ओह, ये ही होते हैं पत्रकार !

Sunday, March 16, 2014

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सुरेश महापात्र

सुरेश महापात्र
सन 1989, उम्र महज 17 बरस की रही तब एक मौका मिला कि अखबार बांटकर रोजगार की राह पकड़ी जाए. तब का दिन है और आज का बस उसी दिन की बुनियाद पर आज का सुरेश महापात्र खड़ा है.

बेहद साधारण मध्यम वर्गीय परिवार की दूसरी संतान के रूप में मेरा जन्म 19 फरवरी 1971 को हुआ. पिता स्व0 श्री गोपिनाथ महापात्र कृषि विभाग में बड़े बाबू थे. बचपन की पहली पढ़ाई कांकेर में शुरू की. दूसरी पढ़ने से पहले बाबूजी का तबादला जगदलपुर होने के कारण सदर स्कूल में कक्षा दूसरी से पांचवीं की पढ़ाई, फिर बस्तर हाईस्कूल में मिडिल और हाईस्कूल की शिक्षा हासिल की.

1984 में दो बड़ी घटनाएं हुईं पहली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की हत्या और मेरे पिता की संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत. तब मैं कक्षा आठवीं में था. उसी दौरान बाबूजी की मौत ने जिंदगी की दशा और दिशा बदल दी. अपने परिवार में तीन भाई और दो बहनों में मैं दूसरे नंबर पर था. बड़े भाई की गैर जिम्मेदारी और मां के साथ छोटे भाई और बहनों के प्रति लगाव ने परिवार का जिम्मेदार बना दिया. आठवीं से 11 वीं तक की शिक्षा जगदलपुर में हासिल की. उसी दौरान अपने पड़ोस में मामा जी के घर पर उस समय का बड़ा अखबार ‘देशबंधु’ देखने का मौका मिला. तब मैं सोचता था कि इसमें लोग कैसे समाचार लिखते होंगे? कैसे छपता होगा? सवाल मन में कौंधता रहता था.

11वीं एग्रीकल्चर की पढ़ाई शुरू की. परिस्थितियों ने परिवार को जगदलपुर से सटे तोकापाल गांव की ओर जाने को मजबूर किया. अब वहीं रहने और भविष्य गढ़ने का अवसर मिला था. तोकापाल ननिहाल होने के कारण जगदलपुर से ज्यादा सुरक्षा का भाव परिवार के भीतर महसूस हो रहा था. तोकापाल में दुबारा 11वीं की पढ़ाई कला संकाय के साथ शुरू की. यहां 12वीं की परीक्षा देने के बाद खाली था. अंदर कुछ कमाने, करने-धरने की इच्छा जागृत हुई. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं?

इस गांव में भी देशबंधु अखबार पहुंचता था. वहां जिसके पास एजेंसी थी, उसे बांटने के लिए लड़के की तलाश थी. मुझे लगा कि खाली समय के लिए ठीक रहेगा. बस यहीं से अखबार की अनजानी दुनिया का सफर शुरू हो गया. लोग तब भी अखबार पढ़ने के बाद नियमित रूप से भुगतान करने से कतराते थे. यही वजह रही कि पहले एजेंट ने अपनी एजेंसी बंद करा दी. दूसरे ने ली. दूसरे पर भी कुछ महीने बाद भार बढ़ने लगा तो उसने भी एजेंसी बंद कराने की बात कही.

बस यही एक बात ने हॉकर से एजेंट बना दिया. मैंने प्रस्ताव रखा कि अब मैं अखबार की एजेंसी ले लेता हूं. उसने हामी भर दी. उसके बाद मैं देशबंधु का एजेंट बन गया. अपनी एजेंसी का अखबार स्वयं बांटता था. खुद वसूली करता था. एजेंसी में काम ठीक चलने लगा. तब तक न तो कभी लिखने की बात थी और न ही कोशिश की. इस बीच एक बरस की नियमित कक्षा में शामिल होकर सरकारी पीजी कॉलेज धरमपुरा में बीए फस्ट ईअर की पढ़ाई की. परिवार ने नियमित शिक्षा के लिए इंकार कर दिया. सो सेकंड ईयर से प्राइवेट शिक्षा लेनी थी. वापस तोकापाल लौटा.

