साल का कद्दावर चेहरा केजरीवाल

Wednesday, January 1, 2014

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अरविंद केजरीवाल-सीएम

रायपुर | विचार डेस्क: 2013 का साल अरविंद केजरीवाल के नाम रहा. उन्होंने आम आदमी की समस्याओं को देश के राजनीतिक एजेंडे में शामिल करवा दिया है. केजरीवाल की आम आदमी पार्टी रहे या न रहे राजनीतिक एजेंडे में अब आम आदमी की समस्याओं को तरहीज देनी ही पड़ेगी. इस पुनीत कार्य के लिये अरविंद केजरीवाल को भारतीय राजनीति में पथ प्रदर्शक के रूप में हमेशा याद किया जायेगा. इसलिये यह चेहरा वर्ष 2013 का सबसे कद्दावर चेहरा माना जा रहा है.

अरविंद केजरीवाल ने न केवल आम आदमी के बिजली तथा पानी जैसे समस्याओं को राजनीतिक मुद्दा बनाया वरन् इसे विश्वास मत पाने के पहले लागू करके बता दिया है कि उनकी मंशा क्या है. अब तक जितनी भी पार्टियो की सरकार ने स्पष्ट बहुमत के बगैर शपथ ग्रहण किया, सबसे पहली कोशिश अपनी कुर्सी बचाने के लिये किया. विश्वास मत हासिल कर पायेंगे कि नहीं इसकी चिंता छोड़कर अरविंद केजरीवाल ने जनता का विश्वास जीता है जो काबिले तारीफ है.

यह जानना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी के बिजली के बिल को कम करने का वादा भाजपा ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल किया था. इसका भी श्रेय अरविंद केजरीवाल तथा उनकी पार्टी को जाता है. कम से कम भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी ने अपने एजेंडे में आम आदमी के इस समस्या को शामिल किया. दिल्ली के बिजली के बिल को आधा करने का तथा 700 लीटर पानी मुफ्त देने का विरोध कांग्रेस या भाजपा अब नहीं कर सकती है. यदि करती है तो यह उनके लिये राजनीतिक हाराकिरी से बढ़कर होगा.

अरविंद केजरीवाल की भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति का ही असर है कि अब कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटले के जांच रपट को महाराष्ट्र कैबिनेट द्वारा खारिज किये जाने के खिलाफ आवाज उठा रहें हैं. मन करता है कि राहुल गांधी से पूछा जाये कि इससे पहले उन्होंने ऐसा विद्रोही तेवर क्यों नहीं दिखाया था. क्या दिल्ली विधानसभा के चुनाव के नतीजों से उनका हृदय परिवर्तन हो गया है.

अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी के समस्याओं को ही राजनीतिक एजेंडे में शामिल नहीं करवाया उन्होंने तो अपने विधायकों को भी आम आदमी के समान रहने के लिये कहा है. दिल्ली के मुख्यमंत्री और अन्य कैबिनेट के सदस्यों ने सुरक्षा तथा लाल बत्ती वाली गाड़ी लेने से इंकार कर दिया है. जिसका जनता में सकारात्मक संदेश गया है.

गौर करने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने भाजपा के दिग्गज रमन सिंह ने भी कहा है कि मैं भी पिछले दस वर्षो से लाल बत्ती वाली गाड़ी का इस्तेमाल नहीं करता हूं.हालांकि इस बात को यहां उल्लेखित किया जाना गलत न होगा कि रमन सिंह के सुरक्षा काफिले में तमाम प्रकार के तामझाम तब भी शामिल रहते हैं जब वह नक्सली इलाकों के दौरों में न हो.

इससे पहले बहस इस बात की चला करती थी कि दिखावटी सुरक्षा पर जनता का कितना पैसा बरबाद किया जाता है. अरविंद केजरीवाल ने ऐसा न करके उस पैसे से दिल्लीवासियों को मुफ्त पानी उपलब्ध करवाना ज्यादा उचित समझा है. केजरीवाल ने तामझाम पर पैसे बरबाद न करके बिजली के लिये दिल्लीवासियों को सब्सिडी देने का रास्ता अख्तियार किया है. हम इस बात को यहां स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि जहां पर तथा जिन्हें सुरक्षा दिया जाना आवश्यक है उसे अवश्य देना चाहिये. हम बात कर रहें हैं गैर जरूरी सुरक्षा की जो वास्तव में व्यक्ति को आम आदमी से ऊपर उठा देता है.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अविश्वनीय तथा धमाकेदार जीत के बावजूद न तो लाखो रुपयों के पटाखें फोड़े गये न ही शक्ति प्रदर्शित करती हुई रैलियां निकाली गई और न ही वैभव काप्रदर्शन किया गया है. अरविंद केजरीवाल के इस कदम के बाद से दूसरी पार्टियां यदि अपनी जीत के बाद ऐसा करती है तो जनता उसकी तुलना आम आदमी पार्टी से अवश्य करेगी.

इसे केजरीवाल का असर कहा जाना चाहिये कि उसने आम आदमी के समस्याओं को तरहीज दी है तथा भारतीय राजनीति में ऐसा उदाहरण पेश किया है कि बेमन से ही सही अन्य राजनीतिक दलों को भी उसे अपनाने को मजबूर होना पड़ा.केजरीवाल के इस असर के चलते उन्हें वर्ष 2013 का सबसे कद्दावर चेहरा माना जाना चाहियें.

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