जस्टिस गांगुली इस्तीफे को बाध्य हुए

Tuesday, January 7, 2014

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जस्टिस गांगुली

कोलकाता | समाचार डेस्क: केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा राष्ट्रपति से राय मांगे जाने के प्रस्ताव के बाद जस्टिस गांगुली ने अपना इस्तीफा दे दिया है. यौन उत्पीड़न के आरोप झेल रहे जस्टिस गांगुली ने पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा राज्यपाल एम के नारायणन को सौंप दिया है. गौरतलब है कि केन्द्रीय कैबिनेट ने बृहस्पतिवार को इस विषय पर राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्य न्यायालय से राय मांगे जाने के प्रस्ताव को मंजूरी देने के बाद से जस्टिस गांगुली अत्यंत दबाव में थे.

ज्ञात्वय रहे कि पश्चिम बंगाल में सतारूढ़ तृणमूल कांग्रेस भी जस्टिस ए के गांगुली से इस्तीफे की मांग पर अड़ी थी. अतिरिक्त सालिसीटर जनरल इंदिरा सिंह ने भी उन पर इस्तीफे के लिये सार्वजनिक दबाव बनाया था. इसी कड़ी में इंदिरा सिंह ने कथित पीड़िता के बयान को सार्वजनिक कर जस्टिस गांगुली पर और दबाव बढ़ा दिया था. केन्द्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने भी पहले से ही जस्टिस गांगुली से इस्तीफे की मांग दोहराई थी.

जस्टिस गांगुली पर आरोप है कि उन्होंने अपने लॉ इंटर्न के साथ 24 दिसंबर 2012 को दिल्ली के होटल ली मैरिडियन में अशोभनीय हरकत की थी. पहले तो पीड़िता लॉ इंटर्न ने किसी से नहीं बताया था परन्तु उनके द्वारा ब्लाग में इसका उल्लेख करते ही देश में हंगामा मच गया. जस्टिस गांगुली से इस्तीफा मांगा जाने लगा. हालांकि जस्टिस गांगुली ने अपने ऊपर लगाये गये आरोप से इंकार किया है तथा इसे उन्हें फंसाने की साजिश करार दिया है.

पीड़िता का हलफनामा

हलफनामा में कहा गया है कि युवती सेवानिवृत्त न्यायाधीश के साथ शोध सहायक के रूप में काम कर रही थी. 24 दिसंबर, 2012 को उन्होंने युवती को अपने होटल के कक्ष में बुलाया और उसे शराब पीने के लिए तथा रात उनके साथ होटल में रहने के लिए कहा. जयसिंह ने कहा, “रात हो चुकी थी और उन्होंने भोजन मंगवाया और इस दौरान मौखिक और शारीरिक तौर पर अपनी हरकतें शुरू कर दी.” हलफनामा में कहा गया है कि युवती कमरे से बाहर भागी और सीधे घर पहुंची. गांगुली ने इसके बाद उसे संदेश भेजा और फोन कर क्षमा मांगी.

सर्वोच्य न्यायालय की रिपोर्ट

सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय समिति ने गांगुली को पिछले दिसंबर में एक होटल के कमरे में कानून की एक प्रशिक्षु के साथ अशोभनीय आचरण करने का दोषी ठहराया था. न्यायाधीशों की समिति ने अपनी रिपोर्ट 28 नवंबर को प्रधान न्यायाधीश पी. सतशिवम को सौंप दी थी, और उसे सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर जारी कर दिया गया. रिपोर्ट पर विचार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ ने इस घटना में सर्वोच्च न्यायालय प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया था.
पूर्ण पीठ ने कहा था, “इस तथ्य पर विचार करने के बाद कि प्रशिक्षु सर्वोच्च न्यायालय की अधिकृत प्रशिक्षु नहीं थी और संबंधित न्यायाधीश घटना के दिन तक सेवानिवृत्ति के कारण पदमुक्त हो चुके थे, लिहाजा इस न्यायालय की ओर से इस मामले में आगे कार्रवाई की जरूरत नहीं है.”

प्रेसिडेंशियल रेफरेंस

भारत में राष्ट्रपति, सर्वोच्य न्यायालय से किसी विषय पर उसकी राय मांग सकता है. जिसे प्रेसिडेंशियल रेफरेंस कह जाता है. संविधान की धारा 143 के तहत भारत का राष्ट्रपति, सर्वोच्य न्यायालय से कानूनी सलाह मांग सकता है.हालांकि यह सर्वोच्य न्यायालय के लिये बाधयकारी नहीं है कि वह इसका उत्तर दें.

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