या किस राजनेता को ठुकरा देगा. किसी भी देश काल की राजनीति वहां की अर्थव्यवस्था पर ही निर्भर करती है.

कांग्रेस के चुनाव हारने का पहला कारण आर्थिक है. यह सभी नीतियां मनमोहन-मोंटेक की जोड़ी बनाती है. सोनिया गांधी या राहुल गांधी का उसमें कोई हस्तक्षेप नही रहता है. इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि आम आदमी के चूल्हे-चौकी पर उनका ज्ञान शून्य है.

इतिहास गवाह है कि यदि जनता के पेट की आग को नही बुझाया गया तो वह सत्ता में आग लगा देती है. कांग्रेस को यदि फिर से उठ खड़ा होना है तो मनमोहन-मोटेंक की जोड़ी से छुटकारा पाना होगा साथ ही उन विनाशकारी नीतियों से भी. मनमोहन-मोटेंक की जोड़ी ने कांग्रेस को कुलीनो की पार्टी बना दिया है. जिसके माथे पर ही लिखा है कि खाद्य पदार्थो के आसमान छूते भाव, गरीबी तथा असमानता.

पिछले दस वर्षो से कांग्रेस ने एक अराजनीतिक व्यक्ति को अपना प्रधानमंत्री बना रखा है. जिसका यह परिणाम तो होना ही था. एक अराजनीतिक व्यक्ति वफादार तो हो सकता है लेकिन राजनीति की नैय्या कब डूबेगी उसका वह अंदाज नही लगा सकता है. मनमोहन-मोटेंक ने यूपीए सरकार को विश्व बैंक-अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व व्यापार संगठन के नीतियों के भारत में अमली जामा पहनाने के उपकरण में बदल कर रख दिया है. जिसमें जनता की आवाज़ तथा चीखें नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान दर्जा रखती है. पिछले दस वर्षो से जिस जनता पर इतना जुल्म ढाया गया उससे कांग्रेस कैसे उम्मीद लगाये बैठी थी कि वह उसे वोट देगी.

योजना आयोग का ज्ञान कितना संकुचित या यूं कहें हवाई है कि जो मानता है कि भारत के गांवो में 23 रुपये तथा शहरों में 29 रुपयों में गुजारा चल सकता है. पिछले दस सालों में अमीरी तथा गरीबी के बीच की खाई चौड़ी ही हुई है. आप को जानकर आश्चर्य होगा कि देश में सबसे ज्यादा वेतन पाने वाला नवीन जिंदल प्रति सेंकड में इससे ज्यादा कमाता है. सरकार अमीरों को तो और अमीर बनाने में कामयाब हो गई है लेकिन उसने गरीबों को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाने के लिये कोरी लफ्फाजी के अलावा और कुछ नहीं किया है.

संक्षेप में दुहराये तो आज मकानों की कीमत क्या है. क्या बिना उधार लिये आम आदमा मकान खरीद सकता है. यदि परिवार को कोई भी सदस्य गंभीर रूप से बीमार हो जाये तो वह ठीक होगा कि नही इसकी गारंटी नही है परन्तु इतना तय है कि बाकी का परिवार रास्ते पर आ जायेगा. शिक्षा के क्षेत्र का भी वही हाल है. कुल मिलाकर आम आदमी त्रस्त है यथास्थिति से और इसीलिये वह इसमें बदलाव चाहता है. बदलाव को परखने के लिये सामने जो भी विकल्प हो जनता ने उसे ही जितवाया है. भाजपा को भी यह जान लेना चाहिये कि जनता यथास्थिति वाद का आम तौर पर विरोध करती है. जनता जीवन को आगे बढ़ता देखना चाहती है ठहराव उसे पसंद नही मैडम जी.

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