नमो पर संघ की लगाम

Wednesday, March 12, 2014

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नरेंद्र मोदी

जे के कर
संघ ने नमो-नमो का जाप करने से मना कर दिया है. रविवार को बेंगलुरु में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रतिनिधि सभा में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि ‘हम राजनीति में नहीं हैं, हमारा काम नमो-नमो करना नहीं है. हमें अपने लक्ष्य के लिए काम करना है.’

इसको लेकर सोमवार के दिन भारतीय मीडिया में तरह-तरह के कयास लगाये ही जा रहे थे कि हमेशा की तरह संघ की ओर से उसके प्रवक्ता राम माधव का स्पष्टीकरण आया कि ‘संघ प्रमुख द्वारा कार्यकर्ताओं के संबोधन के कुछ हिस्सों की जो व्याख्या की गई, वह वास्तविकता की गलत बयानी है.’ माधव के मुताबिक, भागवत कहना चाहते थे कि बीते 10 सालों से जारी ‘कुशासन’ के कारण देश गंभीर खतरों का सामना कर रहा है, जिसे संगठन द्वारा देश के समक्ष उठाया जाना चाहिए. राम माधव ने भागवत को कोट करते हुए कहा, ‘स्वयंसेवकों को इस कुशासन को खत्म करने के लिए संघर्ष करना चाहिए. संघ के लिए व्यक्ति नहीं, बल्कि देश के समक्ष मौजूद मुद्दे महत्वपूर्ण हैं.’ राम माधव ने कहा, ‘इसे एक नेता को आगे बढ़ाने की भाजपा की चुनावी रणनीति पर टिप्पणी नहीं समझी जाना चाहिए.’

इसके बावजूद कयासो का बाजार गर्म है कि नरेन्द्र मोदी के बढ़ते कद से संघ खुश नहीं है. खासकर पिछले दो माह से नरेन्द्र मोदी ने भाजपा की जगह पर अपने आप को स्थापित कर लिया है तथा अब भाजपा के कमल निशान की जगह नमो टोपी ने ले लिया है. हालत ये है कि होली के मौसम में बाजार में नमो पिचकारी तथा नमो गुलाल भी आ गये हैं. कुल मिलाकर मोदी की इस तरह से ब्रांडिंग की गई है कि व्यक्ति प्रमुख और संगठन तथा विचारधारा गौण हो गई है.

चुनावी सभाओं में भी परंपरा से हटकर पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह पहले बोलते हैं तथा उसके बाद मोदी प्रमुख वक्ता के तौर पर पेश किये जाते हैं. कभी-कभी ऐसा लगता है कि लोग मतदान के दिन कमल के स्थान पर नमो के चुनाव चिन्ह को न खोजने लग जायें.

भाजपा के नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हिन्दू विचारधारा से अलग तो नहीं हटे हैं परन्तु ऐसा लगता है कि उन्हें पूंजी परस्त व्यवस्था ने हाइजैक कर लिया है. संघ की विचारधारा में स्वदेश का राग है जबकि मोदी के समर्थन में उतरे कार्पोरेट घराने, विदेशी पूंजी के प्रवाह को और ज्यादा तरल करके प्रवाहित करना चाहते हैं. आज देश का शेयर बाजार हिलोरे मार रहा है, मोदी के करीबी अडानी के शेयर आसमान छू रहे हैं, विदेशी संस्थागत निवेशक धड़ल्ले से बाजार में पैसा झोंक रहें हैं. शेयर बाजार 22 हजार के आंकड़े को बार-बार छू रहा है.

यदि विदेशी संस्थागत निवेशकों को मोदी पर भरोसा नहीं है तो वे क्यों इतना पैसा भारत में लगाएंगे. उनके लिये तो कोई दूसरा देश मुफीद होगा, जो उनके निवेश पर ज्यादा रिटर्न दे सके. क्या इतना पैसा मोदी को; यदि वे प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तो स्वदेशी के राह पर चलने देगा? इस सवाल का जवाब हम सब जानते हैं.

हकीकत तो ये है कि ये कार्पोरेट घराने तो मोदी से उस एजेंडे पर चलने की उम्मीद लगाये बैठे हैं जिन पर मनमोहन सिंह चलते हुए लड़खड़ा गये हैं. कार्पोरेट घरानों की तरफ से मनमोहन सिंह पर आरोप लगता रहा है कि वे पालिसी पैरालाइसिस के शिकार हैं तथा उदारवादी नीतियों को लागू करने में भी अक्षम हैं.

यही कारण है कि कार्पोरेट घरानों की नजर एक ऐसे व्यक्ति पर है, जो पार्टी तथा संगठन के बंधनों से ऊपर उठकर उनके लिये नीतियां बनाने से न झिझके. इसमें उन्हें लगता है कि नरेन्द्र मोदी के व्यक्तिवादी तौर तरीके पूरी तरह से मददगार होंगे.

अब जरा नरेन्द मोदी के इतिहास पर नजर डालें. सूचना का अधिकार से मिली जानकारी के अनुसार गुजरात सरकार ने टाटा को नैनो कार की एक परियोजना के लिए 9570 करोड़ का कर्ज दिया, जबकि उस परियोजना की कुल लागत इससे बहुत कम 2900 करोड़ रुपये है. कमाल की बात यह है कि टाटा को यह कर्ज 20 साल बाद लौटाना है, जिस पर ब्याज की दर 0.1 प्रतिशत है. इसके अलावा अडानी के पावर, बंदरगाह तथा सेज फ्रोजेक्ट को जिस प्रकार से मदद दी गई, उससे कार्पोरेट घरानों का मोदी पर लट्टू होना स्वभाविक है. ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल से नैनो को खदेड़ दिया था. उसके बाद टाटा ने मोदी के गुजरात में शरण ली है, कोई बता सकता है कि क्या ममता में इतना साहस होगा कि गुजरात से नैनो को खदेड़ सके.

संघ ही नहीं भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं को भी अब महसूस होने लगा है कि मोदी पर लगाम लगाना उनके वश की बात नहीं है. अटल बिहारी बाजपेई के भी संघ के तत्कालीन प्रमुख रज्जू भैय्या से मतभेद की खबरें आती रही है लेकिन अटल बिहारी की राजनीतिक छवि एक उदारवादी नेता की रही है, जो अपने में सबको समायोजित करने की क्षमता रखता है.

मोदी का स्वभाव इसके उलट माना जाता है. शायद यही कारण है कि संघ मोदी-मोदी के जाप से चौकन्ना हो गया है तथा अपने कार्यकर्ताओं को नमो-नमो का जाप करने से मना कर रहा है. यह ठीक है कि आड़ देश के समक्ष मौजूद महत्वपूर्ण मुद्दों की ली गई है. आपका क्या ख्याल है?

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