ओह, ये ही होते हैं पत्रकार !
जगदलपुर में ही पहली बार पता चला कि जिनके पास अखबार की एजेंसी होती है, वही उस अखबार के पत्रकार होते हैं. इसके बाद ग्रामीण इलाकों की छोटी-छोटी खबरों को लिखना शुरू किया. पता नहीं, क्या लिखता था और क्या छपता था. ऐसे ही लिखते-लिखते कुछ लोग मिले जो दिशा तो दिखाते हैं पर दिग्भ्रमित भी करते हैं. समझ तो समय की बीतने के साथ आती है. अनुभव को आप किसी भी कीमत पर खरीद नहीं सकते. अच्छा-बुरा बहुत कुछ खुद को भोगना पड़ता है.

देशबंधु चलाते और लिखते समय भी बीतने लगा. गांव में धीरे-धीरे पत्रकार के रूप में पहचान बनने लगी. पर जिम्मेदारी और समझ नाम की चीज नहीं थी. लड़कपन था. दिन खेलने-कूदने, दोस्ती-यारी में कटता. परिवार के लोग गैर जिम्मेदार समझने लगे थे. किसी के खिलाफ कुछ छप गया तो बड़े मामा से शिकायत. मामा जी ने देखा कि लड़का उटपटांग कुछ भी कर रहा है तो उन्होंने अपने दुकान में बैठने की हिदायत भी दी. कुछ दिन बैठा भी. पर मन नहीं लगा.

एलआईसी की एजेंसी ली पर काम नहीं कर पाया. कपड़े की दुकान पर बैठा पर ज्यादा दिन नहीं टिक सका. परिवार मेरी हरकतों को देखकर परेशान. जिम्मेदारी के नाम पर बहुत कुछ था. परिवार के लिए कमाई के तरीकों पर ध्यान देने की सभी कोशिश नाकामयाब रही.

1992 तक ऐसा ही कुछ चलता रहा. 1992 में भाई पल्लव घोष से मुलाकात हुई. वे किसी काम से तोकापाल पहुंचे थे. उन्होंने जगदलपुर से प्रकाशित होने वाले दंडकारण्य समाचार की एजेंसी लेने के लिए तैयार किया.

दंडकारण्य से जुड़ने के बाद दो अखबारों का काम शुरू हो गया. भाई नेमीचंद जैन तोंगपाल से थे. वे जगदलपुर में देशबंधु के ब्यूरो बंशीलाल शर्मा जी के काफी करीबी हुआ करते थे. उनके साथ मेल मिलाप हुआ. भाई नेमी ने जगदलपुर पेंटर लाइन से दो बोर्ड बनाव कर लेकर पहुंचे और कहा कि बोर्ड टांगने से लोग पहचानते हैं. दो अखबारों के लिए दो बोर्ड टांग दिए गए. वे आज भी तोकापाल के गायकोठा में कहीं पड़े हैं.

भाई नेमी की बात सही निकली, पहचान बढ़ी. पत्रकार के रूप में चिन्हा जाने लगा. गांव की राजनीति, कूटनीति बहुत खतरनाक होती है. शहर से ज्यादा खतरनाक. वही दौर था जब सुंदरलाल पटवा की सरकार ने डिलमिली में एसएम डायकेम के लिए स्थापना की तैयारी होने लगी. विरोध में डा0 ब्रम्हदेव शर्मा ने कमान संभाल ली. मावलीभाटा इलाके में भूमिपूजन कार्यक्रम के बाद पूरा इलाका चर्चा में आ गया. मुलाकात के बाद डा0 ब्रम्हदेव शर्मा से करीबी बढ़ी. मावलीभाटा से डिलमिली तक गांव वाले मुझे अच्छा समझने लगे. मुझे खबरें भी समझ में आने लगी.

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